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Wednesday, 7 September 2011

मनमोहन की बांग्लादेश यात्रा पर ममता ने लगाया पलीता

Editorial Publish on 8 Sep 2011
-अनिल नरेन्द्र

हमें अपने पधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की स्थिति को देखकर दया आती है और
दुख भी होता है। गैरों से आए दिन उनकी पगड़ी उछलती रहती है पर जब अपनों
से भी ऐसा होने लगे तो दुख और अफसोस होता है। गत सप्ताह पस्तावित खेल
विधायक के मामले में मनमोहन सिंह को मुंह की खानी पड़ी और अब पश्चिम
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पधानमंत्री के साथ बांग्लादेश जाने
से इंकार कर दिया है। मनमोहन सिंह का दुर्भाग्य से न तो अपनी सरकार के
मंत्रियों पर ही कोई रोब रहा और न ही समर्थन दलों पर। मंगलवार को
पधानमंत्री अपनी दो दिवसीय बांग्लादेश यात्रा पर चले गए। ममता को उनके
साथ जाना था। लाख कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी नहीं मानी और अंतत
पधानमंत्री को उनके बगैर ही जाना पड़ा। पधानमंत्री की इस यात्रा पर उनके
साथ मेघालय, त्रिपुरा व मिजोरम के मुख्यमंत्री भी गए हैं। डा. सिंह की
टीम में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा भी हैं। 12 साल के बाद किसी भारतीय
पधानमंत्री की इस बांग्लादेश यात्रा को बड़े परिवर्तन के रूप में देखा जा
रहा है। आतंकवाद और सुरक्षा के सवालों पर भारतीय चिंताओं के पति
बांग्लादेश की शेख हसीना ने कुछ कदम उठाए जरूर हैं पर अभी कुछ और उठाने
की जरूरत है। पहली बार नदियों के जल बंटवारे, सीमाओं के निर्धारण व
द्वीपों के लेन-देन जैसे तनाव पैदा करने वाले मुद्दों पर बातचीत हुई है
और पधानमंत्री की इस यात्रा में कई महत्वपूर्ण समझौते होने की उम्मीद
जताई जा रही है। सड़क, रेल व समुद्री संपर्कों को मजबूत करने पर भी कई
योजनाओं पर सहमति हो गई है। बांग्लादेश के चटगांव व मोंगला बंदरगाह का
इस्तेमाल भारतीय व्यापार को बढ़ाने इत्यादि जैसे कई और मुद्दों पर दोनों
पड़ोसी देशों की बातचीत होगी।
तीस्ता जल समझौते पर सवाल खड़े करके ममता ने पधानमंत्री की इस महत्वपूर्ण
यात्रा की हवा निकाल दी है। सरकार के रणनीतिकार ममता के इस रवैए की न तो
आलोचना कर पा रहे हैं और न ही उनकी आपत्ति को जायज कह पा रहे हैं। तीस्ता
जल समझौते पर पिछले दो महीनों से काम कर रहे जल संसाधन मंत्रालय ममता के
न जाने से निराश हैं। ममता का मानना है कि तीस्ता समझौते से प. बंगाल के
उत्तरी भाग को नुकसान होगा। तीस्ता का उद्गम सिक्किम से होता है। प.
बंगाल के उत्तरी हिस्से से होकर नदी बांग्लादेश में पवेश करती है। गत
सप्ताह पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने ममता बनर्जी को
कोलकाता में बताया था कि 25 हजार क्यूसेक पानी बांग्लादेश को दिया जाएगा।
लेकिन अंतिम मसौदे में 33 हजार से 50000 क्यूसेक पानी देने की बात कही गई
है। केन्द्राrय कैबिनेट की बैठक में ममता ने रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी
को इन मुद्दों को उठाने को कहा था। तीस्ता नदी सिक्किम के झील से निकलकर
बांग्लादेश में पवेश करती है और कुछ 600 किलोमीटर का रास्ता तय कर
ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। भारत में सिलीगुड़ी के पास तीस्ता के
गाजलडोबा प्वाइंट पर जल की मात्रा भांपकर बंटवारे का फार्मूला तैयार किया
गया। इसके तहत तीस्ता में 460 क्यूसेक पानी छोड़कर बाकी में 52 फीसदी
भारत को 48 फीसदी बांग्लादेश को देने की बात कही गई है। मुख्यमंत्री ममता
के अनुसार गर्मी में गाजलडोबा प्वाइंट पर ही तीस्ता का पानी घटकर सिर्प
पांच हजार क्यूसेक तक रह जाता है। ऐसे में समझौते के अनुसार बांग्लादेश
को पानी देने पर बंगाल के 6 जिलों का क्या होगा? एक आपत्ति तीस्ता के
सिंचाई वाले इलाके को लेकर भी है। ममता के विरोध का नतीजा यह हुआ कि इस
यात्रा में अब तीस्ता समझौता नहीं होगा।

