Tuesday, 30 December 2025

रेप पीड़िता को मिला न्याय

 
उन्नाव दुष्कर्म मामले में आरोपी कुलदीप सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट से मिली राहत को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर रेप पीड़िता को न्याय दिया है। यह अत्यन्त दुख और चिंता का विषय है कि कानूनी नुक्तो का फायदा उठाकर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के दोषी को भी कई बार रियायत दे दी जाती है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक नाबलिक लड़की से बलात्कार के मामले में वर्ष 2019 में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को उम्र कैद की सजा हुई थी। अदालत ने भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार के मामले और बच्चे-बच्चियों के यौन शोषण से सुरक्षा के कानून पॉस्को में गंभीर हिंसा के प्रावधानों के मुताबिक सजा दी थी। तब यह घटना देश भर में व्यापक चिंता और आाढाsश का कारण बनी थी। मगर दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर की सजा निलंबित करने का आदेश दे दिया। इस संदर्भ में एक अहम तथ्य यह है कि दोषी सिद्ध होने के बाद निचली अदालत ने साफ कहा था कि सेंगर को जीवन भर जेल में रहना होगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 के इस उन्नाव दुष्कर्म मामले में निष्कासित भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर की जेल की सजा निलंबित करके उन्हें जमानत दे दी। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर गई और न्याय की दुहाई मांगने पर मजबूर हो गई। पीड़िता के परिवार और अन्य महिला कार्यकर्ताओं ने पावार को दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर सेंगर की जमानत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और अपनी नाराजगी जाहिर की। जनता के विरोध को देखते हुए सीबीआई ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पावार को ही सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई के वकील ने भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी से संबंधित एक मामले में यह अभिनिर्धारण किए जाने का हवाला दिया कि एमपी और एमएलए लोक सेवक होते हैं। मात्र इसी दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को मिले दिल्ली हाईकोर्ट से राहत को निरस्त कर दिया और यह निश्चित हो गया कि अब सेंगर को आजीवन जेल में ही रहना होगा। अधिवक्ता अंजले पटेल और पूजा शिल्पकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई। उन्होंने तर्क दिया है कि हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर विचार किए बिना आदेश पारित किया कि ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि सेंगर को अपनी शेष प्राकृतिक जीवन अवधि तक जेल में रहना चाहिए। हाईकोर्ट ने सेंगर को जमानत सजा निलंबन देने में कानून और तथ्यों में गंभीर त्रुटि की है, जबकि इसे गंभीर आपराधिक अतीत और दुष्कर्मों के घृणित अपराधों में उसकी स्थापित संलिप्तता को ध्यान में नहीं रखा गया। दरअसल इस घटना के बाद पीड़िता को जिन हालात का सामना करना पड़ा और उसको जीवन तक पर जिस तरह के जोखिम खड़े हुए थे, वे बेहद अप्रत्याशित हो मगर उससे साफ था कि जघन्य अपराधों के बाद एक ऊंचे राजनीतिक रसूख वाला आरोपी पीड़िता को खामोश करने के लिए किस हद तक जा सकता है। इस दौरान पीड़िता के पिता की जान चली गई। एक ट्रक ने उस कार को टक्कर मार दी, जिसमें वह परिवार के अन्य लोगों के साथ जा रही थी। उस घटना में पीड़िता और उसका वकील बुरी तरह घायल हो गए, जबकि उसकी दो मौसियों की मौत हो गई। समझा जा सकता है कि इस पूरे मामले में पीड़िता को किस तरह के हालात का सामना करना पड़ा। जब किसी रसूख वाले अपराधी की सजा को लेकर रियायत बरतने की खबर आती है, तब यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर कानून के काम करने के पैमाने क्या हैं? कहा जाता है कि न्याय केवल होना नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िता को न्याय देने के उद्देश्य से आरोपी की सजा को बहाल कर दिया जो स्वागत योग्य है। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 25 December 2025

एपस्टीन फाइलों में दबे हैं कई राज


अमेरिकी न्याय विभाग ने कुख्यात फाइनेंसर और यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जुड़े मामलों की जांच से संबंधित 13 हजार से ज्यादा फाइल सार्वजनिक कर दिए हैं। वे दस्तावेज उस कानून के तहत जारी किए गए हैं। जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने हस्ताक्षर किए थे। हालांकि लंबे इंतजार के बावजूद इन फाइलों से अभी तक कोई चौंकाने वाले खुलासे नहीं हुए हैं। ज्यादातर दस्तावेजों को भारी रूप से ब्लैक किए गए हैं। जेफरी एपस्टीन की मौत हो चुकी है। अमेरिकी संसद ने एक कानून पास किया था, जिसके तहत शुक्रवार तक सभी फाइलों को पूरी तरह सार्वजनिक करना जरूरी था। लेकिन अब तक कुछ ही दस्तावेज जारी किए गए हैं, वो भी कई जगह भारी काट-छांट के साथ। इन दस्तावेजों को सार्वजनिक कराने के लिए दबाव बनाने वाले सांसदों ने विभाग की कोशिश को गैर-गंभीर बताया है। वहीं कुछ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी ज्यादा काट-छांट से साजिश से जुड़ी धाराएं और मजबूत हो सकती हैं। जारी सामग्री में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फोटो भी जारी किया गया है, हालांकि उन्हें बचाने की भी पूरी कोशिश की गई है। फाइलों में एक फोटो शामिल है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जेफरी एपस्टीन, मेलानिया ट्रंप और गिलेन मैक्सवैल (एपस्टीन की गर्लफ्रेंड) साथ नजर आ रहे हैं। जस्टिस डिपार्टमेंट ने इन फाइलों के हटने को लेकर अब तक कोई सफाई नहीं दी है। जो फाइले सार्वजनिक की गई हैं उनमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, ब्रिटेन के शाही परिवार से जुड़े एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर, मशहूर गायक मिक जैगर और माइकल जैक्सन के नाम शामिल हैं। हालांकि इन फाइलों में किसी का नाम होना या उनकी तस्वीर होना यह साबित नहीं करता कि उन्होंने कोई गलत काम किया है। जिन लोगों के नाम इन दस्तावेजों में आए हैं या पहले भी एपस्टीन से जुड़े मामलों में सामने आए थे, उनमें से कई ने किसी भी तरह की गलत गतिविधि से इंकार किया है। जारी की गई कई तस्वीरों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन स्विमिंग पूल में दो महिलाओं के साथ तैरते दिखते हैं। यह तस्वीर हॉट टब की लगती है। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में बिल क्लिंटन की जेफरी एपस्टीन के साथ कई बार तस्वीरें ली गई थीं। क्लिंटन हालांकि यह कहते हैं कि उन्हें एपस्टीन के यौन अपराधों की कोई जानकारी नहीं थी। दस्तावेजों के मुताबिक जेफरी एपस्टीन ने कथित तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात एक 14 साल की लड़की से कराई गई थी। अमेरिकी न्याय विभाग ने जो फाइलें जारी की हैं उनमें राष्ट्रपति ट्रंप का भी जिक्र है। अदालत के कागजों के मुताबिक यह मुलाकात फ्लोरिडा के मार-ए-लागो रिसॉर्ट में 1990 के दशक की बताई जाती है। दस्तावेज में कहा गया है कि एपस्टीन ने ट्रंप को कोहनी मारकर लड़की की ओर इशारा किया और मजाकिया अंदाज में पूछा कि यह अच्छी है ना...? ट्रंप मुस्कराए और सहमति से सिर हिलाया। दस्तावेज के मुताबिक इसे लेकर दोनों हंसे थे और लड़की को असहज महसूस हुआ। लेकिन उस समय वह इतनी छोटी थी कि उस हंसी की वजह वे समझ नहीं पाई। सर्वाइवर का आरोप है कि एपस्टीन ने कई सालों तक उसे बहकाया और उसका शोषण किया। हालांकि अदालत में दायर कागजों में लड़की ने ट्रंप पर कोई आरोप नहीं लगाया है। इन दस्तावेजों पर प्रतिक्रिया देते हुए व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एबिगेल जैक्सन ने बयान दिया कि ट्रंप प्रशासन इतिहास का सबसे पारदर्शी प्रशासन है। उन्होंने कहा कि हजारों पन्नों के दस्तावेज जारी किए गए हैं और हाउस ओवरसाइट कमेटी की जांच में सहयोग किया गया है। उधर डिप्टी अटार्नी जनरल टॉड ब्लांश ने कहा है कि कई लाख पन्नों की अभी भी जांच चल रही है। ये दस्तावेज अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। हाउस ओवरसाइट कमेटी के डेमोक्रेटिक सदस्यों ने इससे जुड़ी तस्वीर के गायब होने पर सवाल उठाए हैं और पूछा कि और क्या छिपाया जा रहा है? अभी तो खेला शुरू हुआ है, आगे-आगे देखें होता है क्या?
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 23 December 2025

फिर उठी बांग्लादेश में अशांति की लहर


बांग्लादेश में युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद एक बार फिर अशांति और हिंसा की लहर आ गई है। 15 महीने बाद फिर हिंसा भड़क गई। भारत विरोधी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद कट्टरपंथियों ने गुरुवार देर रात चट्टोग्राम में भारतीय उच्चायोग पर हमला कर दिया। यहां पर उच्चायुक्त का निवास स्थान भी है। दंगाइयों ने जमकर पथराव किया और मयमनसिंह के भालुका में दंगाइयों ने ईशनिंदा का आरोप लगा हिन्दू युवक दीपू चंद्र दास की पीट-पीट कर हत्या कर दी और पेड़ पर लटकाकर शव को जला दिया। बता दें कि कट्टरपंथी हादी ने पिछले साल अगस्त में छात्र आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। हादी हाल ही में जमात-ए-इस्लामी से जुड़े इंकबाल मंच में शामिल हो गया था। वह 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में ढाका-8 सीट से इंकलाब मंच का प्रत्याशी था। ढाका में 12 दिसम्बर को हादी को दो युवकों ने गोली मार दी थी। उसकी सिंगापुर में इलाज के दौरान गुरुवार को मौत हो गई थी। भारत संग रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। पाकिस्तान के बढ़ते कदम और बांग्लादेश से बिगड़ते रिश्तों पर संसदीय रिपोर्ट में इन चुनौतियों का जिक्र किया है। साल 1971 की जंग के बाद भारत को बांग्लादेश में सबसे बड़े रणनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, यह कहना गलत नहीं होगा। राष्ट्रवाद के उभार, इस्लामी संगठनों की दोबारा सक्रियता और चीन-पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव ने बांग्लादेश में भारत के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी है। अगर समय रहते भारत ने अपनी नीति में बदलाव नहीं किया तो वह बांग्लादेश में अप्रासंगिक हो जाएगा। यह बातें भारत में विदेशी मामलों की एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में रेखांकित की गई है। 99 पन्नों की इस रिपोर्ट में समिति ने भारत-बांग्लादेश के रिश्तों से जुड़ी उन चुनौतियों का जिक्र किया है, जो अगस्त 2024 के बाद खड़ी हुई है। अगस्त 2024 यह वह महीना था जब बांग्लादेश में व्यापक जनप्रचार के बाद देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। तब से वह यहां रह रही हैं और देश में मोहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार काम कर रही है। संसदीय समिति की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कांग्रेस सांसद शशि थरूर को नेतृत्व करने के लिए चुना गया। समिति ने विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधियों से बातचीत की और बीते जून को 4 विशेषज्ञों की राय भी सुनी है। इन विशेषज्ञों में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन, सेवानिवृत्त ले. जनरल सैयद अता हसनैन, विदेश मंत्रालय की पूर्व सचिव रीवा गांगुली व अन्य शामिल थे। विश्लेषक के हवाले से बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते में मौजूदा चुनौतियों के पीछे प्रमुख वजहें भी गिनाई गई हैं। अल्पसंख्यकों पर हमले के पीछे आईएसआई के हाथ से इंकार नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश में चीन की बढ़ती मौजूदगी भी एक चुनौती है। लालमोनिरहाट एयरबेस का चीनी मदद से विकसित किया जाना भारत की सुरक्षा के लिए एक खतरा है। जमात-ए-इस्लामी पार्टी के नेताओं के हालिया चीन दौरे का भी रिपोर्ट में जिक्र किया गया और कहा कि इससे बांग्लादेश के अलग-अलग राजनीतिक गुटों के साथ चीन की गहराती बातचीत का संकेत मिलता है, जिहादी वहां उसकी मौजूदगी और मजबूत हो रही है। समिति ने सिफारिश की है कि सरकार बांग्लादेश में विदेशी शक्तियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखे क्योंकि किसी भी वैसे देश, जिनके साथ भारत के रिश्ते अच्छे नहीं हैं (पाक-चीन) उनका वहां सैन्य ठिकाना बनाने की कोशिश भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकती है। मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश में ताजा हिंसा पर सिर्फ औपचारिक बयान देते दिख रहे हैं। अगर यूनुस वाकई असहाय हो गए हैं और कट्टरपंथी तंत्र अराजकता फैलाने के लिए स्वतंत्र है तो यह न तो बांग्लादेश के लिए अच्छी है और भारत के लिए तो बहुत चिंताजनक है ही। फिलहाल बांग्लादेश में जिस तरह की अराजकता फैली हुई है और उनकी आंच में बहुत कुछ झुलसने की आशंका है। उसे देखते हुए भारत सरकार को चाहिए कि वह कूटनीतिक स्तर पर इन मामलों को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के समक्ष प्रभावी तरीके से उठाए।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 20 December 2025

