Translater
Sunday, 7 February 2021
नए मैसेजिंग एप का सहारा लेते आतंकी
व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग सर्विस को लेकर बहस जारी है। इस दौरान खबर मिली है कि पाकिस्तान में मौजूदा आतंकी संगठनों ने नए एप का रुख कर लिया है। इनमें तुर्की की एक कंपनी की ओर से हाल ही में विकसित एप भी शामिल है। जम्मू-कश्मीर के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों ने यह ताजा जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि दहशतगर्दों के साथ मुठभेड़ में मिले सुबूतों और आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों की ओर से पाकिस्तानी संगठनों की मॉउस ऑपरेडी पर प्राप्त जानकारी के आधार पर तीन नए मैसेजिंग एप सामने आए हैं। इनमें से एक अमेरिकी तो दूसरा यूरोपीय कंपनी ने बनाया है। वहीं तीसरे एप का निर्माण तुर्की की कंपनी ने किया है। कश्मीर घाटी में कारिंदों की भर्ती में जुटे आतंकी आका लगातार तीनों एप का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि सुरक्षा कारणों से इनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। अधिकारियों की मानें तो नए एप इंटरनेट की धीमी स्पीड में भी काम करने में सक्षम हैं। उनका उन इलाकों में भी इस्तेमाल मुमकिन है, जहां केवल 2000 के दशक में प्रयुक्त डाटा फॉर ग्लोबल एवोल्यूशन (एच) या 2जी इंटरनेट सेवा उपलब्ध हो। मालूम हो कि केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा वापस लेने के बाद वहां उपलब्ध इंटरनेट सेवाएं बाधित कर दी थीं। साल 2020 की शुरुआत में घाटी में 2जी सेवा बहाल हो गई थी। सुरक्षा एजेंसियां घाटी में पहले से ही वर्चुअल सिम कार्ड के खतरे से लड़ रही हैं। ऐसे में नए एप उनके लिए नई चुनौती बनकर उभरे हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Saturday, 6 February 2021
नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी का दुख
गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव होने में अब अधिक दिन नहीं रह गए हैं। चुनाव चाहे कोई भी हो, परिणाम को लेकर उत्सुकता तो रहती ही है। लेकिन इस बार गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव कुछ मायनों में बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। गुजरात में दो चरणों में स्थानीय चुनाव होने हैं। 21 फरवरी और 28 फरवरी को। एक ओर जहां कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है, वहीं भाजपा भी चुनावों को लेकर कमर कस चुकी है। गुजरात भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटिल ने उम्मीदवारों के लिए आवश्यक मानदंडों की घोषणा में कहा है कि 60 साल से अधिक आयु वर्ग के लोगों, नेताओं के रिश्तेदारों और जो लोग पहले से ही कारपोरेशन में तीन कार्यकाल पूरे कर चुके हैं, उन्हें इस बार टिकट नहीं दिया जाएगा। पटेल की घोषणा के बाद से ही प्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं-नेताओं के बीच हलचल का माहौल है। प्रधानमंत्री के बड़े भाई प्रह्लाद मोदी ने भी इस संबंध में टिप्पणी की है। बीबीसी से बात करते हुए प्रह्लाद मोदी ने कहा कि उनकी बेटी सोनल मोदी अहमदाबाद के बोदकदेव से चुनाव लड़ना चाहती थीं। लेकिन अब जब इस तरह के मानदंड तय किए गए हैं तो यह तय हो जाता है कि वो चुनाव नहीं लड़ पाएंगी, क्योंकि वो तो सीधे तौर पर पीएम मोदी के परिवार से आती हैं। बीबीसी ने प्रह्लाद मोदी से निकाय चुनाव समेत अन्य कई