बेचारे अमर सिंह गए तो बेल के लिए थे पर हो गई जेल

Editorial Publish on 8 Sep 2011
-अनिल नरेन्द्र
वर्ष 2008 के सनसनीखेज वोट के बदले नोट मामले में मंगलवार को एक नाटकीय
मोड़ आ गया जब राज्यसभा सांसद और बहुपतिष्ठित अमर सिंह को गिरफ्तार कर
लिया गया। मंगलवार को विशेष न्यायाधीश संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में
सुनवाई थी। सुबह अमर सिंह ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए पेशी से
छूट की गुहार की थी। इस पर अदालत ने उनके वकील को सम्बंधित कागजात पेश
करने को कहा। लेकिन दोपहर बाद आश्चर्यजनक तरीके से अमर सिंह खुद अदालत
में हाजिर हो गए और अपनी बीमारी का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें नियमित
रूप से स्वास्थ्य जांच की जरूरत है, लिहाजा उन्हें अग्रिम जमानत दी जाए।
लेकिन जज संगीता ढींगरा सहगल ने इन दलीलों को खारिज करते हुए 55 वर्षीय
अमर सिंह को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया। गत 25
अगस्त को अदालत ने अमर सिंह के अलावा पूर्व भाजपा सांसद फग्गन सिंह
कुलस्ते, महाबीर भगोरा व सुधीन्द्र कुलकर्णी को समन जारी किया था। फिलहाल
अमेरिका में होने के कारण कुलकर्णी अदालत में पेश नहीं हुए। अदालत ने
फग्गन सिंह कुलस्ते व महाबीर सिंह को जमानत देने से इंकार कर दिया और
उन्हें भी जेल भेज दिया। सुबह जब अमर सिंह के वकील ने मेडिकल ग्राउंड पर
पेशी से छूट मांगी तो अदालत ने कहा कि 12.30 बजे तक पूरी मेडिकल रिपोर्ट
पेश करें। इसके बाद अमर सिंह खुद मेडिकल के साथ पेश हुए। पेश है कोर्ट के
सवाल और अमर के जवाब। सवाल यह तो करीब साल भर पुरानी रिपोर्ट है। सितम्बर
2010 के बाद की मेडिकल रिपोर्ट कहां है? जवाब समय कम था, जल्दबाजी में
पूरी मेडिकल रिपोर्ट नहीं ला सका। कहें तो मंगवा देता हूं। सवाल सुबह खुद
पेश क्यों नहीं हुए? जवाब मैं गम्भीर रूप से बीमार हूं। मेरी किडनी खराब
हो गई है। मैं दूसरे की किडनी पर जिंदा हूं। अदालत का सम्मान करता हूं
इसलिए बीमार होने के बावजूद पेश होने आया हूं ताकि यह संदेश न जाए कि मैं
अदालत से बहाना कर रहा हूं। किडनी के अलावा भी मुझे कई बीमारियां हैं।
डाक्टरों ने संतुलित जीवन जीने के लिए कहा है।
श्री अमर सिंह को बलि का बकरा बनाया गया है। पैसे किसने अमर सिंह को दिए,
किस लिए दिए, पूरे मामले में फायदा किसको हुआ जब तक इन पश्नों का
तसल्लीबक्श जवाब नहीं मिलता हमारी नजर में यह मामला अधूरा है। फिर पश्न
यह भी उठता है कि जिसने मामले का पर्दाफाश किया पुलिस ने उन्हें ही फंसा
दिया। उनका क्या दोष था? बस यही कि उन्होंने पूरे षड़यंत्र का पर्दाफाश
किया था? इस गिरफ्तारी का जबर्दस्त फॉलआउट हो सकता है। अगर अमर सिंह ने
सारा भंडाफोड़ कर दिया तो कई कांग्रेसी दिग्गज फंस सकते हैं और यही चिंता
कांग्रेस को अब जरूर सताएगी। यही वजह है कि कांग्रेस ने डैमेज कंट्रोल
करना शुरू कर दिया है। इससे पहले कि अमर सिंह अपना मुंह खोलें कांग्रेस
रणनीतिकारों ने मोर्चा संभाल लिया। संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल
का कहना है कि उस समय कांग्रेस को वोट खरीदने की जरूरत नहीं थी। वामदलों
द्वारा समर्थन वापस लेने के बावजूद यूपीए-1 के पास पर्याप्त बहुमत था।
बंसल की दलील इसलिए भी जरूरी दिख रही है क्योंकि अदालत में सबसे पहला
सवाल यही उठेगा कि आखिर पूरे पकरण पर लाभ किसे मिला? कांग्रेस पवक्ता तथा
जाने-माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि हर केस में जरूरी नहीं
होता कि लाभ पाने वाला ही दोषी हो। क्योंकि कई बार फंसाने के इरादे से ही
अपराध किए जाते हैं यानि इससे पहले लोग यह कहें कि लाभ पाने वालों
(कांग्रेस) में से किसी को भी गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया जबकि रिश्वत
देने वाला और लेने वाला दोनों जेल भेज दिए गए हैं, जिनके लिए लेन-देन हुआ
वह अभी भी इज्जत के साथ सरकार चला रहे हैं। विरोधी दलों ने खासकर वामदलों
ने पधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से संसद में स्थिति साफ करने को कहा है।
कांग्रेस रणनीतिकार अच्छी तरह से जानते हैं कि पधानमंत्री चाहे जो
बोलें,सरकार कटघरे में जरूर खड़ी होगी। यदि वह कहेंगे कि उन्हें मामले की
जानकारी थी तो भी फंसे और यदि कहते हैं कि हमें कोई जानकारी नहीं थी तो
उनके नेतृत्व पर उंगलियां उठेंगी। इसलिए पवन कुमार बंसल ने अभी से कहना
शुरू कर दिया है कि इस विषय पर पधानमंत्री कुछ नहीं बोलेंगे। वामदलों की
मांग ठुकराते हुए उन्होंने कहा कि हर मामले में पीएम का बयान आवश्यक नहीं
होता। कुल मिलाकर बेचारे अमर सिंह गए तो बेल मांगने थे पर हो गई जेल।
बहुतों का कहना है कि यह अमर सिंह से अन्याय हुआ है। उनकी वाकई तबीयत
खराब है और पता नहीं कि वह तिहाड़ जेल की यात्रा सह भी सकेंगे?