राष्ट्रीय अध्यक्ष की जगह कार्यकारी अध्यक्ष


भारतीय जनता पार्टी ने पटना की बांकीपुर सीट से विधायक और बिहार सरकार में मंत्री नितिन नबीन सिन्हा को पार्टी का नया कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर सबको चौंका दिया है। शायद ही किसी ने उम्मीद की हो कि नबीन बाबू को इतना महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा। पिछले कई महीनों से यह चर्चा चल रही थी कि भाजपा अपना नया अध्यक्ष चुनने वाली है क्योंकि श्री नड्डा का कार्यकाल बहुत पहले समाप्त हो चुका था और वह एक्सटेंशन पर चल रहे थे। नितिन नबीन भाजपा के इतिहास में जेपी नड्डा के बाद दूसरे कार्यकारी अध्यक्ष होंगे। पार्टी के संविधान में कार्यकारी अध्यक्ष का कोई औपचारिक पद नहीं है। लेकिन साल 2019 के बाद से भाजपा में पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त करने से पहले कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करने की एक परंपरा शुरू हुई है। भाजपा में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव कब होगा अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में पार्टी के शीर्ष नेताओं के हवाले से दावा किया जा रहा है कि अगले साल जनवरी में ये प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल भी जनवरी तक ही है। ऐसे में से सवाल उठ रहा है कि जब कुछ दिनों बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है तो पार्टी ने कार्यकारी अध्यक्ष क्यों नियुक्त किया है? इसका कोई स्पष्ट जवाब तो नहीं है लेकिन ये माना जा रहा है कि पार्टी अपने संविधान के हिसाब से होने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को आम सहमति और निर्विरोध रूप से करना चाहती है। वरिष्ठ पत्रकार ने बीबीसी को बताया कि भाजपा जनवरी में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगी। पार्टी में इसकी एक औपचारिक प्रक्रिया है। ऐसे तो कोई चुनाव नहीं हो रहा है लेकिन नामांकन तिथि, चुनाव तिथि में औपचारिक प्रक्रियाएं हैं, पार्टी को इन्हें करना है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर भाजपा ने ये साफ कर दिया है कि नितिन नबीन ही अगले अध्यक्ष होंगे। भाजपा में अध्यक्ष को चुनने की एक लंबी प्रक्रिया है। भाजपा के संसदीय बोर्ड ने नितिन नबीन सिन्हा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत किया है। 26 साल की उम्र में पहली बार विधायक चुने जाने वाले नितिन नबीन 5 बार से लगातार विधायक हैं और भाजपा के पहले कार्यकारी अध्यक्ष हैं। 45 साल के नितिन नबीन का कार्यकारी अध्यक्ष बन जाना जरूर कई लोगों को हैरान कर रहा है लेकिन विश्लेषक इससे हैरान नहीं हैं। बिहार चुनावों के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने नितिन नबीन से दो घंटे मुलाकात की थी। नितिन नबीन पार्टी के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के प्रभारी थे और भाजपा ने यह चुनाव भारी बहुमत से जीता था। यानी नितिन नबीन अपनी संगठनात्मक क्षमता पहले ही साबित कर चुके हैं। सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या नितिन नबीन की नियुक्ति के पीछे कोई खास वजह या पार्टी की कोई खास रणनीति है? विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी में ये बदलाव का दौर है और ये समय की जरूरत के हिसाब से उठाया गया कदम है। विजय त्रिवेदी और विनोद शर्मा दोनों ही मानते हैं कि पार्टी जेनरेट्स चेंज यानि पीढ़ीगत बदलाव से गुजर रही है। पार्टी में पुरानी पीढ़ी के नेताओं की जगह नए नेताओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के रूप में पुराने नेताओं को हटाना और नए चेहरों को लाना पार्टी की इसी रणनीति का हिस्सा है और नितिन नबीन का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाना इस कड़ी में अगला कदम है। पार्टी नए नेतृत्व को आगे लाना चाहती है और ये नियुक्ति भी उसी दिशा में है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भाजपा में ऐसे नेताओं को आगे लाया जा रहा है जो किसी भी तरह से नरेन्द्र मोदी या अमित शाह के लिए चुनौती पेश न करें। विनोद शर्मा कहते हैं, नितिन नबीन की नियुक्ति हैरान इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि उन्हें अमित शाह की सहूलियत के हिसाब से बनाया गया है। किसी भी ऐसे नेता को मजबूत पद पर नहीं लाया जा रहा है जो आगे चलकर किसी भी तरह की शीर्ष नेतृत्व को चुनौती पेश कर सके। व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो भाजपा और संघ को भी मंजूर हो। विश्लेषक यह भी मान रहे हैं कि नितिन नबीन का नाम उन चुनिन्दा लोगों में रहा होगा जिन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी अनुमोदन प्राप्त हुआ है।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 18 December 2025

नरसंहार करने वाले पिता-पुत्र


ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में रविवार को जश्न मना रहे बान्डी बीच पर लोगों पर दो आतंकियों ने हमला कर दिया। इस दौरान 44 साल के अहमद अल अहमद ने अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकियों से भिड़ गया और कई जानें बचाई। हुआ यूं कि रविवार को सिडनी के बान्डी बीच पर यहूदियों के हनुक्का पर्व पर लोग पर्व का मजा उठा रहे थे। हनुक्का यहूदियों का सालाना त्यौहार है। इस दौरान दो बंदूकधारियों ने अंधाधुंध गोलीबारी करनी शुरू कर दी। गोलियों की आवाजें सुनकर बीच पर अफरा-तफरी मच गई और लोग इधर-उधर भागने लगे। इस अंधाधुंध फायरिंग में अब तक 16 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए। आतंकियों की निशानदेही हो चुकी है। एपी की रिपोर्ट के अनुसार इस आतंकी घटना को अंजाम देने वाले बाप और बेटे हैं, जिनमें से एक की तो मौके पर ही मौत हो गई। आस्ट्रेलिया जांच एजेंसियों ने आरोपी के बैकग्राउंड की जांच शुरू कर दी है। शूटिंग में शामिल पिता (50 वषीय) की मौके पर ही मौत हो गई जबकि उसका 25 वषीय बेटा गंभीर हालत में अस्पताल में भती है, सिडनी अटैक में पाकिस्तानी कनेक्शन सामने आया है। आस्ट्रेलिया की जांच एजेंसियां इस घटना को लेकर बहुत गंभीर है। अहम बात यह भी है कि हमले में शामिल पिता-पुत्र की पहचान पाकिस्तानी मूल के रूप में हुई है। वहीं अमेरिकी खुफिया सूत्रों ने भी दोनों आतंकियों को पाकिस्तानी नागरिक बताया है। हमलावर पाकिस्तानी नागरिक थे और सिडनी में रह रहे थे। जांच में यह भी सामने आया है कि गोलीबारी के बाद पास ही एक सड़क पर एक कार से कई इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लेसिव डिवाइस यानी विस्फोटक बरामद किए गए, जिससे आशंका है कि हमले की साजिश इससे काफी ज्यादा तबाही फैलाने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारने की थी। ऑस्ट्रेलियाई खुफिया एजेंसी एसियो ने पुष्टि की है कि हमलावरों में से एक पहले से सुरक्षा एजेंसियों की नजर में संदिग्ध था, लेकिन उसे तत्काल खतरे के रूप में लिस्ट नहीं किया गया था। इधर दोनों आतंकी गोलियां बरसा रहे थे उधर 44 साल के अहमद अल अहमद ने अपनी जान की परवाह किए बिना हिम्मत दिखाते हुए पीछे से आतंकी पर झपट्टा मारा और उससे बंदूक छीन ली, जिससे कई लोगों को सुरक्षित निकालने का मौका मिल गया। लोग अहमद अल अहमद को ऑस्ट्रेलिया का नया हीरो कह रहे हैं। अहमद जब आतंकी साजिद से मुठभेड़ करने जा रहा था, तब उनके भाई ने उन्हें रोका था। तब उन्होंने कहा था कि अगर मुझे कुछ हुआ तो परिवार को बताना कि मैं लोगों की जान बचाते हुए मारा गया। अहमद फल-सब्जी की दुकान चलाता है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस हमले की निंदा हुई है और ऑस्ट्रेलिया की सरकार से लेकर मुस्लिम-अरब देशों की ओर से भी आतंकवाद और हिंसा के सभी रूपों को खारिज किया है। मगर यह भी सच है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना और विरोध के बावजूद किसी समुदाय से नफरत की भावना में डूबे को रोक पाना एक मुश्किल चुनौती है। यह स्वाभाविक है कि इस आतंकी हमले की वैश्विक स्तर पर निंदा होगी और शोक-संवेदनाएं व्यक्त की जाएंगी, लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। दुनिया भर में जिहादी आतंक का खतरा जिस तरह उभर रहा है उसका मुकाबला तभी किया जा सकता है जब पूरा विश्व समुदाय मिलकर इस उठते खतरे का ईमानदारी से सामना करे और मिलकर मुकाबला करने के लिए कदम उठाएं। बान्डी बीच के हमले ने एक बार फिर पाकिस्तान को बेनकाब कर दिया है। दोनों ही आतंकी पाकिस्तानी मूल के निकले। यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान विश्व की सबसे बड़ी आतंकी फैक्ट्री है जहां साल दर साल हजारों आतंकी तैयार किए जाते हैं। भारत तो बार-बार इस बात को कहता रहता है पर दुनिया मानने को तैयार नहीं, पहलगाम हमला भी इसी तरह के आतंकियों ने किया था पर दुनिया मानने को तैयार नहीं थी। अब तो ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में यह हमला हुआ है, अब विश्व को इस पर क्या कहना है?
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 16 December 2025

