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Thursday, 31 December 2020
बिना ड्राइवर की ट्रेन कितनी सुरक्षित है?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मजेंटा लाइन पर चलने वाली देश की पहली ड्राइवरलेस मेट्रो को हरी झंडी दिखाई। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि अटलजी के प्रयासों से देश में पहली मेट्रो की शुरुआत हुई थी। जब 2014 में हमारी सरकार बनी उस वक्त केवल 5 राज्यों में मेट्रो सर्विस थी आज 18 शहरों में मेट्रो सर्विस है। 2025 तक हमारा लक्ष्य मेट्रो सर्विस को 25 शहरों में शुरू करना है। दिल्ली में बिना ड्राइवर के ऑटोमेटिक चलती मेट्रो ट्रेन चालू हो गई है। आज आपकी दिल्ली मेट्रो दुनिया के चर्चित शहरों में शामिल हो गई है। अपनी दिल्ली तेजी से विकास कर रही है। देश की पहली ड्राइवरलेस मेट्रो 38 किलोमीटर लंबी मजेंटा लाइन पर चलेगी। 390 किलोमीटर में दिल्ली मेट्रो का नेटवर्क दिल्ली समेत आसपास के नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद जैसे शहरों को जोड़ता है। दिल्ली मेट्रो देश की सबसे बड़ी मेट्रो सेवा है। पहली बार इसका परिचालन 24 दिसम्बर, 2002 को शाहदरा और तीस हजारी स्टेशनों के बीच 8.4 किमी मार्ग पर हुआ था। मजेंटा लाइन दिल्ली में जनकपुरी वेस्ट और नोएडा बोटेनिकल गार्डन को जोड़ती है। इसी लाइन पर यह पहली ड्राइवरलेस ट्रेन तकनीक शुरू हुई है। इस तकनीक को 2021 के मध्य तक पिंक लाइन (मजलिस पार्क-शिव विहार) पर भी शुरू करने की योजना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उद्घाटन के बाद भाषण के दौरान कहा कि उन्हें तीन साल पहले मजेंटा लाइन के उद्घाटन का सौभाग्य मिला था और आज फिर इसी रूट पर देश की पहली ऑटोमेटिक मेट्रो ट्रेन का उद्घाटन करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा ये दिखाता है कि भारत कितनी तेजी से स्मार्ट सिस्टम की तरफ बढ़ रहा है। डीएमआरसी के मुताबिक अभी भी ज्यादातर ट्रेन को रिमोर्ट कंट्रोल के द्वारा ऑपरेशन रूम से नियंत्रित किया जाता है, जिसे ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर या ओसीसी कहते हैं। यहां से इंजीनियरों की टीमें पूरे नेटवर्क में रियल टाइम ट्रेन मूवमेंट पर नजर रखती है। ये एयर ट्रैफिक कंट्रोल की तरह होता है। डीएमआरसी के पास अभी तीन ओसीसी हैं जो दो मेट्रो मुख्यालय के अंदर और एक शास्त्राr पार्क में है। डीएमआरसी ने बताया कि यह ड्राइवरलेस ट्रेन पूरी तरह सुरक्षित है। उन्हेंने बताया कि मेट्रो को चलाने से जुड़े कई काम पहले से ही ऑटोमेटिक हैं। हाई रिजाल्यूशन के कैमरे लग जाने से ट्रेक पर केबिन से नजर रखने की जरूरत नहीं होगी। इस नए प्लान के मुताबिक ट्रेक और ट्रेन के ऊपर से गुजरने वाली तारों पर लगातार नजर रखी जाएगी और आपातकाल की स्थिति में तुरंत कदम उठाया जा सकेगा। कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीएमआरएस) जिसने 18 दिसम्बर को बिना ड्राइवर के ट्रेन की अनुमति दी थी। उनका ये सुनिश्चित करने का निर्देश है कि कमांड सेंटर पर सब कुछ साफ दिखे और ट्रेन पर लगे कैमरों को नमी से मुक्त रखा जाए। डीएमआरसी के मुताबिक उन्होंने प्रणालियों के निरीक्षण और समीक्षा के लिए एक सलाहाकार भी नियुक्त किया है। इसकी रिपोर्ट डीएमआरसी, सीएमआरएस को परिचालन शुरू होने के बाद देगा। कमांड सेंटर पर इफार्मेशन कंट्रोलर होंगे जोकि यात्रियों और भीड़ की मानिटरिंग करेंगे। इसके अलावा ट्रेन से जुड़ी दूसरी जानकारियों और सीसीटीवी की भी लगातार मानिटरिंग की जाएगी। यात्रियों में ड्राइवरलेस ट्रेनों में बैठने का डर तो रहेगा। पर समय के साथ जब वह कंविस हो जाएंगे कि यह ट्रेन सुरक्षित है तो यह डर भी खत्म हो जाएगा।