हीरो से विलेन बने कर्नल मुअम्मर गद्दाफी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th September 2011
अनिल नरेन्द्र
लीबिया में विद्रोहियों को अब तक न तो कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को पकड़ने में सफलता मिली है और न ही वह उनके गृह नगर सिट्ते पर ही कब्जा कर पाए हैं। पिछले लगभग छह महीने से विद्रोहियों और गद्दाफी समर्थकों में लड़ाई चल रही है। गद्दाफी की हिम्मत और समर्थन की दाद देनी होगी कि एक तरफ तो उनके मुट्ठीभर समर्थक सैनिक हैं और दूसरी तरफ पश्चिमी देशों की पूरी मदद से लड़ रहे विद्रोही। पश्चिमी देश खासकर फ्रांस और अमेरिका हर सम्भव तरीके से इन विद्रोहियों की मदद कर रहा है। अमेरिका का दोहरा चेहरा एक बार फिर लीबिया में बेनकाब हुआ है। एसोसिएटेड प्रेस ने त्रिपोली में लीबियाई सुरक्षा एजेंसी की एक इमारत में पाए गए दस्तावेजों का खुलासा किया है जिससे पता चलता है कि सीआईए ने करीब से मुअम्मर गद्दाफी की खुफिया एजेंसियों के साथ काम किया। उन्होंने लीबिया के लिए संदिग्ध आतंकियों से पूछताछ में मदद की। इस घटनाक्रम से वाशिंगटन और लीबिया के शासकों के बीच तनाव का खतरा बढ़ गया है।
मुअम्मर गद्दाफी एक क्रांतिकारी से विलेन कैसे बन गया? वर्ष 1969 में जब उन्होंने सैनिक तख्ता पलट कर सत्ता हासिल की थी तो मुअम्मर गद्दाफी एक खूबसूरत और करिश्माई फौजी अधिकारी था। स्वयं को मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर का शिष्य बताने वाले गद्दाफी ने सत्ता हासिल करने के बाद खुद को कर्नल के खिताब से नवाजा और देश के आर्थिक सुधारों की तरफ तवज्जों दी, जो वर्षों की विदेशी अधीनता के चलते जर्जर हालत में थी। सत्ता पलट से पहले वे कैप्टन के पद पर थे। अगर नासिर ने स्वेज नगर को मिस्र की बेहतरी का रास्ता बनाया था, तो कर्नल गद्दाफी ने तेल के भंडार को इसके लिए चुना।
लीबिया में 1950 के दशक में तेल के बड़े भंडार का पता चला था लेकिन उसके खनन का काम पूरी तरह से विदेशी कम्पनियों के हाथ में था जो उसकी कीमत ऐसी तय करते थे, जो लीबिया के लिए नहीं बल्कि खरीददारों को फायदा पहुंचाती थी। गद्दाफी पहले अरब शासक थे जिन्होंने तेल उत्पादन से आई आमदनी का बड़ा हिस्सा अपने देश के विकास में लगाया और विदेशी कम्पनियों को पहली बार यह समझ आया कि अब वह अरब देशों का शोषण नहीं कर सकेंगे। लीबिया वह पहला विकासशील देश था जिसने तेल के खनन से मिलने वाली आमदनी में बड़ा हिस्सा हासिल किया। दूसरे अरब देशों ने भी उसका अनुसरण किया और अरब देशों में 1970 के दशक की पेट्रो-बूम यानि तेल की बेहतर कीमतों से शुरू हुआ खुशहाली का दौर आरम्भ हुआ।
कम लोगों को मालूम होगा कि लीबिया में गद्दाफी ने अपने नागरिकों को जो सुविधाएं दी थीं उनका मुकाबला करना मुश्किल है। हर लीबियाई नागरिक को बिना ब्याज के कर्जा मिल सकता है। छात्रों को पढ़ाई के दौरान जिस काम के लिए वह पढ़ रहे हैं उसका वेतन दिया जाता है। यह वेतन उतना होता है जितना वह नौकरी करने पर पाते। यह उन्हें पढ़ाई के दौरान ही दे दिया जाता है।