चुनाव सुधार पर बहस


चुनाव सुधार पर सड़क से संसद तक चर्चा तेज हुई। शायद यह जरूरी भी था, क्योंकि पिछले कई दिनों से यह चर्चा का विषय बना हुआ है। वैसे भी देश के 12 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण तेज गति से हो रहा है पर यह भी देखने वाली बात है कि इस पर सियासत भी उसी स्पीड से चल रही है। लोकसभा में चुनाव सुधार के मुद्दे पर बुधवार को गृहमंत्री अमित शाह ने इस चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी प्रकरण के जवाब में जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी का नाम लिया और अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि उसने झूठ फैलाया है और देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास किया है। अमित शाह ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मतदाता सूची का शुद्धिकरण है ताकि जिनकी मृत्यु हो गई उनके नाम कट जाए, जो 18 साल से बड़े हैं उनके नाम जुड़ जाएं, जो दो जगह मतदाता हैं उनके नाम कट जाएं और जो विदेशी नागरिक हैं उनको चुन-चुनकर हटाया जाए। उन्होंने कहा क्या कोई भी देश का लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है जब देश का प्रधानमंत्री और राज्य का मुख्यमंत्री कौन हो, यह घुसपैठिए तय करेंगे। एसआईआर से कुछ दलों के राजनीतिक स्वार्थ आहत होते हैं। निर्णय करना पड़ेगा कि देश की संसद और विधानसभा को चुनने के लिए विदेशी को वोट देने का अधिकार देना है या नहीं? इसके बाद राहुल गांधी खड़े हुए और अमित शाह से पूछा कि हिन्दुस्तान के इतिहास में चुनाव आयुक्तों को पूरी तरह माफी दी जाएगी, इसका जवाब दें। हरियाणा का एक उदाहरण इन्होंने गृहमंत्री अमित शाह को दिया। अपने भाषण में राहुल गांधी ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। इस दौरान उन्होंने आरएसएस का नाम लिया। राहुल ने कहा कि समानता की भावना से आरएसएस को दिक्कत है। संघ ने संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। इस पर स्पीकर ओम बिरला ने उन्हें देखा और कहा कि चुनाव सुधार पर चर्चा कीजिए। नेता प्रतिपक्ष का मतलब ये नहीं कि कुछ भी बोलें। राहुल ने बहस की शुरुआत खादी से की। उन्होंने कहा कि हमारा देश एक फैब्रिक की तरह ही है। कपड़ा कई धागों से बनता है। वैसे ही हमारा देश भी कई लोगों से मिलकर बनता है। देश के सारे धागे एक जैसे और अहम हैं। देश के सभी लोग बराबर हैं। राहुल ने कहा कि वोट के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं पर सत्ता दल ने कब्जा कर लिया है। ईसी, सीबीआई, ईडी सब पर कब्जा कर लिया है। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर हमला बोलते हुए कहा कि चुनाव आयोग सत्ता के साथ मिला हुआ है। हमने इस बात के सुबूत दिए। सरकार इसी का इस्तेमाल कर रही है। राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव आयुक्त चुनने की प्रक्रिया को क्यों बदला गया। इस प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को क्यों हटाया गया? क्या सरकार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर विश्वास नहीं है? उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सत्ता पक्ष के इशारों पर चलती है। सत्ता पक्ष ही चुनाव आयोग को चला रहा है। राहुल ने ब्राजील की मॉडल का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ब्राजील की मॉडल का नाम 22 बार वोटर लिस्ट में आया। एक महिला का नाम 200 बार वोट लिस्ट में आया। चुनाव आयोग को सीसीटीवी फुटेज को कंट्रोल करने का मतलब क्या है और क्यों इस फुटेज को कुछ समय बाद हटाने का फैसला किया गया? फुटेज नष्ट करने की ताकत क्यों दी गई? चुनाव आयुक्तों पर सजा का प्रावधान क्यों हटाया गया? हरियाणा चुनाव का जिक्र करते हुए राहुल ने कहा कि हरियाणा का चुनाव चोरी किया गया। जहां तक चुनाव आयोग का सवाल है तो उसे उठ रहे प्रश्नों का उत्तर प्राथमिकता से देना चाहिए। पारदर्शिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है। चुनाव आज से दो दशक पहले कैसे होते थे, इससे ज्यादा जरूरी है कि अब जो चुनाव हों प्रश्नों से पटे हों। लोकतंत्र के असली मालिक व रक्षक मतदाता हैं, जनता है और उसका चुनाव प्रक्रिया पर पूरा विश्वास होना चाहिए। यही भारत के लोकतंत्र की नींव हैं।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 13 December 2025

एस जयशंकर को पाकिस्तान का जवाब


पाकिस्तान ने अपनी सेना और इसके प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की टिप्पणी पर बयान जारी किया है। पाकिस्तान ने कहा है कि सेना और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर जयशंकर का बयान भड़काऊ, बेबुनियाद और गैर-जिम्मेदाराना है। बता दें कि जयशंकर ने हिन्दुस्तान टाइम्स समिट के दौरान आसिम मुनीर के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि पाकिस्तान में आज जो हो रहा है वो इसके 80 साल पुराने इतिहास का प्रतिबिंब है। जयशंकर ने ये भी कहा था कि पाकिस्तान में किसी न किसी तरीके से सेना ही शासन करती है। कभी सेना खुलकर काम करती है, कभी पर्दे के पीछे से। बीबीसी के मुताबिक पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा है कि पाकिस्तान एक जिम्मेदार देश है और उसकी सभी संस्थाएं जिनमें सशस्त्र बल भी शामिल हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा के मजबूत स्तंभ हैं। यह संस्थाएं देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। प्रवक्ता ने कहा मई 2025 के संघर्ष ने साफतौर पर पाकिस्तानी सेना की पेशेवर क्षमता और मातृभूमि की रक्षा के लिए उनके संकल्प को साबित कर दिया है। कोई भी दुप्रचार अंिभयान इस सच्चाई को नकार नहीं सकता। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की संस्थाओं और नेतृत्व को बदनाम करने की भारतीय नेतृत्व की कोशिश एक सुनियोजित दुप्रचार अभियान का हिस्सा है। इसका मकसद क्षेत्र में भारत की अस्थिर करने वाली बयानबाजी शांति और स्थिरता के प्रति भारत की गंभीरता की कमी दर्शाती है। बता दें कि हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि जिस तरह अच्छे आतंकवादी और बुरे आतंकवादी जैसी बातें की जाती हैं। उसी तरह अपने सैन्य नेता और उतने अच्छे सैन्य नेता नहीं होने की बात भी की जाती है। हिन्दुस्तान टाइम्स समिट में जयशंकर से यह भी पूछा गया था कि पाकिस्तान में नए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस के हाथ में जिस तरह सत्ता का बहुत ज्यादा केंद्रीकरण देखा जा रहा है। उस पर आप क्या-क्या आंकलन है? आसिम मुनीर का इतनी गहराई से सत्ता में फंसे होने का भारत को फायदा है या नुकसान? जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए पाकिस्तानी सेना हमेशा एक वास्तविकता की तरह रही है। अगर हम बात करें फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तो केवल हम ही नहीं उनके हाथ में भी इतनी शक्ति आने से संयुक्त राष्ट्र भी चिंतित है। पाकिस्तान में हाल में हुए संविधान संशोधन को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार एजेंसी के उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने चेतावनी दी है कि 27वें संशोधन न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकती है। टर्क ने एक बयान में कहा कि यह बदलाव उन जरूरी कानूनी नियमों को भी कमजोर कर सकता है, जिनसे देश में कानून-व्यवस्था बनी रहती है। बता दें कि पाकिस्तान में हालिया संवैधानिक बदलावों के बाद अब सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के रूप में स्थापित हो गए हैं। उन्हें गत दिनों चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) बनाया गया है और इसी के साथ सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और मिसाइल नियंत्रण भी उनके हाथ आ गया है। नया तंत्र उन्हें वास्तविक परमाणु बटन का नियंत्रक बना रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार परमाणु हथियारों के नियंत्रण को इतनी स्पष्टता से सेना को सौंपा गया है कि इससे न केवल सैन्य प्रतिष्ठान की ताकत चरम पर पहुंच गई है, बल्कि जनरल आसिम मुनीर को पाकिस्तान की राजनीति, सामरिक नीतियों और क्षेत्रीय शक्ति समीकरणों में सबसे निर्णायक और प्रभावशाली व्यक्तित्व बना दिया है।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 11 December 2025

हुमायूं ने रखी बाबरी मस्जिद की नींव


पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के रेजीनगर में शनिवार को बाबरी जैसी मस्जिद की बुनियाद रखी गई। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने (6 दिसंबर, 1992) की बरसी पर आयोजित कार्यक्रम में तमाम मौलवी मौजूद रहे। बाबरी मस्जिद बनवाने के ऐलान के कारण तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने इसका शिलान्यास किया। उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले में बेलडांगा से सटे इलाके में सैकड़ों समर्थकों के साथ प्रतीकात्मक तौर पर फीता काटकर मस्जिद की नींव रखी। हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर सीट से विधायक हैं। वह पिछले कई दिनों से दावा करते रहे हैं कि 6 दिसम्बर को वे भरतपुर के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद बनवाने के लिए नींव रखेंगे। उनके समर्थक और अन्य लोग सुबह से ही सिर पर ईंट रखकर निर्माण स्थल पहुंचने लगे थे। हुमायूं कबीर ने निर्माण स्थल से एक किलोमीटर दूर बने मंच पर मौलवियों की मौजूदगी में फीता काटा, समारोह के दौरान अल्लाह हू अकबर के नारे लगाए गए। इस मौके पर सऊदी अरब के धार्मिक नेता भी मंच पर मौजूद थे। इस दौरान सांप्रदायिक तनाव की आशंकाओं को देखते हुए रेजीनगर और नजदीकी बेलडांगा इलाके में पुलिस, आरएएफ और केंद्रीय बलों की टुकड़ियां तैनात की गई थी जिन्होंने इलाके में फ्लैग मार्च भी किया। नींव रखने के बाद समाचार एजेंसी से बातचीत में हुमायूं कबीर ने कहा, एक साल पहले मैंने ऐलान किया था कि मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में एक नायाब बाबरी मस्जिद का निर्माण होगा। मस्जिद के साथ-साथ इस्लामिया हॉस्पिटल, मेडिकल कालेज, होटल-रेस्टोरेंट, पार्क और हैलीपेड बनाने की योजना है। यह 300 करोड़ का प्रोजेक्ट है। इस मस्जिद की नींव रखे जाने से पहले भाजपा ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कांग्रेस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रही है। भाजपा नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, मुख्यमंत्री ममता बनजी राजनीतिक लाभ के लिए मुस्लिमों के ध्रुवीकरण के लिए इस विधायक का इस्तेमाल कर रही हैं। वह आग से खेल रही हैं। उन्होंने कहा कि बेलडांगा से आ रही रिपोर्टें ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। मालवीय ने दावा किया कि कबीर के समर्थकों को इस ढांचे के निर्माण के लिए ईंट ले जाते हुए देखा गया जिसे उन्होंने बाबरी मस्जिद बताया। वहीं टीएमसी नेता सिमोनी घोष ने कहा, भाजपा को हमारा एक ही संदेश है कि खेला होवे। 2026 में ममता बनजी चौथी बार बंगाल की सत्ता संभालेंगी, क्योंकि पश्चिम बंगाल की जनता उनके साथ है और वह अब तक के सबसे बड़े जनादेश में से एक के साथ जीत हासिल करने जा रही हैं। उन्होंने कहा, कोई भी मंदिर बना सकता है, कोई भी मस्जिद बना सकता है, लेकिन अगर इसके पीछे किसी की मंशा यहां धार्मिक अशांति फैलाने की है तो सब जानते हैं कि उन्हें भाजपा से फंडिंग मिल रही है और भाजपा उन्हें बंगाल में कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए उकसा रही है। 62 साल के हुमायूं कबीर ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी। साल 2012 में तृणमूल कांग्रेस के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद एक साल बाद वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। 2015 में कबीर को टीएमसी से बाहर कर दिया गया। उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री ममता बनजी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को राजा बनाना चाहती हैं। भाजपा नेताओं ने इसे वोट बैंक की राजनीति बताते हुए हुमायूं कबीर की गिरफ्तारी तक की मांग कर डाली है। भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने कहा कि ममता 15 वर्षें से तुष्टिकरण और सांप्रदायिकता की राजनीति करती रही हैं। अगर सच में नहीं चाहती कि बाबरी मस्जिद बने तो उन्हें हुमायूं कबीर को गिरफ्तार करना चाहिए था। टीएमसी ने जवाब में कबीर पर भाजपा-आरएसएस के साथ मिलीभगत करके अशांति पैदा करने का आरोप लगाया। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं रोज नई-नई बातें सुनने को मिलेंगी।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 9 December 2025