मुद्दों पर चर्चा की। सवालöआपकी बेटी चुनाव लड़ना चाहती हैं? जवाबöहां, मेरी बेटी अहमदाबाद के बोदकदेव की ओबीसी सीट से चुनाव लड़ना चाहती हैं। सवालöगुजरात भाजपा प्रमुख सीआर पाटिल ने तो घोषणा की है कि भाजपा नेताओं के रिश्तेदार और परिवार के सदस्यों को इस चुनाव में टिकट नहीं मिलेगा। तो अब? जवाबöहमने कभी भी ऐसा कुछ होने की उम्मीद नहीं की। हम पीएम मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल करके अपनी जिंदगी नहीं चलाते हैं। हमारे परिवार के सभी सदस्य कठिन परिश्रम करते हैं, कमाते हैं और उसी से अपना खर्च चलाते हैं। मैं राशन की दुकान चलाता हूं। भाजपा में हमारे परिवार की ओर से कोई भाई-भतीजावाद नहीं है। नरेंद्र मोदी ने साल 1970 में घर छोड़ दिया था और पूरे भारत को अपना घर बना लिया। वह हमारे परिवार में पैदा जरूर हुए हैं लेकिन वह भारत के बेटे हैं। सवालöतो क्या फिर नरेंद्र मोदी आपके परिवार के सदस्य नहीं हैं? जवाबöभारत सरकार ने परिवार की एक परिभाषा तय की है। जिन-जिन लोगों के नाम घर के राशन कार्ड पर हैं, वह सभी परिवार के सदस्य हैं। हमारे परिवार के राशन कार्ड में नरेंद्र दामोदरदास मोदी का नाम नहीं। तो क्या वह मेरा परिवार है? मैं यह सवाल आपसे और दूसरों से पूछ रहा हूं। जिस राशन कार्ड में नरेंद्र भाई का नाम है, वह अहमदाबाद के रानी का है। ऐसे में तो रानी के लोग उनका परिवार हुए। सवालöअगर सोनल मोदी चुनाव लड़ती हैं तो लोग कहेंगे कि वह पीएम मोदी की भतीजी हैं। जवाबöबहुत से लोग कहते हैं कि हम भगवान राम के वंशज हैं। क्या हम उन्हें रोक सकते हैं? यह रिश्ता वास्तविक है। हम इसे मिटा नहीं सकते। लेकिन अगर आप पता करते हैं कि क्या सोनल कभी भी पीएम के आधिकारिक निवास पर गईं तो आपको पता चल जाएगा कि यह संबंध कितना मजबूत है। सवालöसोनल पीएम मोदी से कब मिली थीं? जवाबöजब से नरेंद्र भाई देश के प्रधानमंत्री बने हैं, मुझे नहीं पता कि उनके घर का दरवाजा कैसा दिखता है। मुझे नहीं पता तो मेरे बच्चों को कैसे पता चलेगा? हम उनसे तभी मिल सकते हैं, जब वह हमें आमंत्रित करें। अगर वह हमें नहीं बुलाते हैं तो मैं उनके दरवाजे पर इंतजार नहीं कर सकता। सवालöजब भी पीएम मोदी अहमदाबाद/गांधीनगर आते हैं तो वह हीरा बा (अपनी मां) से मिलने जाते हैं। जवाबöवह बा से मिलते हैं, लेकिन इस बात को लेकर काफी स्पष्ट निर्देश होते हैं कि परिवार के बाकी सदस्य दूर ही रहें। अपनी शुरुआती यात्राओं में वह जब भी बा से मिलने गए हैं, तो आपने गौर किया होगा कि छोटे भाई का परिवार भी आसपास दिखाई देता था, लेकिन अब नहीं। पिछले कुछ सालों की तस्वीरें उठाकर देखेंगे तो पिछले कुछ सालों में बा के अलावा तस्वीर में कोई और नजर नहीं आता है। अगर पार्टी हमें उनके परिवार के तौर पर देखती है और हमें टिकट नहीं देती है तो यह पार्टी का स्टैंड है। नरेंद्र जब पंकज के यहां जाते हैं, क्योंकि बा वहां रहती हैं, लेकिन इस बात का क्या मतलब कि जब वह आते हैं तो एक भी बच्चा दिखाई नहीं देता जब उन्होंने घर छोड़ ही दिया है और उन्हें परिवार की जरूरत नहीं तो हम भी नहीं जाते।
द इनइक्वालिटी वायरस