अगर आपको नौकरी नहीं मिल रही तो आपको सरकार नौकरी का पूरा वेतन तब तक देती रहेगी जब तक आपको नौकरी नहीं मिल जाती। जब लीबिया नागरिक शादी करता है तो उसे सरकार की तरफ से एक अपार्टमेंट या घर मुफ्त दिया जाता है।
छात्र दुनिया में कहीं भी पढ़ाई कर सकते हैं। सरकार इस दौरान उन्हें 2500 यूरोस के साथ-साथ रहने का, खाने का व कार एलाउंस तक देती है। लीबिया में गाड़ी कॉस्ट प्राइज पर बिकती है। हर नागरिक के लिए फ्री शिक्षा और मेडिकल चिकित्सा उपलब्ध है। कुल जनसंख्या में से 25 फीसदी लोग यूनिवर्सिटी की डिग्री हासिल किए हुए हैं। आपको सड़कों पर कोई भिखारी नहीं मिलेगा, न ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो बेघर हो। यही वजह थी कि गद्दाफी अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों की आंखों में खटकने लगे। गद्दाफी से अमेरिका कई वजहों से नाराज था। दरअसल गद्दाफी ने कुछ वर्षों शासन करने के बाद इस्लामी चरमपंथी संगठनों का समर्थन करना आरम्भ कर दिया। बर्लिन के एक नाइट क्लब पर साल 1986 में हुआ हमला इसी श्रेणी में था, जहां अमेरिकी फौजी जाया करते थे और जिस पर हमले का आरोप गद्दाफी के माथे मढ़ा गया हालांकि इसके कोई ठोस सबूत नहीं थे। घटना से नाराज अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने त्रिपोली और बेनगाजी पर हवाई हमलों की मार की। हालांकि हमलों में गद्दाफी बच गए, लेकिन कहा गया कि उनकी गोद ली बेटी हवाई हमलों में मारी गई। दूसरी घटना जिसने दुनिया को हिला दिया था वह थी लॉकबेरी शहर के पास पैनेम हवाई जहाज में बम विस्फोट जिसमें 270 लोग मारे गए थे। कर्नल गद्दाफी ने भारी दबाव के बावजूद हमले के दो संदिग्ध लीबियाई नागरिकों को स्कॉटलैंड के हवाले करने से मना कर दिया जिसके बाद लीबिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जो दोनों अधिकारियों के आत्मसमर्पण के बाद 1999 में हटाया गया, उनमें से एक मेगराही नाम के अधिकारी को उम्र कैद
हुई। जब दिसम्बर 2010 में ट्यूनीशिया से अरब जगत में बदलाव की क्रांति का प्रारम्भ हुआ तो उस संदेश में जिन देशों का नाम लिया गया उसमें लीबिया को पहली पंक्ति में नहीं रखा गया पर चूंकि कर्नल गद्दाफी पश्चिमी देशों के पिट्ठू बनने से इंकार करते थे इसलिए उन्हें जबरदस्ती निशाना बनाया गया।
उन्होंने तेल से मिले धन को भी दिल खोलकर बांटा। ये अलग बात है कि इस प्रक्रिया में उनका परिवार भी बहुत अमीर हुआ। इसलिए जब क्रांति की बात शुरू हुई तो उन्होंने कहा कि वह लोगों के साथ हैं, क्योंकि उनके पास कोई
सत्ता नहीं है और देश में जम्हूरियत है। लेकिन बाद में लोगों की नाराजगी सामने आई और जाहिर है कि कर्नल गद्दाफी उनका अपनी पूरी ताकत से विरोध कर रहे हैं। देर सवेर कर्नल गद्दाफी का पत्ता साफ होगा, क्योंकि उनके खिलाफ बहुत बड़ी ताकतें काम कर रही हैं और यह है कर्नल गद्दाफी की हीरो से विलेन तक की संक्षिप्त कहानी।
Anil Narendra, Daily Pratap, Libya, Moammar Qaddafi, Vir Arjun