क्या यह संकट जानबूझकर बनाया गया?


देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो पिछले कुछ दिनों से भारी अव्यवस्था का सामना कर रही है। एक और उड़ानों का बड़े पैमाने पर रद्द होना तो दूसरी ओर आसमान छूते किराए ने यात्रियों की नाक में दम कर दिया है। एयरलाइन्स ने जिम्मेदारी नए एफडीटीएल (फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन) नियमों पर डाली, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इंडिगो के पास तैयारी के लिए पर्याप्त समय था। इस कारण यह आरोप भी गंभीर हो गया है कि एयरलाइन ने नियमों में ढील पाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने का रास्ता चुना। एविएशन विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट की जड़ जनवरी 2024 में दायर उस याचिका में है जिसमें पायलट यूनियन ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने थकान और लम्बी ड्यूटी को गंभीर सुरक्षा जोखिम बताया था। कोर्ट के निर्देश के बाद डीजीसीए ने एफडीटीएल नियमों में बदलाव किए और उन्हें एक जुलाई 2025 से लागू कर दिया। इन नियमों में पायलटों को साप्ताहिक 36 घंटे की बजाए 48 घंटे का अनिवार्य आराम दिया और किसी भी छुट्टी को वीकली रेस्ट मानने पर रोक लगा दी। नवम्बर 2025 में इनका दूसरा चरण लागू हुआ, जिसमें लगातार नाइट शिफ्ट पर बड़ी पाबंदी लगा दी गई। इन्हीं बदलावों का असर इंडिगो पर सबसे अधिक पड़ा। 2 दिसम्बर को दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू जैसे बड़े एयरपोर्ट्स पर उड़ाने अनियमित होना शुरू हुईं और ऑन टाइम परफॉर्मेंस (ओटीपी) गिरकर 35 प्रतिशत पर आ गया। 3 दिसम्बर को यह स्थिति और बिगड़ी और ऑन टाइम परफॉर्मेंस 19.7 प्रतिशत तक गिर गया। 4 दिसम्बर को हालात लगभग ठप हो गए। करीब 800 उड़ानें रद्द करनी पड़ी और ओटीपी सिर्फ 8.5 प्रतिशत पर रह गया। कई रूट्स पर टिकट का किराया 10,000 से बढ़कर 40,000-50,000 तक देखा गया। क्या यह समस्या मोनोपॉली की वजह से हुई? साल 2006 के अगस्त में दिल्ली-मुंबई के बीच उड़ान से शुरू हुई इंडिगो की कहानी इस मोड़ पर आ जाएगी तब राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल ने सपने में भी नहीं सोचा होगा, जिन्होंने 2005 में इंडिगो के मालिक इंटर ग्लोबल एंटरप्राइजेस की नींव रखी थी। आज भारत के विभिन्न बाजार में इंडिगो सबसे बड़ी खिलाड़ी है और इसके पास करीब 64 प्रतिशत हिस्सेदारी है। अब यही बढ़ा कद उसकी हजारों उड़ाने कैंसल होने और यात्रियों को हुई बेशुमार दिक्कतों के चलते सवालों के घेरे में हैं। संसद में भी इंडिगो की कथित मोनोपॉली यानि एकाधिकार पर सवाल उठे। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा कि इस संकट के लिए केंद्र का मोनोपॉली मॉडल जिम्मेदार है। विमानन क्षेत्र के विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जो कुछ हुआ यह जानबूझ कर किया गया या बनाया गया। इस संकट से यह साबित होता है कि एक मोनोपॉली कंपनी जब चाहे देश को अपनी उंगलियों पर से नचा सकती है। सरकार ने एयर इंडिया को पीछे धकेल कर इंडिगो को एकाधिकार दिया जिससे वह विमानन क्षेत्र में मनमर्जी कर सके। जो कुछ हुआ है उससे यह छवि बनी है कि कोई एक बड़ी कंपनी भारत के विमानन नियमों में बदलाव करा सकती है। लिहाजा इस घटना से किसी एक कंपनी नहीं, बल्कि देश के पूरे विमानन क्षेत्र की साख पर आंच आई है। एविएशन सेफ्टी फर्म कंसलिटिंग के सीईओ मार्क डी. मार्टिन ने कहाöएकाधिकार बड़ी वजह है। जिस तरह से यह मामला हुआ है उससे दुनिया भर में यह संदेश गया है कि भारत में एविएशन रेगुलेशन में दम नहीं है।
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 6 December 2025

इमरान खान जिंदा हैं


जी हां, इमरान खान जिंदा है, यह दावा किया है इमरान खान की बहन उजमा खान ने। बता दें कि पिछले कई दिनों से यह आशंका जताई जा रही थी कि इमरान खान की जेल में हत्या कर दी गई है और इसे छिपाया जा रहा है। इमरान के परिवार ने दावा किया था कि अडियाला जेल में लगभग एक महीने से बंद पूर्व प्रधानमंत्री और उनके भाई इमरान खान को किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है। आखिरकार इमरान के परिवार और समर्थकों के बढ़ते दबाव की वजह से इमरान की बहन को उनको अपने भाई से जेल के अंदर मिलने की इजाजत दे दी गई। पीटीआई के एक प्रवक्ता और अडियाला जेल के एक अधिकारी ने बीबीसी को पुष्टि की कि उजमा खान को इमरान खान से मिलने की इजाजत मिल गई है। मंगलवार को तब इमरान की तीन बहनें अलीमा खान, नौरीन खान और उजमा खान मुलाकात के लिए अडियाला जेल के बाहर पहुंची तो वहां तैनात पुलिस अधिकारियों ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया था। हालांकि कुछ देर बाद जेल अधिकारियों ने एक अधिकारी को इमरान की बहनों के पास भेजा और मैसेज दिया कि मुलाकात के लिए उजमा खान के नाम पर सहमति बन गई है। अडियाला जेल में 20 मिनट की इमरान से मुलाकात के बाद उजमा जब बाहर आईं तो उन्होंने पत्रकारों से अपने भाई के हाल के बारे में बताया। उजमा खान ने बताया कि वो (इमरान) बड़े गुस्से में थे और कह रहे थे कि हमें ये मेंटल टॉर्चर कर रहे हैं, सारे दिन कमरे में बंद रखते हैं और थोड़ी देर के लिए बाहर जाने देते हैं। किसी से कोई बातचीत की इजाजत नहीं है। जो सब कुछ हो रहा है, उसके लिए आसिम मुनीर जिम्मेदार हैं। इसके साथ ही उजमा खान ने बताया कि उनकी बस 20 मिनट के लिए बातचीत हो पाई और उनकी (इमरान) सेहत बिल्कुल ठीक है। इससे पहले उनके परिवार ने दावा किया था कि उन्हें लगभग एक महीने से पूर्व प्रधानमंत्री से मिलने की इजाजत नहीं दी गई थी। सरकारी अधिकारी नहीं चाहते कि इमरान खान का कोई भी संदेश जेल से बाहर आए। बीबीसी से एक इंटरव्यू में इमरान की बहन नौरीन खान ने आरोप लगाया कि उन्हें (सरकारी अधिकारियों को) बस इस बात की चिंता है कि इमरान की बातें बाहर बताई जा रही हैं, इसलिए उन्होंने मिलना-जुलना पूरी तरह से बंद कर दिया है। इमरान की बहनों का कहना है कि पहले वे कोर्ट के आदेश के अनुसार हर मंगलवार को अपने भाई से मिलने जाती थीं। लेकिन इमरान से उनकी आखिरी मुलाकात 4 नवम्बर को हुई थी नौरीन खान ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सरकार और एस्टैब्लिशमेंट इमरान खान से 9 मई की जिम्मेदारी कुबूल करे कि 9 मई की तोड़-फोड़ को उन्होंने ही करवाया था। उन्होंने ही अपने लोगों को गोली मारी। नौरीन खान के मुताबिक इमरान ने जवाब दिया था कि आप सीसीटीवी फुटेज निकाल लें, कैंटोनमेंट के अंदर चेकपोस्ट है, आमी की नजर में आए बिना या कैमरे में कैद हुए बिना कोई भी यहां अंदर नहीं जा सकता। परिवार से मिलने की इजाजत न मिलने की खबरों पर जेल अधिकारियों की तरफ से तो कोई साफ बयान जारी नहीं किया गया। पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के राजनीतिक मामलों के सलाहाकार (राणा सनाउल्लाह खान) ने आरोप लगाया है कि इमरान खान जेल में बैठकर अराजकता और अव्यवस्था फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने शमा टीवी के एक प्रोग्राम में माना कि कानून एक कैदी को उसके परिवार और वकीलों से मिलने की इजाजत तो देता है लेकिन ऐसा कोई कानून नहीं है जहां यह नहीं लिखा है कि किसी कैदी को सरकार के खिलाफ अराजकता, देशद्रोह, अव्यवस्था, आंदोलन या आगजनी करने की इजाजत दे। उधर नौरीन खान ने चेतावनी देते हुए कहा, अगर उन्होंने इमरान खान के साथ कुछ किया तो याद रखें कि वे न पाकिस्तान में रहने के काबिल होंगे और न दुनिया के किसी और कोने में।
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 4 December 2025