वकील महमूद प्राचा के खिलाफ केस दर्ज हुआ
हजरत निजामुद्दीन थाने में प्रसिद्ध वकील महमूद प्राचा व अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। उनके खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने व पुलिस टीम के साथ अभद्र व्यवहार करने का मामला दर्ज किया गया है। महमूद प्राचा के कार्यालय में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का सर्च ऑपरेशन गत बृहस्पतिवार को करीब 15 घंटे चला था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में एक दंगा पीड़ित को गलत बयान देने को कहा गया था। हलफनामा जिस नोटरी के नाम पर बनाया गया, उनकी तीन साल पहले 2017 में मौत हो चुकी है। उसकी पत्नी वकील है। नोटरी को दिल्ली सरकार द्वारा नोटरी का लाइसेंस मिला हुआ था। कोर्ट में बहस के दौरान इसकी पोल खुल गई। नोटरी की पत्नी ने कोर्ट में बयान दिया कि उसके पति की मौत हो चुकी है, उसने कोई हलफनामा नहीं बनाया है। इस पर कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त एसएन श्रीवास्तव को स्पेशल सेल व अपराध शाखा को इस मामले में मुकदमा दर्ज कर जांच करने के आदेश दिए। कोर्ट के निर्देश पर 22 अगस्त 2020 को स्पेशल सेल ने मुकदमा दर्ज कर जांच श्gारू कर दी। पुलिस का कहना है कि महमूद प्राचा ने जांच में सहयोग नहीं किया। पुलिस के पूछने पर भी प्राचा ने कंप्यूटर व उसके पासवर्ड के बारे में नहीं बताया। पुलिस ने कंप्यूटर व लैपटॉप आदि को खंगाला। आरोप है कि वहां अन्य लोगें को बुला लिया गया था। स्पेशल सेल की ओर से बृहस्पतिवार रात को ही निजामुद्दीन थाने में शिकायत दर्ज कर दी गई थी। स्पेशल सेल ने इस बारे में शुक्रवार को सफाई देते हुए कहा कि प्राचा और जावेद के दफ्तर पर छापे मारी कोर्ट के आदेश पर की गई थी। 15 घंटे तक चले सर्च ऑपरेशन के दौरान पुलिस टीम के साथ स्वतंत्र गवाह, वर्दी में पुलिसकर्मी और महिला पुलिसकर्मी समेत डीसीपी मनीषी चंद्र आदि अधिकारी भी मौजूद थे। छापेमारी की वीडियोग्राफी भी की गई। वकील महमूद प्राचा ने उनके कार्यालय में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा छापा मारने के दौरान की गई वीडियोग्राफी को सुरक्षित रखने के लिए अदालत में आवेदन दायर किया है। इतना ही नहीं उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज किए गए मामले की जांच को लगातार निगरानी करने का भी आग्रह किया है। अदालत ने इस मामले में पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पटियाला हाउस के ड्यूटी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अंशुल सिंघल ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर 27 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। अदालत ने जांच अदालत की निगरानी में करने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई 5 जनवरी तक स्थगित कर दी है। दिल्ली दंगों के कई आरोपियें की पैरवी अधिवक्ता महमूद प्राचा कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि पूरे मामले की सुनवाई संबंधित अदालत में होगी