नीतीश कुमार ने दिखाया भ्रष्ट अफसरों से निपटने का तरीका


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 7th September 2011
अनिल नरेन्द्र
भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी गूंज के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने रविवार को एक मिसाल कायम की है। अनैतिक तरीके से सम्पत्ति अर्जित करने वाले एफआईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) के वरिष्ठ अधिकारी
शिवशंकर वर्मा का रुकनपुरा स्थित बंगला जब्त कर लिया गया है। सरकार ने घोषणा कर दी कि वह अब बंगला सरकारी सम्पत्ति है। देश के लिए यह पहला मौका है जब किसी राज्य सरकार ने किसी अफसर की सम्पत्ति जब्त की हो। बिहार की राजग सरकार ने भ्रष्ट तरीके से अर्जित सम्पत्ति को जब्त करने का कानून (बिहार विशेष न्यायालय विधेयक 2009) बनाया हुआ है। देश के अन्य किसी सूबे में ऐसा कानून नहीं है। पटना के दंडाधिकारी के आदेश पर रविवार को एसएस वर्मा के आवास पर जब्ती की कार्रवाई शाम छह बजे तक चली। मूल रूप से लखनऊ में मोहन लाल गंज तहसील के नगराम थाना क्षेत्र में गरहा गांव के मूल निवासी वर्मा के खिलाफ स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने (डीए) का मुकदमा दर्ज किया हुआ है। छह जुलाई 2007 को एजेंसी ने उनके ठिकानों पर छापा मारा था। सिर्प उनके लॉकर से ही 9 किलो सोना बरामद हुआ। स्पेशल विजिलेंस यूनिट ने एसएस वर्मा पर 1.43 करोड़ का मुकदमा किया हुआ है। जांच एजेंसी को वर्मा के खिलाफ 3 जुलाई 2007 से आय से 68 लाख, 70 हजार रुपये अधिक सम्पत्ति रखने की जानकारी मिली थी। जांच के दौरान 19 लाख, 7 हजार, 910 रुपये नकद, 24854 अमेरिकी डालर, 22 लाख, 14 हजार, 893 रुपये का घरेलू सामान, तीन लाख 55 हजार 227 रुपये के आभूषण, 80 लाख, 78 हजार 596 रुपये का सोना, 27 हजार रुपये का वेवली स्कॉट रिवाल्वर, पटना-रायबरेली में एक लाख, 68 हजार रुपये की भूमि की जानकारी मिली।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी जंग का सार्थक चरण है। हमने ऐसी व्यवस्था की हुई है कि कोई सपने में भी गड़बड़ी करने का न सोचे। इसी मामले में साबित हो गया कि कोई गलत तरीके से सम्पत्ति को अर्जित करता है तो उसे छिपा नहीं सकता। ऐसी सम्पत्तियों को जब्त करके हम स्कूल खोलेंगे। उसका सार्वजनिक उपयोग होगा। आखिर पैसा तो जनता का ही है। अभी ढेर सारे लोग पाइप लाइन में हैं। देखते जाइए। निगरानी की विशेष अदालत से आरोप सिद्ध होने के बाद एसएस वर्मा ने हाई कोर्ट में राहत के लिए याचिका दायर की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 11 मई 2011 को निगरानी के विशेष न्यायाधीश आरसी मिश्रा ने राज्य सरकार के बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 के एक्ट 13(ई) के तहत सम्पत्ति जब्त का फैसला
सुनाया था। 19 अगस्त 2011 को पटना हाई कोर्ट ने इस पर अपनी मोहर लगाई और अंतत रविवार को पटना के जिला दंडाधिकारी संजय कुमार सिंह ने वर्मा के सौभाग्य शर्मा पथ रुकनपुरा स्थित बंगले को जब्त करने का आदेश पारित किया और जब्ती हो गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी राजग सरकार इस ठोस पहल के लिए बधाई की पात्र है। उन्होंने सारे देश को रास्ता दिखा दिया कि भ्रष्टाचार से निपटने का एक तरीका यह भी है।
Anil Narendra, Bihar, Corruption, Daily Pratap, Nitish Kumar, Vir Arjun