पुतिन की यात्रा क्यों अहम है


रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन 4-5 दिसम्बर को भारतीय राजकीय दौरे पर आ रहे हैं। ये साल 2021 के बाद पहली बार होगा जब ब्लादिमीर पुतिन भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए भारत में होंगे। भारत और रूस के बीच एक विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी है। दोनों ही राष्ट्र कई अहम मौकों पर एक-दूसरे के साथ खड़े हुए नजर आए हैं। राष्ट्रपति पुतिन की इस यात्रा के दौरान भारत और रूस अतिरिक्त एस-400 सिस्टम और सुखोई-57 लड़ाकू विमानों को लेकर रक्षा समझौते पर बात आगे बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा रूस से कच्चे तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग पर भी वार्ता हो सकती है। राष्ट्रपति पुतिन की ये यात्रा रूस और भारत को परमाणु ऊर्जा, तकनीक और कारोबार के क्षेत्र में अपने द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा का मौका भी देगी। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चार साल बाद यह यात्रा हो रही है बल्कि इसलिए भी है कि लंबे समय से चले आ रहे वैश्विक संघर्ष और अमेरिकी टैरिफ के दबाव से खंडित हो रही वैश्विक भू-राजनीति में यह एक स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति के पक्ष में दोनों देशों का एक रणनीतिक दिशा भी तय कर सकती है। रूस के विदेश नीति सलाहकार यूरी उशाकोव ने रूस के सरकारी टीवी से बात करते हुए अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर गहन चर्चा पर जोर देते हुए कहा है कि ये यात्रा भव्य और कामयाब होगी। राष्ट्रपति पुतिन की ये भारत यात्रा भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता का भी संकेत देती है। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस को अलग-थलग करने के पश्चिमी देशों के दबाव को भारत टालता रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर भारी टैरिफ भी लगाए हैं और प्रतिबंध भी लगाए हैं जिससे अमेरिका और भारत के संबंधों पर भी इनका असर पड़ा है। विश्लेषक भी मान रहे हैं कि पुतिन की ये यात्रा भारत और रूस के रक्षा संबंधों को और मजबूत कर सकती है और वैश्विक सुरक्षा को एक नया आकार भी दे सकती है। भारत और रूस के संबंध काफी पुराने हैं जो शीत युद्ध के समय से ही चले आ रहे हैं। भारत रूसी हथियारों के सबसे बड़े खरीददारों में से एक है और यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि रूसी एस-400 एयर डिफेंस प्रणाली ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के लिए कितनी उपयोगी रही है। पूर्व राजनयिक मेजर जनरल (रिटायर्ड) मंजीत सिंह पुरी ने कहा, दुनिया के दो अहम देशों रूस और भारत का उच्चतम स्तर पर एक साथ आना खास तौर पर महत्वपूर्ण है। उन्होंने भी कहा कि हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान रूस से मिले हथियार खासकर एस-400 ने भारत के लिए अहम भूमिका निभाई। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस ने भारत को सस्ते तेल की आपूर्ति बताई जिससे हमारी अर्थव्यवस्था को राहत मिली। भारत के कुल तेल आयात का 35 फीसदी रूस से होता है, लेकिन दो बड़ी रूसी तेल कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत को भी इस खरीद में कमी लाने पर मजबूर किया है। लिहाजा ऊर्जा व्यापार के लिए एक स्थायी व स्थिर तंत्र को कायम करना भी इस मुलाकात में चर्चा का विषय हो सकता है, जिसकी अमेरिका पर नजर होगी। एक अमेरिकन विश्लेषक ने कहा कि भारत और रूस दोनों एक-दूसरे के करीब आए हैं क्योंकि दोनों ही अमेरिका से दबाव महसूस कर रहे है। चूंकि भारत-रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है और इस वजह से हाल के महीनों में भारत ट्रंप प्रशासन के निशाने पर है। भारत और अमेरिका के संबंधों में आई गिरावट के बीच भारत का रूस की तरफ से खुलकर हाथ बढ़ाना हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए। पुतिन की नई दिल्ली को इस यात्रा से भारत-रूस दोनों की तरफ से दुनिया को एक संदेश जरूर जाएगा कि दोनों के पास ही शक्तिशाली दोस्त हैं। भारत ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए राष्ट्रीय हितों व जरूरतों को वैश्विक साझेदारियों का आधार बनाया है। ऐसे वक्त में जब विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर है। भारत को रूस के साथ गहरा सहयोग न केवल आर्थिक, रक्षा व सामरिक हितों को मजबूत करेगा बल्कि पूरे विश्व को राजनीति पर असर डाल सकता है। राष्ट्रपति पुतिन का स्वागत है।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 2 December 2025

चुनाव आयोग के हाथ खून से रंगे हैं।

यह कहना है तृणमूल कांग्रेस के उस प्रतिनिधिमंडल का जो चुनाव आयोग की पूरी बैंच के साथ दो दिन पहले मिला था। पश्चिम बंगाल में जारी वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रािढया के बीच तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन के नेतृत्व में पार्टी के दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से मुलाकात की। ओ ब्रायन ने मीटिंग के बाद कहा कि पार्टी ने चुनाव आयोग के सामने पांच सवाल उठाए, लेकिन चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने उनका कोई जवाब नहीं दिया। तृणमूल के सांसदों का कहना था कि यदि एसआईआर का उद्देश्य नकली वोटरों और घुसपैठियों का पता लगाना है तो फिर बंगाल ही क्यों? मेघालय और त्रिपुरा में क्यों नहीं? जबकि इन राज्यों की सीमाएं भी बांग्लादेश से मिलती हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस सांसदों को सुनने के बाद आयोग ने स्पष्ट किया कि एसआईआर सभी राज्यों में होना है। डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि हम इन एसआईआर की संवैधानिक वैधता पर सवाल नहीं उठा रहे हैं बल्कि उस तरीके पर सवाल उठा रहे हैं, जिस तरीके से जल्दबाजी में इसे लागू किया जा रहा है उस पर एतराज है। एसआईआर के लिए उन्होंने समय बढ़ाने के लिए भी मांग की। तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने जब पावार को चुनाव आयोग की पूरी पीठ से मुलाकात की तो उन्होंने खुलकर आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के कारण कम से कम 40 लोगों की मौत हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के हाथ खून से सने हैं। हमने 5 सवाल उठाए और चुनाव आयोग ने एक घंटे तक बिना रूके हमसे बात की। जब हम बोल रहे थे तब हमें भी नहीं टोका गया लेकिन हमारे पांच सवालों में से किसी का भी जवाब नहीं मिला। लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलकर उन्हें 40 ऐसे लोगों की सूची सौंपी जिनकी मौत कथित तौर पर एसआईआर प्रािढया से जुड़ी थी। हालांकि उन्होंने कहा कि आयोग ने इन्हें केवल आरोपी कहकर खारिज कर दिया। सांसदों की चुनाव आयोग से करीब 40 मिनट में कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा और ममता बाला ठाकुर ने अपनी बात रखी और जो कहना था वो कहा। उन्होंने कहा, इसके बाद सीईसी ने एक घंटे तक बिना रूके बात की। जब हम बोल रहे थे तब हमें भी नहीं टोका गया, लेकिन हमें हमारे पांच सवालों में से किसी एक का भी जवाब नहीं मिला। एसआईआर के दूसरे चरण को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। टीएमसी सांसदों के प्रश्नों का संतोषजनक जवाब न देना इस प्रािढया के औचित्य और उपलब्धता पर सवाल उठ रहा है। एसआईआर से जुड़े संदेहों का दूर न होना शुभ संकेत नहीं है। एसआईआर के राजनीतिक पहल को समझा जा सकता है। खासकर बंगाल में जहां भाजपा और तृणमूल की कड़ी टक्कर होने का अंदाजा है। लेकिन इससे जुड़ी चिंताओं को भी खारिज नहीं कर सकते। एसआईआर की प्रासंगिकता पर कोई सवाल नहीं है और न ही आयोग के अधिकार पर। सुप्रीम कोर्ट भी यह बात कह चुका है। लेकिन विपक्ष की चिंताओं को दूर करना भी आयोग की ही जिम्मेदारी है। विपक्ष को अगर लग रहा है कि उनकी बातों को अनसुना किया जा रहा है तो देश की इस संवैधानिक संस्था को न केवल इनका संतोषजनक जवाब देना होगा। बल्कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव प्रािढया भी अपनानी होगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 29 November 2025

एक बार फिर चर्चा में अफगानिस्तान

पिछले कुछ दिनों से एक बार फिर अफगानिस्तान चर्चाओं में है। दो घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्होंने अफगानिस्तान को सुर्खियों में ला दिया है। पहली घटना अमेरिका की है। अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में दिल दहलाने वाली घटना घटी। व्हाइट हाउस से कुछ ही दूरी पर बुधवार को दोपहर दो वेस्ट वजीनिया नेशनल गार्ड सदस्यों पर अचानक की गई गोलीबारी ने पूरे शहर को झकझोर दिया। व्हाइट हाउस में लॉकडाउन लग गया है। दोनों सैनिकों की दुखद मौत हो गई। वाशिंगटन की मेयर म्यूरियाल बाउजर ने इसे टारगेटिड शूटिंग बताया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हमलावर को जानवर बताते हुए अंजाम भुगतने की चेतावनी दी है। यह गोलाबारी उस समय हुई जब गार्ड के सदस्य एक मेट्रो स्टेशन के पास तैनात थे। हमलावर अचानक मोड़ से आया और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने लगा। वहीं आसपास मौजूद अन्य सैनिकों ने तुरंत भागकर मौके पर पहुंचे और हमलावर को काबू कर लिया। गोली चलाने वाले का नाम रहमानुल्लाह लकनवाल (29 वर्ष) बताया गया है। यह अफगानिस्तान का नागरिक है जो 2021 में अमेरिका आया था। कहा जा रहा है कि यह अफगानिस्तान में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए भी काम कर चुका है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिटेन सरकार के तहत अमेरिका में आए अफगानिस्तान के हर नागरिक को फिर से जांच करने का भी वादा किया। ट्रंप ने फ्लोरिडा से सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए हमलावर को चेतावनी देते हुए कहा कि वह बहुत बड़ी कीमत चुकाएगा। हमलावर ने हमला क्यों किया इसकी जानकारी अभी नहीं आई। पहली सुखी अफगानिस्तान की तब बनी जब व्हाइट हाउस के बाहर गोली चलाने वाला एक अफगानी निकला। दूसरी सुर्खी तब बनी जब तीन दिन पहले अफगानिस्तान के एक मीडिया चैनल ने यह खबर चलाई कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के प्रमुख इमरान खान की जेल में हत्या कर दी गई है। इस खबर के आते ही पाकिस्तान में आग लग गई। बता दें कि इमरान खान पिछले दो साल से रावलपिंडी की मटियाला जेल में भ्रष्टाचार के आरोपों में बंद हैं। इमरान खान की सुरक्षा को लेकर कई तरह की बातें कही जा रही हैं। इस बीच बेटे कासिम खान ने भी अपने पिता की सुरक्षा को लेकर एक्स पर एक पोस्ट लिखी है। मेरे पिता 845 दिन से जेल में हैं। पिछले छह हफ्तों से उन्हें एक डेथ सेल में एकांत में रखा गया है। यहां किसी तरह की पारदर्शिता नहीं है। अदालत के स्पष्ट आदेश होने के बावजूद उनकी बहनों को हर मुलाकात से वंचित किया गया है। न कोई फोन, न कोई मुलाकात और न ही उनके जीवित होने का कोई सुबूत। मैं और मेरे भाई हम दोनों का अपने पिता से कोई संपर्क नहीं हुआ है। कासिम ने लिखा है, यह पूरी तरह से ब्लैकआउट कोई सुरक्षा प्रोटोकाल नहीं है, यह उनकी स्थिति को छिपाने और हमारे परिवार को यह जानने से रोकने का एक सोचा-समझा प्रयास है। मेरे पिता की सुरक्षा और इस अमानवीय एकांत केंद्र के हर नतीजे के लिए पाकिस्तानी सरकार को नोटिस और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह जवाबदेही ठहराया जाएगा। हम उम्मीद करते हैं कि इमरान की मौत महज एक अफवाह हो और वह जिंदा हों। -अनिल नरेन्द्र