और वही अदालत ही जब्त सामान को वापस दिलवाने व वीडियो की प्रति दिलवाने संबंधी मांग पर विचार करेगी। अधिवक्ता प्राचा ने आवेदन दाखिल कर अपने दफ्तर से जब्त सामान वापस लौटाने एवं उस दौरान बनाई गई वीडियो फुटेज को दिलवाने की मांग की थी। इस मामले में अदालत ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था और जांच अधिकारी को जब्त सामान व वीडियो फुटेज को साथ लाने को कहा। मामला अदालत में है और अब इस पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना सही नहीं है। महमूद प्राचा अगर निर्दोष हैं तो निश्चित रूप से वह खुद अपनी पैरवी कर खुद को निर्दोष साबित करा सकते हैं। अगर उनके साथ नाइंसाफी हुई है तो भी अदालत फैसला कर लेगी।
-अनिल नरेन्द्र
Wednesday, 30 December 2020
इसलिए बनाया जाए शरद पवार को संप्रग अध्यक्ष
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का अध्यक्ष बनाने की चर्चा एक पखवाड़े में दूसरी बार छेड़ी गई है। उनके 80वें जन्मदिन से ठीक पहले भी चर्चा उठी थी। अब शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिये शरद पवार का नाम लिए बिना उन्हें संप्रग की जिम्मेदारी सौंपने की वकालत की है। सामना के संपादकीय में शनिवार को जहां कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग की कमियां गिनाई गईं। वहीं पवार की तारीफ में कसीदे काढ़े गए हैं। संपादकीय कहता हैöकांग्रेस के नेतृत्व मे यूपीए (संप्रग) की हालत किसी एनजीओ जैसी दिख रही है। इसमें शामिल दल कौन है, क्या करते हैं, इस पर भ्रम की स्थिति है। यूपीए के सहयोगी दल किसान आंदोलन को गंभीरता से लेते नहीं दिखाई देते। पवार के नेतृत्व वाली राकांपा को छोड़ दें तो यूपीए के अन्य सहयोगी दलों में कोई हलचल नहीं है। संपादकीय कहता हैöपवार का एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है। उनके अनुभव का लाभ पीएम नरेंद्र मोदी सहित दूसरी पार्टियां भी लेती हैं। बंगाल में भाजपा से लड़ रही ममता बनर्जी ने हाल ही में उनसे बात की है। महाराष्ट्र की शिवसेना नीत सरकार में कांग्रेस शामिल है, इसलिए सामना ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व राहुल गांधी की सीधी आलोचना के बजाय सिर्फ संप्रग की कमियां गिनाईं। अखबार ने लिखा कि कांग्रेस में एक साल से पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है। सोनिया यूपीए की अध्यक्षा हैं और कांग्रेस का नेतृत्व कर रही हैं। लेकिन उनके आसपास के पुराने नेता अदृश्य हो गए हैं। मोती लाल वोरा और अहमद पटेल जैसे लोग अब नहीं रहे। ऐसे में कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा? यूपीए का भविष्य क्या है, इसे लेकर भ्रम बना हुआ है। जिस तरह कांग्रेस में कोई नहीं, इसी तरह यूपीए में भी कोई नहीं है। लेकिन भाजपा पूरी सामर्थ्य के साथ सत्ता में है और उनके पास नरेंद्र मोदी जैसा दमदार नेतृत्व और अमित शाह जैसा राजनीतिक व्यवस्थापक है। सामना में लिखा गया कि अभी जिस तरह की रणनीति विपक्ष ने अपनाई है, वह मोदी और शाह के आगे बेअसर है। संप्रग में नेतृत्व की कमजोरी की ओर इशारा करते हुए कहा गया कि तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, अकाली दल, मायावती की बसपा, अखिलेश की सपा, आंध्र में जगन की वाईएसआर कांग्रेस, चन्द्रशेखर राव की टीआरएस, नवीन पटनायक की बीजद जैसे कई दल भाजपा के विरोध में है लेकिन वह कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए में शामिल नहीं हुए। जब तक यह दल यूपीए में शामिल नहीं होंगे, विपक्ष का बाण सरकार को भेद नहीं सकेगा। सामना में निशाना साधे जाने के बाद अब कांग्रेस ने पलटवार किया है। शिवसेना को हिदायत देते हुए कांग्रेस नेता और पूर्व सीएम अशोक चव्हाण ने कहा कि जो पार्टी यूपीए का हिस्सा नहीं, वो यूपीए के नेतृत्व के बारे में कांग्रेस को सलाह न दे। सोनिया जी का नेतृत्व सक्षम है। साथ ही उन्होंने कहा कि शरद पवार ने खुद स्पष्ट किया है कि वह यूपीए की कमान नहीं संभालेंगे। वहीं कांग्रेस के नेता नसीम खान ने भी शिवसेना पर कहा कि पार्टी ने महाराष्ट्र में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के आधार पर शिवसेना को समर्थन दिया है। शिवसेना यूपीए का हिस्सा नहीं है, इसलिए यूपीए के बारे में शिवसेना को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार नहीं है और शिवसेना को यह ध्यान रखना चाहिए।
भाजपा का यह कदम गठबंधन धर्म के खिलाफ है
अरुणाचल प्रदेश में जनता दल (यूनाइटेड) के छह विधायक भाजपा में शामिल होने के बाद दोनों पार्टियों के रिश्तों पर फिलहाल कोई असर भले न पड़े, पर भाजपा के इस कदम ने गठबंधन में अविश्वास की नींव जरूर डाल दी होगी। अरुणाचल में जनता दल (यूनाइटेड) को झटका देते हुए उसके सात में से छह विधायक सहयोगी सत्तारूढ़ भाजपा में शामिल हो गए हैं। साथ ही पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (पीपीएपी) का एक विधायक भी पार्टी बदलकर भाजपा में शामिल हो गया है। पंचायत और नगर निगम चुनाव के नतीजों की घोषणा से एक दिन पहले यह बदलाव हुआ। 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में 15 सीटों पर उतरी जनता दल (यू) सात सीटें जीतकर भाजपा के बाद दूसरी बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा ने 41 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बदलाव के बाद 60 सीटों की विधानसभा में अब भाजपा के 48 विधायक हो गए हैं, वहीं कांग्रेस और एनसीपी के चार-चार विधायक हैं। जदयू महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि यह गठबंधन धर्म की भावना के खिलाफ है। जदयू के लिए यह बात समझ से परे है कि बिहार में गठबंधन के बावजूद भाजपा ने यह फैसला क्यों किया? केसी त्यागी का कहना है कि जदयू अरुणाचल प्रदेश में दोस्ताना विपक्ष था। दोनों पार्टियां एनडीए के हिस्सा हैं। ऐसे में यह क्यों हुआ, भाजपा ही बता सकती है? दरअसल पूर्वोत्तर में भाजपा लगातार खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। असम में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के चुनाव में भाजपा ने सहयोगी बोडो पीपुल्स फ्रंट का साथ छोड़कर यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल और गण सुरक्षा पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन सिर्फ बिहार तक सीमित है। वर्ष 2019 के अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में जदयू 15 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और सात सीट जीतकर सभी को चौंका दिया था। प्रदेश की राजधानी ईटानगर में भी जदयू की जीत हुई थी। हालांकि दूसरी बड़ी पार्टी रहने के बावजूद जदयू ने विपक्ष में बैठने के बजाय सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। ऐसा पहली बार हुआ है, जब सत्ता में