Tuesday, 6 September 2011

भारतीय जनता पार्टी का चढ़ता ग्रॉफ


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 6th September 2011
अनिल नरेन्द्र
भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छी खबर है। जन लोकपाल बिल पर सरकार की नाक में दम करने वाले समाजसेवी अन्ना हजारे ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भले ही अभी पूरी सफलता न पाई हो पर जनता की नजरों में अन्ना ने कांग्रेस को विलेन जरूर बनाने में कामयाबी हासिल कर ली और इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को हुआ है। स्टार न्यूज-नीलसन ने एक सर्वे किया है।
28 शहरों में करीब नौ हजार लोगों के बीच हुए इस सर्वे में भाजपा की आज की स्थिति मजबूत बताई गई है। सर्वे के अनुसार अगर वर्तमान में चुनाव हो जाएं तो भाजपा को सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे। सर्वे में 32 फीसदी लोगों ने भाजपा को सत्ता के लिए अपनी पसंद बताया है। वहीं 20 प्रतिशत लोगों ने कांग्रेस को पसंद किया है। देश के सभी क्षेत्रों में भाजपा को लोगों ने कांग्रेस की अपेक्षा तरजीह दी है। भाजपा और कांग्रेस का उत्तर में अनुमान 40ः27 का तो पूर्वी भारत में 20ः15 का रहा। पश्चिम में यही अनुपात 46ः15 का रहा।
दक्षिण में समीकरण थोड़ा अलग जरूर है। यहां अभी कांग्रेस को अधिक लोगों ने पसंद किया है। यहां कांग्रेस को 20 फीसदी तथा भाजपा को 16 फीसदी लोगों ने अपना मत सहयोग देने की बात कही है। उल्लेखनीय है कि स्टार-नीलसन ने मिलकर मई 2011 में एक सर्वे किया था। उसमें कांग्रेस को लोगों ने तरजीह दी थी। लेकिन एक-दो महीने बाद ही अन्ना के आंदोलन ने तस्वीर बदलकर रख दी है। मई के सर्वे में देशभर में करीब 30 फीसदी लोगों ने कांग्रेस को पसंद किया था, वहीं भाजपा के पक्ष में 27 फीसदी लोगों ने अपना मत दिया था। उस समय पश्चिम को छोड़कर कांग्रेस देश के हर क्षेत्र में मतदाताओं की पसंद बनी हुई थी। सर्वे की 10 बड़ी बातें यूं हैंöअन्ना का आंदोलन जहां सबसे तेज था, वहीं भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा। 54 फीसदी लोग मानते हैं कि कांग्रेस ने अन्ना के अनशन को ठीक से नहीं निपटा। 64 फीसदी लोग मानते हैं कि हालात से ठीक से निपटने के लिए प्रधानमंत्री से ज्यादा उनके वरिष्ठ मंत्री जिम्मेदार हैं। 75 फीसदी लोगों का कहना है कि भ्रष्टाचार के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां जिम्मेदार हैं। 54 फीसदी लोग मानते हैं कि राहुल गांधी को इस वक्त प्रधानमंत्री से दूर रहना चाहिए। 62 फीसदी लोगों का कहना है कि अरविन्द केजरीवाल युवकों के नायक बनकर उभरे हैं। राहुल गांधी, कपिल सिब्बल और पी. चिदम्बरम पर चुनावों में भारी पड़ सकते हैं अन्ना हजारे, किरण बेदी और केजरीवाल। 53 फीसदी लोग मानते हैं कि अगर मजबूत जन लोकपाल बिल पास हो तो 5 साल में देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। 49 फीसदी लोगों का मानना है कि रिश्वत न लेने और न देने की शपथ खाने से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। 82 फीसदी लोगों का मानना है कि अपनी मांग मनवाने का अन्ना का तरीका सही था, ब्लैकमेलिंग नहीं। यदि अन्ना और राहुल गांधी में चुनावी मुकाबला हो तो 74 फीसदी लोग गांधीवादी अन्ना हजारे को अपना वोट देंगे जबकि सिर्प 17 फीसद ही राहुल गांधी को वोट देंगे। कांग्रेस के लिए यह परिणाम खतरे की घंटी है। इससे पता चलता है कि जनता की नजरों में कांग्रेस की आज की तारीख में क्या स्थिति है। देश के बाहर भी भाजपा की स्थिति मजबूत होती दिख रही है।
देश में भले कांग्रेस और वामदलों को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का शासन रास नहीं आ रहा हो, लेकिन भारत का पड़ोसी और दुनिया के शक्तिशाली देशों में से एक चीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की शासन शैली का कायल हो गया है। इतना ही नहीं चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं और चीन के नीति निर्धारकों को भी लग रहा है कि भारत में 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में आ सकती है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। चीन नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक शैली से ज्यादा मोदी के शासन में गुजरात के औद्योगिक विकास को लेकर अभिभूत है। चीन के नीति-निर्धारकों को लग रहा है कि जिस प्रकार से मोदी के शासन में गुजरात का आर्थिक विकास हुआ है उसी प्रकार मोदी भारत
की अर्थव्यवस्था को भी नया मोड़ दे सकते हैं। चीन की यह राय इसलिए भी बनी है, क्योंकि भारत के कई प्रमुख उद्योगपति लगातार मोदी की उद्योग नीति की प्रशंसा कर उन्हें भविष्य का बेहतर प्रधानमंत्री बता चुके हैं। मोदी की कार्यशैली से उत्साहित चीन गुजरात के औद्योगिक विकास और विनिर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) के क्षेत्र में मोदी सरकार के साथ काम करने का इच्छुक है। चीन के राजदूत झांग यान ने स्वयं यह प्रस्ताव मोदी के सामने रखा है।
चीन के राजदूत ने खासतौर पर मोदी को चीन आने का भी निमंत्रण दिया है जिसे मोदी ने स्वीकार कर लिया है। चीन की यह नीति अमेरिका और यूरोप के कुछ अन्य देशों से ठीक उल्ट है। गुजरात दंगों को लेकर अमेरिका सहित यूरोप के कुछ देशों में मानवाधिकार संगठन मोदी का विरोध करते रहे हैं। इस आधार पर इन देशों ने मोदी को वीजा तक देने से इंकार किया है। वर्ष 2005 में जब मोदी अमेरिका जाने वाले थे तो अमेरिकी सरकार ने उन्हें वीजा नहीं दिया।
नतीजतन मोदी को अमेरिका में बसे गुजरातियों को वीडियो कांफ्रेंस के जरिये से ही संबोधित करना पड़ा। लिहाजा नरेन्द्र मोदी को लेकर चीन का बदलता यह रुख अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। चीन के नीति-निर्धारक यह भी मान रहे हैं कि जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के कार्यकाल में चीन और भारत के संबंध बेहतर हुए थे उसी प्रकार की संभावनाएं वे मोदी में भी देख रहे हैं। असल में जापान के बाद चीन भी नरेन्द्र मोदी में भारत के भावी प्रधानमंत्री की संभावनाएं नजर आ रही हैं। हालांकि चीन और मोदी के रिश्तों में आ रही निकटता के पीछे सिर्प यही कारण नहीं है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अन्ना के आंदोलन में भाजपा ने जिस तरह अपने पत्ते खेले हैं उससे उसे फायदा हुआ है पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि निकट भविष्य में भाजपा का नजरिया और व्यवहार कैसा होता है? क्या कुछ नेताओं का निजी स्वार्थ पार्टी के हितों से यूं ही ऊपर रहेगा? अगर ऐसी स्थिति रही तो अनुकूल माहौल होने के बावजूद हमें संदेह है कि पकी हुई फसल भाजपा काट पाए? भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा अन्दर से है। बाहर तो उसकी छवि सुधर रही है।
Anil Narendra, Anna Hazare, BJP, Congress, Daily Pratap, Lokpal Bill, Vir Arjun,