Thursday, 27 November 2025

दबाव से बीएलओ की मौतों पर सवाल


देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के बीच बूथ लेवल अफसरों (बीएलओ) की मौत चिंता का कारण बन गई है। मध्य प्रदेश में 24 घंटों में 2 बीएलओ की मौत हो गई है। वहीं पिछले 4 दिनों में भोपाल के 50 से ज्यादा बीएलओ बीमार पड़े हैं। इनमें दो को हार्ट अटैक और एक को ब्रेन हैमरेज हुआ है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में एक महिला बीएलओ ने तो आत्महत्या ही कर ली। परिजनों ने ज्यादा काम के दबाव को मौत का कारण बताया। एसआईआर 4 नवम्बर को शुरू हुआ। तब से अब तक यानि 19 दिनों में 6 राज्यों में 16 लोगों की मौत हो गई है। गुजरात व मध्य प्रदेश में 4-4, पश्चिम बंगाल में 3, राजस्थान में 2, केरल व तमिलनाडु में 1-1 की जान गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन मौतों के लिए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर एसआईआर को अव्यावहारिक बताते हुए इसे तुरन्त रोकने की मांग की है। कांग्रेस नेता व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी एक्स पर पोस्ट कर इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने लिखा  एसआईआर के नाम पर देशभर में अफरा-तफरी मचा रखी है नतीजा? तीन सालों में 16 बीएलओ की जान चली गई। हार्ट अटैक, तनाव, आत्महत्या एसआईआर में कोई सुधार नहीं। थोपा गया जुल्म है। उन्होंने आरोप लगाया, ईसीआई ने ऐसा सिस्टम बनाया है जिसमें नागरिक को खुद को तलाशने के लिए 22 साल पुरानी मतदाता सूची के हजारों स्कैन पन्नों को पलटना पड़े, मकसद साफ है-सही मतदाता हारकर थक कर बैठ जाए और वोट चोरी बिना रोक-टोक जारी रहे। दूसरी ओर भाजपा ने इन मौतों के लिए तृणमूल कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहराया है। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के मुख्यालय कृष्णा नगर में बीएलओ के तौर पर काम करने वाली रिंकू नामक महिला शिक्षक ने शनिवार को आत्महत्या कर ली। पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि शव के पास बरामद एक सुसाइड नोट में रिंकू ने अपनी मौत के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए जिला चुनाव अधिकारी से रिपोर्ट मांगी है। पुलिस के मुताबिक रिंकू ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि उन्होंने 95 फीसदी ऑफलाइन काम पूरा कर लिया है, लेकिन ऑनलाइन के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं है। सुपरवाइजर को इस बारे में बताने से भी कोई फायदा नहीं हुआ। इससे कुछ दिन पहले बर्धमान जिले के मेचारी में भी काम के कथित दबाव के कारण ब्रेन स्ट्रोक की वजह से नमिता हासंदा नाम का एक बीएलओ की मौत हो गई थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन घटनाओं पर दुख जताते हुए सवाल किया कि आखिर एसआईआर और कितने लोगों की जान लेगी? दूसरी ओर भाजपा और सीपीएम ने इन घटनाओं पर कहा था कि इनके लिए तृणमूल कांग्रेस खुद जिम्मेदार है। सीपीएम नेता और पार्टी के केंद्रीय समिति के सदस्य सुजन चक्रवर्ती का सवाल है कि आखिर काम के दौरान बीएलओ को जान क्यों गंवानी पड़ रही है? उनका कहना था चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी से इंकार नहीं कर सकता। साथ ही राज्य सरकार को भी बीएलओ की मदद करनी चाहिए थी। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी और भाजपा इस प्रक्रिया का राजनीतिक फायदा उठाने में जुटी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में बीएलओ की मौतों और बीमारियों ने तृणमूल कांग्रेस को चुनाव आयोग और भाजपा के खिलाफ एक मजबूत हथियार दे दिया है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी इस मुद्दे पर लगातार दबाव बढ़ा रही हैं। राजनीतिक हानि-लाभ को एक तरफ रखें और इस दुखद मुद्दे पर विचार करें तो चुनाव आयोग को इसका संज्ञान लेना चाहिए और इस दबाव के कारण आत्महत्या तक करने पर मजबूर होने की प्रक्रिया में सुधार लाना चाहिए या तो वह बीएलओ की संख्या बढ़ाएं या फिर लक्ष्य पूरा करने के लिए समय सीमा बढ़ाएं? चुनाव आयोग को अविलंब एक्शन लेना होगा नहीं तो इन निर्दोषों की हत्या का दाग उस पर लगेगा।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 25 November 2025

बिहार में गृह विभाग सम्राट चौधरी को मिलना

सम्राट चौधरी को मिलना नीतीश सरकार के मंत्रियों के विभागों के बंटवारे के साथ ही शुक्रवार को बिहार की सत्ता में बड़ा परिवर्तन दिखा। 2005 के बाद से लगातार गृह विभाग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार संभाल रहे थे, जो आमतौर पर सभी मुख्यमंत्री अपने पास ही रखते हैं पर ताजा दायित्व बंटवारे में यह महत्वपूर्ण विभाग उनसे छीना गया है और गृहमंत्री अमित शाह के विश्वास पात्र सम्राट चौधरी को दिया गया है। इससे इन अटकलों को जोर मिला है कि बिहार पर भाजपा का पूरा नियंत्रण हो चुका है और नीतीश कुमार महज रिमोट मुख्यमंत्री बन गए हैं। भाजपा की वर्षो से यही कोशिश रही कि बिहार का वंट्रोल उसके हाथ में आ जाए। इसी उद्देश्य से चुनाव से पहले भाजपा ने यह घोषणा नहीं की थी कि नीतीश ही अगले मुख्यमंत्री होंगे। भाजपा के इस उद्देश्य की प्राप्ति में अभी पूरी सफलता नहीं मिली है। चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि बिहार में नीतीश आज भी सबसे कद्दावर नेता हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस मजबूरी के चलते नीतीश को भाजपा की यह शर्त माननी पड़ी कि गृह विभाग उनके पास नहीं होगा, भाजपा अपने पास रखेगी और नीतीश को झुकना पड़ा। इस तरह अमित शाह के विश्वासपात्र सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री पद के साथ-साथ गृह मंत्रालय भी मिल गया। अगर यह कहा जाए कि अब नीतीश रिमोट मुख्यमंत्री हैं तो गलत शायद न हो। असल कंट्रोल तो दिल्ली से ही होगा। अब तमाम प्राशासन, पुलिस, कानून व्यवस्था इत्यादि सम्राट चौधरी के हाथ में होगी। बिहार में लालू राज समाप्त होने के बाद नीतीश कुमार नवम्बर 2005 में सत्ता में आए। उसके बाद लगातार 20 साल से गृह विभाग उनके पास था। लालू राज के जिस जंगलराज की बात इस चुनाव में कानून व्यवस्था स्थापित कर दहशत के उस दौर को समाप्त किया और शांति व्यवस्था लागू करवाने में नीतीश का विशेष योगदान रहा। अपराध पर नकेल कसी, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए, पुलिस को खुली छूट दी। सख्त कानून व्यवस्था के जरिए यह अवधारणा बनी कि अपराधी चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, सियासी दबदबा भी रखता हो, कानून की नजर से कोईं नहीं बच सकता। सुशासन का प्रादेश में ऐसा माहौल बना कि नीतीश कुमार सुशासन बाबू ही कहलाने लग गए। दो दशक के दौरान बिहार में कोईं बड़ा दंगा भी नहीं हुआ। नीतीश कुमार को इस बार गृह विभाग न मिलना चौंकाने वाला जरूर है। लोग इसका मतलब तलाश रहे हैं। क्या भाजपा यह संकेत दे रही है कि मजबूरी के चलते नीतीश को मुख्यमंत्री तो बना दिया पर कितने दिन तक वह इस पद पर टिके रहेंगे इस पर अटकलों का बाजार गर्म है। पर शपथ ग्राहण से पहले नीतीश को यह समझा दिया गया था कि चूंकि भाजपा की सीटें जद(यू) से ज्यादा हैं इसलिए गृह विभाग तो हमारे पास ही रहेगा। नीतीश कुमार ने अपने पैरों पर पहले ही वुल्हाड़ी मार ली थी इसलिए इसे स्वीकार करने के अलावा उनके पास शायद कोईं और विकल्प नहीं रहा होगा। पर नीतीश मंझे हुए खिलाड़ी हैं वह इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। क्या निकट भविष्य में बिहार में कोईं नया खेला भी देखने को मिल सकता है। वैसे भाजपा को गृह मंत्रालय मिलने से राज्य में अपराधियों पर तो नकेल कसेगी ही लेकिन यदि वैसा नहीं हुआ तो उसका असर भी उल्टा हो सकता है। गृह विभाग भाजपा को मिलने से पार्टी विरोधियों खासकर आरजेडी और कांग्रोस में बेचैनी बढ़नी स्वाभाविक है। अंत में जन सुराज पार्टीा के संस्थापक प्राशांत किशोर ने आरोप लगाया कि बिहार में नीतीश वुमार सरकार की नईं कैबिनेट भ्रष्ट और अपराधियों से भरी है। यह मंत्रिपरिषद बिहार के लोगों के मुंह पर एक तमाचा है। ——अनिल नरेन्द्र