रहते हुए अपने सहयोगी दल के विधायकों को किसी बड़ी पार्टी ने अपने में शामिल कर लिया है। माना जा रहा है कि सात में से छह विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कराकर भाजपा ने जदयू को एक बड़ा संदेश भी दिया है। भाजपा द्वारा जदयू विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल किए जाने पर कांग्रेस और राजद ने तंज कसा है। कांग्रेस ने कहा है कि भाजपा विपक्षी पार्टी को तो तोड़ती रही है पर अरुणाचल प्रदेश की घटना ने साफ कर दिया है कि अब वह सहयोगी दल को भी तोड़ने लगी है। वहीं राजद ने कहा कि भाजपा ने जदयू के विधायकों को पार्टी में शामिल कर गठबंधन धर्म पर घात किया है। इससे एनडीए के अन्य घटक दलों को खासकर कम विधायकों वालों को झटका लगा है और अब सब चिन्ता और सोच में पड़ गए होंगे कि कहीं उनकी पार्टी पर भी भाजपा सेंध न लगा दे। समझ से बाहर है कि जब 60 सीटों के विधानसभा में भाजपा के पास बहुत (30) से कहीं ज्यादा सीटें (41) थीं तो उन्हें जदयू के विधायकों को क्यों तोड़ा? अरुणाचल में टूट से जदयू को बड़ा झटका लगना स्वाभाविक ही है। जदयू न सिर्फ केंद्र में एनडीए का हिस्सा है, बल्कि बिहार में भी भाजपा के साथ सरकार चला रही है। क्या नीतीश अपनी पार्टी का भाजपा में विलय तो नहीं चाहते?
आजादी की लड़ाई देखी, अब किसान हित के लिए लड़ूंगी
किसान आंदोलन हर नए दिन व्यापक रूप लेता जा रहा है। लाखों अन्नदाता इस समय राजधानी की सीमाओं पर डटे हुए हैं। इनमें छोटे बच्चों से लेकर बड़ी तादाद में बुजुर्ग भी शामिल हैं। ऐसी ही एक महिला हैं जसविंदर कौर, जिन्होंने 15 साल की उम्र में 1945 में हुई आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लिया था। अब वह दिल्ली के टीकरी बॉर्डर पर आंदोलन में भी हिस्सा ले रही हैं। उनका कहना है कि जब तक केंद्र सरकार कृषि कानून वापस नहीं लेती, वह आंदोलनरत किसानों के साथ डटी रहेंगी। दिल्ली के नांगलोई इलाके की रहने वाली जसविंदर कौर (90) मूल रूप से पंजाब के संगरूर जिले की रहने वाली हैं। कड़ाके की ठंड और कोरोना के डर के बावजूद वह पिछले एक सप्ताह से टीकरी बॉर्डर पर किसानों का समर्थन कर रही हैं। उन्होंने बताया कि देश की आजादी के लिए जिस प्रकार से उन्होंने संघर्ष किया था, उसी प्रकार किसान आंदोलन में भी वह अन्नदाताओं के हित के लिए लड़ेंगी। किसानी उन्हें विरासत में मिली है और वह अपनी चौथी पीढ़ी देख रही हैं। उनके कुनबे में 1‹0 लोग हैं। सब किसी न किसी रूप से खेती से जुड़े हुए हैं। जसविंदर कौर कहती हैं कि कई दिनों से वह टीवी पर किसान आंदोलन की खबरें देख रही थीं। उन्होंने देखा कि कड़ाके की ठंड में भी किसान सड़कों पर डटे हुए हैं। कई अन्नदाताओं की जान भी जा चुकी है। यह देखकर उन्हें काफी पीड़ा हुई। उन्होंने ठाना कि इस लड़ाई में वह भी आंदोलन में शामिल होंगी और कानूनों की वापसी तक किसानों का समर्थन देती रहेंगी। उन्होंने कहा कि जब 1965 में वह दिल्ली आई थीं उस दौरान यमुना नदी के आसपास कई किलोमीटर के क्षेत्र में खेतीबाड़ी होती थी, लेकिन वक्त के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। धन्य हैं जसविंदर कौर जी का जज्बा। इतनी उम्र में भी डटी हुई हैं।
-अनिल नरेन्द्र
Tuesday, 29 December 2020
थका दो, भगा दो नीति पर काम कर रही सरकार