दुनिया में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 10 करोड़ के करीब है, जबकि 21 लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। वहीं मानव जीवन पर 100 साल के सबसे बड़े संकट में भी अमीरों की सम्पत्ति बेतहाशा बढ़ी है। महामारी के नौ महीनों में देश के शीर्ष 100 अमीरों की कमाई करीब 13 लाख करोड़ रुपए बढ़ी। अगर इस राशि को देश के 13.8 करोड़ गरीबों में बांटा जाए तो हर व्यक्ति को करीब 94,000 रुपए मिलेंगे। यह खुलासा ऑक्सफैम की द इनइक्वालिटी वायरस नाम की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 18 मार्च से 31 दिसम्बर तक दुनिया में गरीबों की संख्या 50 करोड़ बढ़ी है। जबकि अरबपतियों की सम्पत्ति 284 लाख करोड़ रुपए बढ़ी है। सबसे ज्यादा नुकसान भारत में अकुशल श्रमिकों को हुआ है। देश के 12.2 करोड़ श्रमिकों में से 9.2 करोड़ यानि 75 प्रतिशत को नौकरी गंवानी पड़ी। एक अप्रैल 2020 में तो हर घंटे करीब 1.70 लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। छोटे कारोबारी तबाह हो गए, कारखाने लाखों की तादाद में बंद हो गए। श्रमिकों को पेट भरने के लाले पड़ गए और लाखों की बेरोजगार युवकों को परिवारों सहित अपने गांव में पलायन करना पड़ा। रास्ते में कइयों ने दम तोड़ दिया। हकीकत यह है कि कोविड महामारी के प्रकोप से दुनिया अभी भी पूरी तरह से उबर नहीं पाई है। इस कोरोना काल में आर्थिक मोर्चे पर वैश्विक स्तर पर कई विसंगतियां भी देखने को मिलीं। एक ओर जहां दैनिक मजदूरी से गुजारा करने वाली गरीब जनता दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए जद्दोजेहद करती नजर आई, वहीं दूसरी ओर इसके ठीक विपरीत धन-कुबेरों के खजाने और भरते चले गए। ऑक्सफैम की इस द इनइक्वालिटी वायरस रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के परिणामस्वरूप आर्थिक दृष्टि से समाज में असमानता में वृद्धि हुई इस कोरोना काल में जाने-माने उद्योगपति मुकेश अंबानी ने जहां 90 करोड़ रुपए प्रति घंटे के हिसाब से धन कमाया, वहीं 24 प्रतिशत लोगों की एक महीने की आमदनी तीन हजार रुपए से भी कम रही। इसका तात्पर्य यह कि कोरोना काल में मुकेश अंबानी ने एक घंटे में जितनी राशि कमाई, उसे कमाने में एक अकुशल मजदूर को 11,000 साल लगेंगे। इस दर से मुकेश अंबानी ने एक सैकेंड में जितना कमाया, उतना कमाने के लिए एक आम इंसान को तीन साल लगेंगे। भारत के 11 प्रमुख अरबपतियों की आय में महामारी के दौरान जितनी बढ़ोत्तरी हुई, उससे मनरेगा और स्वास्थ्य मंत्रालय का मौजूदा बजट एक दशक तक प्राप्त हो सकता है।
किसान आंदोलन में शामिल किसान गुमशुदा
बुधवार को मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने बताया कि किसान आंदोलन शुरू होने के बाद देश के विभिन्न राज्यों से आए 115 किसान इस समय दिल्ली की जेलों में बंद हैं। यह किसान दिल्ली सीमा से सटे विभिन्न धरना स्थलों पर कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए चल रहे प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। मुख्यमंत्री ने बताया कि किसान आंदोलन में शामिल होने आए किसानों के गुम होने की जानकारी उन्हें किसान नेताओं ने दी। नेताओं ने इन लोगों के गुम/लापता होने पर चिंता जाहिर करते हुए दिल्ली सरकार से मदद मांगी थी। केजरीवाल ने बताया कि इस बैठक के बाद दिल्ली के सभी जेलों में 26 जनवरी के बाद व प्रदर्शन के दौरान ऐसे लोगों की सूची तैयार की गई है, जो विभिन्न जेलों में बंद हैं। ऐसे लोगों की एक नौ पृष्ठों की सूची तैयार की गई है। उन्होंने कहा कि इस जानकारी की मदद से किसान प्रदर्शन से जुड़े लोग अपने गुम लोगों की पहचान कर सकेंगे। केजरीवाल ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं व अलग-अलग लोगों ने इस मामले में सम्पर्क किया था और बताया था कि उनके परिवार के लोग किसान प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे थे वह घर नहीं पहुंचे हैं और उनसे सम्पर्क भी नहीं हो पा रहा है। सरकारों का दायित्व है कि जो लोग गुम हैं, उनकी तलाश करके संबंधित परिवारों को जानकारी दें। अरविन्द केजरीवाल ने आश्वासन दिलाया कि इसके बाद भी अगर कुछ लोग गुम या लापता हैं, तो ऐसे लोगों की तलाश के लिए हर संभव कोशिश की जाएगी। इस मामले में उपराज्यपाल और केंद्र सरकार से भी बात की जाएगी।