Saturday, 22 November 2025

पीके क्यों चारों खाने चित हुए

2025 का बिहार विधानसभा चुनाव प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी के लिए पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी। यह चुनाव प्रशांत किशोर की खुद की भविष्यवाणी जैसा रहा कि उनकी पार्टी या तो अर्श पर होगी या फर्श पर होगी। नतीजों ने पार्टी को फर्श पर ही रखा। प्रशांत किशोर की छवि के आधार पर तैयार किए गए एक आक्रामक और व्यापक प्रचार अभियान के बावजूद जन सुराज पार्टी शुरुआती उत्साह को वोटों में नहीं बदल सकी। 243 में से 238 सीटों पर चुनाव लड़कर पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। दस में से चार मतदाताओं ने बताया (लगभग 39 प्रतिशत) कि उन्हें पार्टी से फोन कॉल, एसएमएस, व्हाट्सएप या सोशल मीडिया के जरिए कम से कम एक राजनीतिक संदेश मिला जो भाजपा के साथ सबसे ज्यादा था। इसी तरह 43 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनसे डोर टू डोर संपर्क किया गया। वोटरों से इस तरीके से संपर्क करने के मामले में जन सुराज पार्टी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। इस स्तर पर संपर्क ने पार्टी को एक तरह से fिबहार के कई स्थापित दलों की बराबरी पर ला दिया। ऐसी मौजूदगी के बावजूद उसे मिला समर्थन, सीमित रहा। इसके बाद से यह सवाल उठ रहा था कि क्या प्रशांत किशोर राजनीति छोड़ेंगे? मंगलवार को हुई पटना की प्रेस कांफ्रेंस में प्रशांत किशोर ने अपने इस बयान में सफाई दी है। उन्होंने कहा, मैं उस बात पर बिल्कुल कायम हूं। अगर नीतीश कुमार की सरकार ने वोट नहीं खरीदे हैं तो मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा। प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार ने उन्हें काउंटर किया कि जब आपने यह बयान दिया था तब ये शर्तें क्यों नहीं बताई थी? इस पर प्रशांत किशोर ने कहा, मैं किस पद पर हूं कि इस्तीफा दे दूं? मैंने ये तो नहीं कहा था कि बिहार छोड़कर चले जाएंगे। मैंने राजनीति छोड़ रखी है, राजनीतिकार ही नहीं रहे हैं। लेकिन ये तो नहीं कहा है कि बिहार के लोगों की बात उठाना छोड़ देंगे। जन सुराज पार्टी का दावा है कि नीतीश कुमार की सरकार ने चुनाव से पहले कई सारी योजनाएं लाईं और बिहार की जनता के खातों में पैसे भेजे। इनकी वजह से एनडीए फिर सत्ता में आई है और जन सुराज पार्टी को हार मिली है। हालांकि प्रशांत किशोर खुद अपनी जन सुराज पार्टी के लिए कुछ नहीं कर पाए। चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने कई मौकों पर दावा किया था कि इस बार बिहार में बदलाव होगा और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि प्रशांत किशोर इस हार के बावजूद राजनीति छोड़कर भागेंगे नहीं। वह लंबी रेस के घोड़े हैं। उन्होंने पड़े-लिखे लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की, अच्छे मुद्दे उठाए, प्रशांत किशोर ने पत्रकारों से कहा, जहां पिछले 50 साल से जाति की राजनीति का दबदबा हो वहां पहले ही प्रयास से 10 फीसदी वोट लाना हमारा जलवा है या क्या है, यह आप तय कर लीजिए। प्रशांत किशोर ने आगे कहा कि अगर हमारी पार्टी को दस प्रतिशत वोट आया है तो यह मेरी जिम्मेदारी है। भले ही यह मेरे अकेले की जिम्मेदारी नहीं है? लेकिन मैं पीछे हटने वाला नहीं हूं। इस दस प्रतिशत को 40 प्रतिशत करना है। यह एक साल में हो या पांच साल में। -अनिल नरेन्द्र

Thursday, 20 November 2025

बिहार परिणाम राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा असर करेगा

 
भारत में 10 साल से केंद्र और अधिकतर राज्यों में सरकार चला रही भाजपा जब लोकसभा चुनाव 2024 में 240 सीटों पर अटक गई और बैसाखियें के सहारे सत्ता में आई तो कई विश्लेषकों को लगा था कि यहां से भारतीय राजनीति में शायद भाजपा ढलान पर आ जाए लेकिन उसके बाद से देश के कई राज्यों में हुए चुनावों में लगातार जीत दर्ज कर भाजपा ने साबित कर दिया कि ये आकलन कहीं न कहीं गलत थे। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और अब बिहार में जीत दर्ज करने के बाद भाजपा ने यह साबित कर दिया कि वह चुनाव जीतना जानती है। आज भी चुनावी रणनीति बनाने और उसे सफल बनाने में भाजपा के सामने कोई राजनीतिक दल ठहरता नहीं है। ताजा उदाहरण बिहार का है। अब भारत के अहम हिंदी भाषी राज्य बिहार में भी भाजपा, जेडीयू और कई क्षेत्रीय दलें के एनडीए गठबंधन ने अप्रत्याशित और बेमिसाल जीत दर्ज की है। बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा भारत की राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा और बहुआयामी प्रभाव डाल सकता है। यह नतीजा भाजपा के लिए एक बड़ी जीत और सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने केंद्र की एनडीए सरकार और उसके नेतृत्व को मजबूती दी है। वहीं विपक्ष के लिए यह चुनौती और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने का अलर्ट है। विश्लेषक मान रहे हैं कि विपक्ष को अपनी नीतियों, नेतृत्व और रणनीति में व्यापक सुधार करना होगा ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी चुनौती पेश कर सकें। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि भाजपा बिहार परिणाम से और मजबूत होकर उभरेगी और उसका असर कई आगामी चुनावों तक दिखाई देगा। विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि भाजपा के भीतर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह और मजबूत होंगे। भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की चुनावी रणनीति एक बार फिर सटीक साबित हुई है। बिहार चुनाव परिणाम ने भाजपा, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व को फिर से मजबूत कर दिया है। विश्लेषक हेमंत अत्री के अनुसार बिहार चुनाव ने केंद्र सरकार की स्थिति जो 2024 के लोकसभा चुनावों में अल्पमत की स्थिति का सामना कर रही थी अब खुलकर अपने एजेंडे को चला सकेगी। अब उसे केंद्र सरकार की स्थिरता पर भी लगते प्रश्न चिह्नों की ज्यादा चिंता नहीं होगी। अब भाजपा और उसकी रणनीति पर विपक्ष के हमले कम हो सकते हैं और भाजपा दलितों, पिछड़ों और अन्य वर्गों से समर्थन हासिल करने की अपनी क्षमता को एक बार फिर प्रदर्शित करेगी। भाजपा अध्यक्ष का फैसला अब जो पिछले कई महीनों से लटका हुआ था उसका भी फैसला जल्द हो सकता है। अब फिर से इस धारणा को मजबूती मिलेगी कि मोदी इंविंसिबल यानी अजेय है। उन्हें कोई भी सत्ता से हिला नहीं सकता। इससे विपक्ष के मनोबल पर भी असर पड़ेगा। सीएसडीएस के निदेशक प्रोफेसर संजय कुमार मानते हैं कि भारतीय राजनीति पर भाजपा का एकक्षत्र राज मजबूत हो रहा है जो लोकसभा चुनाव के बाद लगने लगा था कि शायद भाजपा का प्रभाव कम हो रहा है, लेकिन लगातार कई राज्यों में पार्टी की जीत ने साबित कर दिया है कि वह अजेय हैं और चुनावी रणनीति में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता, बिहार के चुनाव नतीजों से भाजपा का आत्मविश्वास और बढ़ेगा तथा पार्टी के लिए यह एक उत्साह बढ़ाने वाला परिणाम है, खासकर असम, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल के चुनावों से पहले। विश्लेषज्ञोsं का हालांकि यह भी मानना है कि किसी एक राज्य परिणाम से कुछ सबक तो सिखे जा सकते हैं लेकिन इससे पूरे देश का मिजाज बदलना मुश्किल fिदखता है। विश्लेषक आमतौर पर इस बात पर सहमत हैं कि बिहार नतीजों ने यह साबित किया है कि महिलाओं को अब अलग मतदाता वर्ग के रूप में देखा जाएगा। बिहार नतीजें का एक अहम सबक यह है कि राजनीति दल महिला मतदाताओं की एक अहमियत समझेंगे और ये समझ बढ़ेगी कि महिलाओं को अपने साथ रखना है और अपनी चुनावी घोषणा पत्रों में इस बात का ध्यान रखकर योजनाएं बनानी होंगी। एनडीए गठबंधन ने ये दिखाया कि कुछ ऐसे वादे करते हैं, जिन्हें पूरा कर सकें। विश्लेषक मानते हैं कि आने वाले समय में भारतीय राजनीति पर वेलफेयर यानी समाज कल्याण योजनाओं का असर और ज्यादा नजर आ सकता है। यह बात एनडीए की बिहार जीत से साफ हो चुकी है। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 18 November 2025

बिहार में नीतीश कुमार की विश्वसनीयता


बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों ने यह तो साबित कर ही दिया है कि 20 साल शासन के बाद भी नीतीश कुमार की विश्वसनीयता अभी भी बनी हुई है। आज भी नीतीश बिहार के सबसे कद्दावर नेता हैं। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार की सेहत और सक्रियता पर सवाल छाए रहे। मीडिया से उनकी दूरी कुछ मंचों से उनके दिए बयान और हाव-भाव पर लोग सवाल उठा रहे थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंच पर उनकी अनुपस्थिति और रोड शो में बराबर न खड़ा होना विवाद का विषय बना हुआ था। बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव नीतीश को अचेत मुख्यमंत्री कहते थे। लेकिन इन सबके बावजूद बिहार की जनता कहती रही कि नीतीश कुमार की पार्टी इस बार 2020 की तुलना में बढ़िया प्रदर्शन करेगी। जेडीयू ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की। पार्टी कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक पोस्टर लगे ...टाइगर अभी जिंदा है। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा पहले से ही कई इंटरव्यू में यह कह चुके थे कि नीतीश कुमार को जब-जब कम आंका जाता है। तब-तब वह अपने प्रदर्शन से लोगों को चौंकाते रहे हैं। इस बार बिहार में 67.13 प्रतिशत मतदान हुआ जो पिछले विधानसभा चुनाव से 9.6 प्रतिशत ज्यादा है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान 8.15 प्रतिशत ज्यादा रहा है। आमतौर पर यह माना गया था कि नीतीश कुमार को इस बार महिलाओं का भारी समर्थन मिल रहा है और ये चुनाव के परिणामों में भी नजर आया। मुमकिन है कि महागठबंधन को भी इसका आभास था, इसलिए पहले चरण के मतदान से महज पंद्रह दिन पहले तेजस्वी यादव ने जीविका दीदियों के लिए स्थायी नौकरी, तीस हजार के वेतन, कर्ज माफी, दो सालों तक ब्याज मुक्त क्रैडिट , दो हजार का अतिरिक्त भत्ता और 5 लाख तक का बीमा कवरेज देने का लंबा-चौड़ा वादा किया। इसके बावजूद नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए। महागठबंधन चुनाव से लगभग एक महीने पहले नीतीश सरकार की तरफ से जीविका दीदियों के खाते में 10-10 हजार कैश बेनेफिट ट्रांसफर करने को वोट खरीदने से जोड़ती हो पर परिणाम बताते हैं कि इनका सीधा फायदा एनडीए को हुआ। ऐसा नहीं कि अपने लंबे कार्यकाल में नीतीश ने जनकल्याण योजनाएं नहीं चलाई। साल 2007 में ही नीतीश ने इस योजना की शुरुआत कर दी थी। नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में ही स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए साइकिल, पोशाक और मैट्रिक की परीक्षा पहली डिवीजन से पास करने वाली छात्राओं को दस हजार रुपए की राशि दी। बाद में 12वीं की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास करने पर 25000 रुपए और ग्रेजुएशन में 50,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जाने लगी। अपने पहले कार्यकाल में नीतीश ने महिलाओं को पंचायत चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया। पुलिस भर्ती में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण की सुविधा दी और इस बार के चुनाव में भी वादा किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो राज्य सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। नीतीश कुमार को इस बार अति पिछड़ा वर्ग का भी भरपूर समर्थन मिला है। प्रभुत्व वाली नीतियों के खिलाफ ईबीसीवी जातियां एकजुट नजर आईं और उन्होंने एनडीए को वोट दिया। नीतीश कुमार जिस सामाजिक वर्ग से आते हैं, वह बिहार की आबादी का सिर्फ 2.91 प्रतिशत है। इसके बावजूद वह इतने बड़े गठबंधन के नेता बने। आमतौर पर माना जा रहा है कि तेजस्वी के लिए अब भी पिता लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल की जंगलराज वाली छवि को भेदना मुश्किल हो गया था और चुनाव में यह एक मुद्दा जरूर बना। दूसरी तरफ नीतीश कुमार सुशासन बाबू की अपनी छवि को अब भी बनाए हुए हैं। 20 साल सत्ता में रहने के बावजूद नीतीश कुमार की साफ-सुथरी छवि है, उन पर आज तक भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा। पर आलोचक यह भी कहते हैं कि नीतीश के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार होते हुए भी बिहार देश के सबसे गरीब राज्यों में है। पलायन आज भी एक बहुत बड़ी वास्तविकता है। नीतीश ने इन मुद्दों को गंभीरता से अड्रैस नहीं किया और इन पर काम करना अब एनडीए की सरकार के लिए एक चुनौती है। एक विश्लेषक का मानना है कि नीतीश कुमार को सहानुभूति वोट भी मिलें क्योंकि कुछ लोगों का मानना था कि यह इलेक्शन नीतीश कुमार का फेयरवेल इलेक्शन था और बिहार के वोटरों ने वोट के जरिए अपने नेता को एक अच्छा फेयरवेल दिया है। लोगों में एक संदेश था कि ये शायद नीतीश कुमार का आखिरी चुनाव है। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 15 November 2025