Sunday, 4 September 2011

Next agenda – electoral reforms

- Anil Narendra
published Sept 03, 2011

Anna Hazare has won the first battle for Lokpal issue. As Anna has
indicated, now the next movement would be for electoral reforms.
Emphasizing the importance of electoral reforms, Anna had said at
Ramlila Ground that the country must be ridden of corruption,
otherwise the leaders spending more than 10 crores rupees in a single
election, can never remain honest and righteous in politics. Anna has
raised two issues. First is 'right to reject' and second is 'right to
recall'. 'Right to recall' means that voters must have the right to
recall their representatives in mid term, in case they do not perform
according to the given mandate. I had raised this issue long ago in
this column. In Germany, this system is being followed and the present
government there has been elected on this basis. 'The right to reject'
would definitely maintain pressure on our elected representatives to
act honestly in the interest of the people. At present, once elected,
our representatives do not care for the people who have voted them to
power, for next five years. They are concerned only about the
dissolution of Parliament and they fear facing elections again. An
Independent MP from Jharkhand, Inder Singh Namdhari has said that the
demand for 'right to reject', is more appealing of Anna's demands.
This can put an end to the role of muscle power and black money in our
politics. Youth constitute a major part of our electorate. Today, the
youth is more aware of happenings around and is against
criminalization of the politics and wants to put an end to this
menace. This demand of Anna will ensure that only persons with clean
image gain entry into politics. Namdhari says that Jai Prakash
Narain's call to recall public representatives has already gained
acceptance in the country. It is, however, a distant and difficult
proposal. There is provision to recall the representatives in
Panchayats. But at present, in the absence of provision to this effect
in the country, it is not possible to recall our representatives. The
Congress has termed the demand for 'right to reject' as impractical,
as a large number of voters do not vote in the elections. They say
that voter today, has become more vigilant. Anna'a movement has
changed the situation. Members of Parliament are of the view that
movement for 'right to reject' or provision for an alternative to
discard the candidate at the time of polling, could be more dangerous.
They say that in case the government bow down to such a demand, it
would be quite impossible for them to conduct themselves in politics.
Arvind Kejariwal, an associate of Anna says that very soon, they will
be bringing an agenda before the public demanding electoral reforms.
They want to work for changing the electoral scenario of the country
within a year. The agenda of electoral reforms is broader than that of
Jan Lokpal's. In fact, this is a part of the transformation of the
current system. This would require mass awakening about the change,
only then political parties could be brought under an effective
pressure. Moreover, a number of Constitution amendments would be
required for effecting such a change. Team Anna has raised
expectations among people of enacting Lokpal law by 26th January.
Kejariwal does not think that government could dare create problems in
the wake of public pressure.

It would be appropriate that the electoral reform issues raised by
Anna be put to debate and this debate should be speeded up, as root
cause for corruption is the politics of elections, which is getting
costlier. The fact is that the candidates for Parliament and State
Assemblies spend lavishly on elections and after being elected, they
are driven by an urge to amass as much wealth as possible. They think
that they must have enough money to survive political exile, which may
result from loosing the next election. That is why they are after
earning maximum wealth and generally such wealth is earned through
dubious means. In fact, this is the reason which is prohibiting the
Manmohan government to take bold initiatives to curb black money. A
number of proposals are being presented to rid the electoral process
of black money. According to one of the proposals, government should
provide for election expenses. Recently, Rahul Gandhi put forward this
suggestion, but the Election Commission is not agreeable to it. It
fears that this will make the problem worse. According to the Chief
Election Commissioner, this is an unpractical suggestion, as the
candidates would be using their own resources also along with the
provision of government money to cover their election expenses. The
political parties must grasp the current situation and instead of
opposing electoral reforms, they must move forward with these reforms,
as like corruption, the common man is not going to tolerate the
dependence of polity on illegal resources any more. How can they look
after the welfare of the country, if the politics itself is not clean.