-अनिल नरेन्द्र
Thursday, 4 February 2021
निष्पक्ष और सही रिपोर्टिंग की जरूरत है
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को उकसाने या भड़काऊ टीवी कार्यक्रमों को लेकर केन्द्र सरकार के उदासीन रवैये पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इस संदर्भ में कुछ नहीं किया है। उसने कहा कि इस तरह के लिए कार्यक्रमों को नियंत्रण करना न केवल एहतिहाती कदम होगा, बल्कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह महत्वपूर्ण भी है। 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद इंटरनेट सेवा को बंद किए जाने के मामले का हवाला देते हुए चीफ जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि निष्पक्ष और सही रिपोर्टिंग की जरूरत है लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इसका इस्तेमाल उकसाने के लिए होता है। पीठ ने सॉलिस्टिर जनरल तुषार मेहता से कहा कि बात यह है कि टीवी के कई कार्यक्रम ऐसे होते हैं जो उकसाने वाले होते हैं लेकिन सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कर रही है। पीठ ने यह टिप्पणी गत वर्ष कोरोना महामारी की शुरुआत में निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात सम्मेलन को लेकर की गई मीडिया रिपोर्टिंग के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। रिपोर्टिंग में इस सम्मेलन में शामिल होने वाले लोगों पर देश के अलग-अलग हिस्से में कोरोना फैलाने का आरोप लगाए गए को पीठ ने कहा कि कई कार्यक्रम ऐसे हैं जो भड़काऊ होते हैं या फिर एक समुदाय विशेष पर प्रभाव डालते हैं। लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही है। 26 जनवरी को इंटरनेट और मोबाइल शटडाउन किया, क्योंकि किसान दिल्ली आ रहे थे। हम गैर विवादित शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह की समस्या कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। निष्पक्ष और सही रिपोर्टिंग से समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब उकसावे वाली बात होती है। ये उसी तरह से महत्वपूर्ण है जिस तरह से पुलिस वालों के हाथ में लाठी होती है। ये कानून व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए एहतियाती कदम है। हमारी चिंता उकसाने वाले टीवी कार्यक्रमों को लेकर है। कुछ न्यूज पर नियंत्रण जरूरी है। हमें नहीं पता कि सरकार ने आंखें बंद क्यों की हुई हैं? पीठ ने कहा, हम आपसे कहना चाहते हैं कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं। लोग कुछ भी कह सकते हैं लेकिन हम टीवी कार्यक्रमों की बात कर रहे हैं, जिनमें उकसाने वाली प्रवृत्ति होती है। दंगे हो सकते हैं। लोगों की जान पर बन आती है। संपत्ति को नुकसान होता है। इन दिनों लोग कुछ भी बोलते हैं। जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ब्रॉडकास्ट एसोसिएशन और न्यूज ब्रॉडकास्ट स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) जैसे