सरकार ने फिर किसानों को खत लिखा है और वार्ता के लिए बुलाया है। किसान बुधवार को मिलने वाले भी हैं। किसान और सरकार दोनों एक-दूसरे को अब तक समझ चुके हैं। आंदोलनकारी किसानों ने सरकार से उन बातों का जवाब मांगा है जिनको उन्होंने शुरू से ही उठाया है। सरकार उन मुद्दों पर न तो बातचीत कर रही है, उन्हें मनाना तो दूर की बात रही। प्रधानमंत्री के आदेश पर सरकार का हर नेता आजकल जनता को इन कानूनों के बारे में समझाने निकला है। प्रधानमंत्री हर भाषण में इन कानूनों की अच्छाइयां बताने के साथ-साथ तमाम विपक्षी पार्टियों पर आरोप लगाते हैं कि वह भोलेभाले किसानों को बरगला रही हैं। अगर किसान विपक्षी नेताओं से गुमराह हो रहा है जिन्हें मीडिया वैसा कवरेज भी नहीं देता तो पार्टी के मंत्री व स्थानीय नेताओं की कौन सुनेगा? दूसरा अगर विपक्षियों में बरगाने की इतनी ही कूवत होती तो वह डेढ़ साल पहले हुए आम चुनाव में जीत न जाते? क्या विपक्षी नेताओं की विश्वसनीयता लाखों किसानों को सर्दी में सड़कों पर भी उसी संकल्प से कष्ट सहने को मजबूर कर सकती है? सत्ता की नियति है कि इसके होशियार लोग भी कई बार गलती करते रहते हैं और अंत तक उन्हें समझ में नहीं आता कि करना क्या था? उदाहरण देखें, कनाडा में इन किसानों के रिश्तेदार हैं, जो खुद भी इन किसानों के परिवारों से हैं जो मदद भेज रहे हैं उस पर कुछ मंत्री विदेशी फंड बताकर आंदोलन को जन-विमर्श में कलंकित करना चाहते हैं। वह यह क्यों नहीं समझ रही कि यह किसानों के अस्तित्व की लड़ाई है और सरकार ने उन्हें आजीविका का कोई अन्य विकल्प नहीं दिया है। कांग्रेस ने दावा किया है कि केंद्र सरकार अन्नदाताओं को थका दो, भगा दो की नीति पर काम कर रही है। कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने संवाददाताओं से कहा कि 31 दिन से हाड़ कंपाती सर्दी में देश का अन्नदाता किसान दिल्ली के दरवाजे पर न्याय की गुहार कर रहा है। अब तक 44 किसानों की शहादत हो चुकी है। मगर पूंजीपतियों की पिछलग्गू मोदी सरकार का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा सरकार किसानों को थका दो और भगा दो की नीति पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री टीवी पर सफाई और उनके मंत्री चिट्ठियों की दुहाई देते हैं, मगर मुट्ठीभर पूंजीपतियों की सेवक सरकार किसानों की दुश्मन बन बैठी है, कड़वा सत्य यह है कि मोदी सरकार राजनीतिक बेइमानी, धूर्तता व प्रपंच का सहारा लेकर समस्या का समाधान नहीं करना चाहती है। किसानों के रास्ते में सड़क खुदवाने वाले, किसानों पर सर्दी पर वॉटर केनन चलवाने वाले और लाठियां बरसाने वाले प्रधानमंत्री मोदी अब फिर सम्मान निधि का स्वांग रच रहे हैं। उन्होंने कहा कि आप आज किसानों को आतंकी, कुकुरमुत्ता, टुकड़े-टुकड़े गैंग, गुमराह गैंग, खालिस्तानी बता रहे हैं और आप उलटा खुद बरगला रहे हैं, विपक्षी नहीं। शर्मनाक है कि कृषि मंत्री ने भी अपने पत्र में किसानों को राजनीतिक कठपुतली तक कह दिया।
रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स केसों में भारत सरकार को बड़ा झटका
रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स का मामला केंद्र सरकार के गले की हड्डी साबित हो रहा है। इस मामले में वोडाफोन से करीब 20 हजार करोड़ रुपए का केस हारने के बाद अब भारत सरकार ब्रिटिश कंपनी केयर्न एनर्जी से 10,247 करोड़ रुपए के टैक्स विवाद का केस भी हार गई है। नीदरलैंड के हेग स्थित ट्रिब्यूनल ने इस मामले के केयर्न के पक्ष में फैसला सुनाया है। केयर्न एनर्जी ने बुधवार को कहा कि उसने भारत के खिलाफ मध्यस्थता अदालत में जीत हासिल की है, जिसमें रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स के रूप में 10,247 करोड़ रुपए मांगे गए थे। सूत्रों के मुताबिक तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण ने आदेश दिया कि 2006-07 में केयर्न द्वारा अपने भारत के व्यापार के आंतरिक पुनर्गठन करने पर भारत सरकार का 10,247 करोड़ रुपए का रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स का दावा उचित नहीं है। इस न्यायाधिकरण में भारत सरकार की ओर से नियुक्त एक न्यायाधीश भी शामिल है। न्यायाधिकरण ने भारत सरकार से यह भी कहा कि कंपनी का जो फंड सरकार के पास है, वह ब्याज सहित कंपनी को वापस किया जाए। भारत सरकार ने केयर्न इंडिया का टैक्स रिफंड रोक रखा है। इसके साथ ही डिविडेंड जब्त कर रखा है। बकाया टैक्स के भुगतान के लिए कुछ शेयर बेच भी दिए गए हैं। अब भारत सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकती है। इससे पहले हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता प्राधिकरण ने वोडाफोन के पक्ष में फैसला देते हुए इस कंपनी से टैक्स के रूप में करीब 22,000 करोड़ रुपए की मांग को गलत करार दिया था और इसे समानता की नीति के खिलाफ बताया था। दरअसल 2012 में तत्कालीन सरकार ने संसद में रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स से संबंधित कानून को मंजूरी दे दी थी, जिसके तहत कंपनियों से अतीत में किए गए सौदों के आधार पर पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन) कर वसूला जा सकता है। वोडाफोन और केयर्न से जिन सौदों को लेकर मांग की गई, वह इस कानून के अस्तित्व में आने से पहले के थे। इसी साल सितम्बर में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने वोडाफोन से कर वसूली और नीदरलैंड के बीच हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते में दी गई उचित और सामान व्यवहार की गारंटी का उल्लंघन माना और दूरसंचार कंपनी को हुए नुकसान की भरपायी के भी निर्देश दिए। दरअसल भारत सरकार का स्पष्ट मानना है कि कर व्यवस्था देश की संप्रभुता से जुड़ी है और इसमें बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत सरकार की मुश्किलें वोडाफोन और केयर्न के साथ ही खत्म नहीं हुई हैं। हेग स्थित ट्रिब्यूनल में वोडाफोन और केयर्न जैसे रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स के एक दर्जन मामलों पर सुनवाई हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वोडाफोन मामले की नजीर को ध्यान में रखते हुए इन मामलों में भी भारत सरकार के खिलाफ ही फैसला सुनाया जाएगा? आखिर कंपनियां भारत के बाहर मुकदमा लड़ना क्यों पसंद करती हैं? जानकारों की मानें तो इसकी दो वजह हैं। पहली भारतीय न्याय व्यवस्था में बार एसोसिएशन का दबदबा है और वह विदेशी वकीलों और लॉ फर्मों को देश में वकालत करने से रोकती है। इस वजह से कंपनियों को लगता है कि वह अपने लिए सर्वश्रेष्ठ वकील खड़ा नहीं कर सकते। दूसरी वजह है कि यह कंपनियों को जल्दी फैसले की इच्छा रहती है, क्योंकि मुकदमा लंबा चलने से दोनों पक्षों को नुकसान होता है। फिर इन्हें लगता है कि हमारी अदालतों पर सरकारी दबाव होता है।
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