राजनीतिक आकाओं के कहने पर भेजा नोटिस ः अरविन्द केजरीवाल


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे के आंदोलन से गुस्से से भरी मनमोहन सिंह सरकार ने अब उन लोगों को चिन्हित कर निशाने पर लेना शुरू कर दिया है जिन्होंने उसकी मिट्टी पलीत करने में सक्रिय भूमिका निभाई। मीडिया पर लगाम लगाने के लिए विशेष ग्रुप बनाने की खबर है। अन्ना के मंच से सरकार को छूट करने वाले फिल्म अभिनेता ओम पुरी और किरण बेदी पर पहले ही मानहानि का केस लग चुका है। सांसदों के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणी को लेकर संसद में विशेषाधिकार हनन के मामले का सामना कर रहीं किरण बेदी का टीम अन्ना अब खुलकर साथ दे रही है। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि पूरी टीम एकजुट होकर किरण बेदी के साथ है। इस तरह के कदम से जनता के बीच यह धारणा जाएगी कि सांसद उनसे बदला लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जब नोटिस मिलेगा तो वह उस पर जवाब देगी।
टीम अन्ना के एक और महत्वपूर्ण सदस्य पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण सीडी प्रकरण में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने सीडी मामले में कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। इसमें जानकारी दी गई है कि
सीडी में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और शांति भूषण की बातचीत का टेप असली है। इसमें किसी तरह के जोड़तोड़ के प्रमाण नहीं हैं। यदि यह सीडी असली है तो यह सीधे-सीधे उच्चतम न्यायालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला बनता है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार इस मामले में उनके पास एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी है। वह गवाह है चर्चित सांसद अमर सिंह। उन्होंने पुलिस को पूछताछ में जानकारी दी है कि उन्होंने अपने घर के लैंडलाइन फोन से खुद शांति भूषण से मुलायम सिंह की बात कराई थी।
मनमोहन सिंह सरकार को सबसे ज्यादा खुंदक अरविन्द केजरीवाल से है। टीम अन्ना में केजरीवाल को वह सबसे बड़ा रोड़ा मानती है। अब केजरीवाल को भी कटघरे में खड़ा करने के प्रयास हो रहे हैं। अरविन्द केजरीवाल के भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से वर्ष 2006 में दिए गए इस्तीफे को केंद्र सरकार ने अब तक मंजूरी नहीं दी है। सेवा शर्तों के मुताबिक केंद्र सरकार ने समय से पहले नौकरी छोड़ने के लिए उनसे तीन लाख रुपये की मांग की थी। अब यह रकम नौ लाख हो गई है। केजरीवाल ने इससे छूट के लिए आवेदन किया था जिस पर
अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। सरकार से सीधे टकराव के बाद केंद्र सरकार का कार्मिक विभाग (डीओपीटी) केजरीवाल के इस्तीफे का मामला फिर से खोल सकता है। राजस्व सेवा के अधिकारी के तौर पर केजरीवाल ने वर्ष 2000 में दो साल का स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) ली थी। इस दौरान केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक उन्हें वेतन दिया गया था। इस अवधि के बाद उन्होंने दो साल का बिना वेतन का अध्ययन अवकाश भी लिया। सेवा शर्तों के मुताबिक छुट्टी से लौटने के बाद कम से कम तीन साल नौकरी करनी पड़ती है। लेकिन केजरीवाल ने इससे पहले ही 2006 में इस्तीफा दे दिया। ऐसे में डीओपीटी ने उनसे तीन लाख रुपये की मांग की। इसके जवाब में केजरीवाल ने आवेदन किया कि उनके पास इतनी रकम नहीं है, इसलिए उन्हें इससे छूट दी जाए। मगर अब तक डीओपीटी ने इस पर अंतिम फैसला नहीं किया है। हालांकि इस्तीफे के तुरन्त बाद केजरीवाल को इससे बड़ी रकम मैगसेसे पुरस्कार के तौर पर मिली थी।
शुक्रवार को अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उन्हें नौ लाख रुपये का भुगतान करने का नोटिस `राजनीतिक आकाओं' के कहने पर भेजा गया है। जन लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे द्वारा अनशन करने से 10 दिन पहले आयकर विभाग ने पांच अगस्त को केजरीवाल को एक नोटिस भेजा। नोटिस में केजरीवाल से उनके आयकर आयुक्त रहते हुए अध्ययन अवकाश पर जाने की अवधि की तनख्वाह, उस पर लगे ब्याज तथा कर्ज के पुनर्भुगतान की ब्याज सहित बकाया राशि को मिलाकर कुल 9.27 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा गया। केजरीवाल ने कहा कि आयकर विभाग ने मेरे दो वर्ष अवकाश पर रहने के दौरान प्रभावी रहे बांड की गलत व्याख्या की है। मैंने बांड का कोई उल्लंघन नहीं किया है। आयकर विभाग ने यह नोटिस राजनीतिक आकाओं के दबाव में भेजा है। हजारे के एक अन्य साथी कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने सबक नहीं लिया है और वह कुत्सित तरीके पर उतर आई है। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग द्वारा केजरीवाल को भेजे गए नोटिस में उनसे दो वर्ष की तनख्वाह के रूप में 3.54 लाख, उस पर ब्याज के रूप में 4.16 लाख, कम्प्यूटर के कर्ज की बकाया राशि के रूप में 51,000 रुपये और उस पर ब्याज के रूप में 1.04 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा है। इस तरह उन्हें नौ लाख से अधिक रुपये की राशि देने को कहा गया है।
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