निकाय हैं जिनका अपना सिस्टम है। हम ओटीटी के जमाने में हैं। डीटीएच और केबल सेवा भी है। हम इन सभी के लिए कुछ सिस्टम विकसित करेंगे। इसके बाद कोर्ट ने पक्षकारों को तीन हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने को कहा। देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने टिप्पणी के दौरान कहा, सरकार ने दिल्ली में किसानों के आने (विजिट) की वजह से मोबाइल पर इंटरनेट बंद कर दिया। इस पर केन्द्र सरकार के वकील तुषार मेहता ने विजिट शब्द पर आपत्ति जताई। तब सीजेआई ने स्पष्ट किया, मैं जानबूझकर गैर विवादित शब्द (विजिट) का इस्तेमाल कर रहा हूं।
कहानी एक सनकी जनरल की, म्यांमार में तख्ता पलट
पड़ोसी म्यांमार में सेना ने सोमवार को तख्तापलट कर दिया और शीर्ष नेता आंग सांग सू ची समेत कई नेताओं को हिरासत में लेकर नजरबंद कर दिया। खुद को राष्ट्रपिता कहने वाले म्यांमार की सेना प्रमुख सांग आंग सू ची को मिला भारी बहुमत बर्दाश्त नहीं कर पाए। पिछले साल नवम्बर में हुए आम चुनावों में सू ची के नेतृत्व वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने भारी बहुमत हासिल किया था। एनएलडी को 80 फीसदी से ज्यादा सीटें मिली थीं। सेना ने सोमवार को तड़के देश की स्टेट काउंसलर आंग सांग सू ची, प्रेसीडेंट यू बिन मिंट समेत कई सीनियर नेताओं और अफसरों को हिरासत में ले लिया। देश में अगले साल तक के लिए आपातकाल लगा दिया। सेना के टीवी चैनल ने बताया कि मिलिट्री ने देश को अपने कंट्रोल में ले लिया है। इस तख्तापलट को अंजाम देने वाले सेना प्रमुख सीनियर जनरल मिन आंग लाइंग ने देश की सत्ता की कमान अपने हाथों में ले ली है। सेना ने तख्तापलट करने के कुछ घंटे बाद ही बयान जारी करते हुए कहा कि अब विधायिका, प्रशासन और न्यायापालिका का जिम्मा लाइंग के हाथों में रहेगा। मिलिट्री के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लाइंग उस समय अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के निशाने पर आ गए थे, जब उन्होंने म्यांमार के रखाइन प्रांत से रोहिग्याआंs को निशाने पर लेते हुए देश से निकाला दिया था। 2015 में आंग सांग सू ची म्यांमार सरकार ने अहम भूमिका निभाने से पहले मिन आंग लाइंग ने बीबीसी को एक इंटरव्यू में बताया कि यहां नागरिक शासन के लिए कोई नियमित समय रेखा नहीं होगी। उन्होंने कहा कि यह सरकार पांच साल हो सकती है या 10 साल तक रह सकती है, मैं कह नहीं सकता। लाइंग की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कमांडर-इन-चीफ होने के नाते महत्वपूर्ण मंत्रालयों-रक्षा, सीमा मामलों और घरेलू मामलों के लिए मंत्रियों की नियुक्ति कर सकते हैं। जबकि सू ची के हाथ में केवल नागरिक प्रशासन में कानून बनाने की शक्ति है। सेना के लिए संसद की एक चौथाई सीटें आरक्षित हैं और सरकार में रक्षामंत्री और सीमा मामलों के मंत्री की भी नियुक्ति सेना प्रमुख ही करता है। सेना प्रमुख किसी भी संवैधानिक बदलाव पर वीटो करने का अधिकार रखने के अलावा किसी भी चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करने की ताकत रखता है। संविधान ने सू ची को राष्ट्रपति बनने से मना कर दिया क्योंकि उनके ब्रिटिश पति के साथ बच्चे थे, जो विदेशी नागरिक है। म्यांमार में साल 2015 लोकतंत्र बहाल हुआ। उसके पहले लगभग 50 सालों तक देश में सैन्य तानाशाही थी आंग सांग सू ची की लोकतंत्र बहाली के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं। सैन्य सरकार ने सू ची को 15 साल जेल में बंद रखा। म्यांमार में अचानक हुए तख्तापलट पर विशेषज्ञ भी हैरान हैं। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के एरिया रिसर्च हेड गेरार्ड मैकार्थी कहते हैं कि देश का मौजूदा सिस्टम सेना के लिए काफी फायदेमंद है। सेना का सरकार पर नियंत्रण है। विदेशी निवेश आ रहा है। सेना को युद्ध अपराधों के मसले पर राजनैतिक संरक्षण था। इसके बावजूद तख्तापलट इसलिए किया गया है ताकि गैर चीनी इंटरनेशनल सहयोगियों को किनारे किया जा सके। साथ ही सेना समर्थित विपक्ष की हार और लगातार दूसरी बार आंग सांग सू ची की पार्टी के भारी बहुमत से सेना चिंतित है। सू ची की लगातार बढ़ती लोकप्रियता को सेना अपने लिए खतरा मान रही है। इसलिए एक साल के लिए आपातकाल लगाया गया है। म्यांमार में सेना के तख्तापलट पर सीधा हमला करार देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बिडेन ने सोमवार को म्यांमार पर नए प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी। बिडेन ने एक बयान में कहा, बर्मा (म्यांमार) की सेना द्वारा तख्तापलट आंग सांग सू ची व अन्य को हिरासत में लिया जाना और आपातकाल घोषित करना देश में सत्ता के लोकतांत्रिक हस्तांतरण पर सीधा हमला है।
पर्ल हत्याकांड के मुख्य आरोपी को अमेरिका के हवाले नहीं करेगा पाक
पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के मामले में अलकायदा के आतंकी अहमद उमर शेख और उसके तीन सहयोगियों को रिहा करने के आदेश को निलंबित करने के इमरान सरकार के अनुरोध को सोमवार को खारिज कर दिया। अदालत ने हालांकि मामले में सरकार का पक्ष जानने के एक दिन बाद मुख्य आरोपी शेख और उसके सहयोगियों फहद नसीम, शेख आदिल और सलमान साकिब की अंतरिम हिरासत बढ़ाने के आदेश को मंजूर कर लिया। अमेरिका के फटकार लगाने के बाद पाकिस्तान ने सुप्रीम कोर्ट में अलकायदा आतंकियों को रिहा करने के आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी। एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक पाक के अटॉर्नी जनरल ने सोमवार को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट से आरोपी को रिहा करने के फैसले पर रोक लगाने का आग्रह किया ताकि वह मामले में विस्तार से दलीलें दे सकें। अदालत ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ उच्च न्यायालय द्वारा आरोपियों को बरी करने के खिलाफ अपीलों को खारिज करते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था। सिर्फ सरकार ने शेख और उसके तीन सहयोगियों को बरी करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की थी। दवाल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल (38) को 2002 में अगवाकर उनका बड़ी बेरहमी से सिर कलम कर दिया गया था। उस समय वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और अलकायदा के बीच जुड़ाव की छानबीन कर रहे थे। बहरहाल पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह अहमद कुरैशी ने रविवार को कहा कि पाकिस्तान मामले में मुख्य आरोपी को अमेरिका के हवाले नहीं करेगा। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन से फोन पर बात करने के बाद उन्होंने यह fिटप्पणी की। ब्लिंकन ने शेख पर अमेरिका में मुकदमा चलाने की पेशकश की थी। शीर्ष अदालत के फैसले पर भी ब्लिंकन ने गहरी चिंता व्यक्त की थी।
-अनिल नरेन्द्र
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