यह डॉक्टर्स ऑफ डेथ

 
राजधानी के स्कूलों और अस्पतालों के आतंकी खतरे संबंधी कई सरकारी इमारतों को बम से उड़ाने की धमकी भरे ई-मेल 30 अप्रैल 2024 से लगातार आ रहे थे। इस वजह से डेढ़ साल से दिल्ली-एनसीआर में दहशत का माहौल बना हुआ था। लेकिन केन्द्राrय जांच एजेंसियों से लेकर खुफिया एजेंसियां इसकी तह तक नहीं पहुंच सकी। अचानक सोमवार 10 नवम्बर शाम को लाल किला मेट्रो स्टेशन गेट नंबर एक के पास हुए तेज धमाके ने देश को हिलाकर रख दिया। यह 14 साल बाद दिल्ली की राजधानी में हुआ बड़ा बम धमाका था। यह हमारी खुफिया एजेंसियों की भारी विफलता थी। चौंकाने वाली बात यह है यह विस्फोट सोमवार को फरीदाबाद के पास एक कश्मीरी डॉक्टर के किराये के मकान से 360 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट और एक एके-47 राइफल समेत हथियार बरामद होने के कुछ ही घंटों बाद हुआ। दरअसल देशभर में 15 दिन तक चले ऑपरेशन के जरिए जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गलवत-उल-हिन्द से जुड़े एक आतंकवादी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया जिसमें कई आतंकी मॉड्यूल जिसमें डॉक्टर समेत 8 संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया। इनसे 2,900 किलो विस्फोटक जब्त किया गया। इसके तार कश्मीर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक फैले हुए हैं। इससे साफ होता है कि देशभर में कई आतंकी मॉड्यूल सािढय हैं, जो टेरर फैलाने में जुटे हुए हैं। दिल्ली में सोमवार की शाम जो ब्लास्ट हुआ, जिसमें 12 लोगों की जान जा चुकी है और दर्जनों घायल हैं को अंजाम देने वाला जेहादी मानसिकता का एक डाक्टर है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हरियाणा पुलिस के साथ मिलकर फरीदाबाद के फतेहुपर टागा गांव में मुजम्मिल शकील द्वारा किराए पर लिए गए दो घरों पर छापेमारी के दौरान 2900 किलोग्राम आईईडी बनाने की सामग्री बरामद की थी। बाबत इसके शाम को ही लाल किले में ब्लास्ट हो गया। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि टेरर मॉड्यूल्स के डॉक्टर्स ऑफ डेथ क्या इस हमले की पटकथा पहले ही लिख चुके थे या फिर अपने साथियों की गिरफ्तारी होने के बाद बदला लेने के लिए इस ब्लॉस्ट की प्लानिंग की गई। क्योंकि कार में सवार पुलवामा का डॉक्टर उमर मोहम्मद भी इसी मॉड्यूल का हिस्सा बताया जा रहा है। हालांकि मामले पर अभी खुलकर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। अब सरकार ने भी यह माना है कि यह एक आतंकी हमला था, जिसकी तार जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ती हैं। जितनी मात्रा में विस्फोटक सामान बरामद हुआ है, उससे साफ था कि इनकी साजिश कुछ बड़ा करने की थी। जिस तरह उमर ने कार को लाल किले की पार्किंग में घंटों खड़ा रखा और फिर लाल किले के सामने ब्लास्ट हो गया। ऐसे में वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। क्योंकि सुबह ही फरीदाबाद में इतना विस्फोटक बरामद हुआ था। बावजूद इसके बाद लाल किले पर सुरक्षा व्यवस्था का यह हाल था। रोज की तरह बाहर गाड़ियां बेढंगे तरीके से खड़ी थी। आतंका का चेहरा अब और अधिक रहस्ममय और खौफनाक होता जा रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि शालीनता का मुखौटा ओढ़े यह चेहरे आपके आसपास ही सािढय हैं कि आपसे थोड़ी सी चूक हुई तो यह आपको अपना शिकार बनाने में देर नहीं करेंगे। फरीदाबाद में विस्फोटकों की बरामदगी और दिल्ली में लाल किले धमाके से साबित हो गया है कि यह सफेदपोश आतंकी की नई पौध कट्टरपंथी सोच में आकंठ डूबी है। डाक्टरों के फूलप्रूफ आतंकी नेटवर्क ने देश के कई हिस्सों में कहर बरपाने की भयावह साजिश रची थी। सहारनपुर के फेमस अस्पताल में तैनात डॉ. अदील की एक माह की छुट्टी और इस दौरान पोस्टर लगाने में चूक ही देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए अहम कड़ी बनी। दरअसल, जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में जैश-ए-मोहम्मद के समर्थन में धमकी भरे पोस्टर लगाते समय डॉ. अदील मौलाना इरफान के साथ सीसीटीवी में कैद हो गया। बस इसी फुटेज के आधार पर श्रीनगर पुलिस ने पहले मौलाना को हिरासत में लिया और फिर डॉक्टर अदील तक पहुंची। दिल्ली-एनसीआर और सहारनपुर में सािढय आतंकियों के डाक्टर गैंग के खतरनाक मंसूबे का खुलासा हैरान करने वाला है। जाहिर है कि इस हादसे का असर दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश की एकता व शांति के लिए खतरा है। दोषियों को सजा सुनिश्चित करने की दिशा में जांच एजेंसियां, सरकार देनों अपना काम कर ही रही हैं पर लोगों को भी सतर्क रहना होगा और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरन्त सूचना देने के लिए अलर्ट रहना होगा। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 13 November 2025

आसिम मुनीर को तानाशाह बनाने की राह पर


पाकिस्तान का इतिहास सैन्य शासन से भरा हुआ है। यहां चुनी हुईं सिविलयन सरकार थोड़ा समय चलती है फिर कोई न कोई जनरल शासन का तख्ता पलट देता है। ताजा उदाहरण पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को ही ले लीजिए। पाकिस्तान में शाहबाज शरीफ की सरकार भारत के ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेते हुए संवैधानिक बदलाव की तैयारी में है। जिसमें सेना प्रमुख आसिम मुनीर को चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) बनाने की योजना है, इससे उनकी शक्तियां संवैधानिक रूप से बढ़ जाएंगी। पाकिस्तान की शाहबाज शरीफ ने लगता है कि एक बार फिर अपने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को सत्ता के शिखर पर पहुंचाने का फैसला किया है। 8 नवम्बर को संसद में पेश 27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक के जरिए रक्षा बलों के प्रमुख (चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस) सीडीएफ नामक एक नया अत्यंत शक्तिशाली पद सृजित कर दिया गया, जो सीधे मुनीर के लिए ही रचा गया प्रतीत होता है। यह पदोन्नति मई 2025 में भारत के साथ हुए चार दिवसीय संघर्ष के बाद मिले फील्ड मार्शल के सम्मान के ठीक छह महीने बाद हो रही है। लेकिन सवाल उठता है कि आतंकवाद के कथित संरक्षक मुनीर को यह दोहरी मेहरबानी आखिर क्यों? क्या मई का संघर्ष ही वह कारनामा है या फिर पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता और सैन्य तानाशाही को मजबूत करने की साजिश? अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुनीर को ओसामा बिन लादेन इन सूट कहा जाता है और अब यह प्रमोशन उसके दोहरे चेहरे-एक तरफ आतंक के प्रायोजक, दूसरी तरफ क्षेत्रीय स्थिरता के हामी-की ओर उजागर कर रहा है। संवैधानिक संशोधन ः मुनीर की कमान को संवैधानिक छतरी लेकिन लोकतंत्र पर सहमे कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने कैबिनेट की मंजूरी के बाद सीनेट में पेश किए गए इस विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 243 में व्यापक बदलाव प्रस्तावित है, जो सशस्त्र बलों की कमान संरचना को पूरी तरह पुनर्गठित कर देते हैं। यह 27वां संविधान विधेयक पाकिस्तान के संविधान में एक बड़ा बदलाव लाने वाला प्रस्तावित कानून है। इस संशोधन में अनुच्छेद 243 संशोधन भी शामिल है, जिसके तहत रक्षा बलों के प्रमुख का पद औपचारिक रूप से सेना प्रमुख को सौंप दिया जाएगा और उन्हें आजीवन फील्ड मार्शल का पद प्रदान किया गया है। अगर यह बिल पास हुआ तो सेना प्रमुख आसिम मुनीर आजीवन फील्ड मार्शल के पद पर रहेंगे। हालांकि इसका विपक्ष पुरजोर विरोध कर रहा है। पाकिस्तान सरकार का दावा है कि यह बदलाव देश की रक्षा आवश्यकताओं और सैन्य कमान-संरचना को आधुनिक बनाने के लिए किया जा रहा है। पाकिस्तान ने सीडीएफ का जो मसौदा पेश किया है, वह भारत के चीफ डिफेंस ऑफ आर्मी स्टॉफ (सीडीएस) के प्रारूप की चोरी की है। मजलिस-ए-वहदत-ए-मुस्लेमीन पार्टी प्रमुख अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने कहा है कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं पंगू हो चुकी हैं। राष्ट्र को (प्रस्तावित) 27वें संशोधन के खिलाफ कदम उठाना चाहिए। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 11 November 2025

बिहार यूं ही नहीं लोकतंत्र की जननी


मतदान के प्रथम चरण में गुरुवार को हुए बंपर मतदान ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि बिहार यूं ही नहीं लोकतंत्र की जननी है। 64.46 प्रतिशत बता रहा है कि यहां के लोकतांत्रिक मूल्यों की कितनी एहमियत है। अगर कई मतदान केन्द्राsं पर लाइट न जाती और कई स्थानों पर ईवीएम खराबी की शिकायतें नहीं आती तो यह 2-3 प्रतिशत और बढ़ जाता। मतदान में जनता की भागीदारी अधिक होने का मतलब साफ है कि भारत में अभी भी लोकतंत्र जीवित है। इनका एक अर्थ यह भी निकलता है कि जनता राजनीति से उदासीन नहीं है। लोकतंत्र में ऐसा ही होना चाहिए। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 121 सीटों पर गुरुवार को पिछली बार के मुकाबले 31 लाख 81 हजार 858 अधिक मत पड़े। बिहार के मुख्य (चुनाव) निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) विनोद सिंह गुनियाल ने कहा कि मतदाता जागरूकता, मतदाता सूची की सफाई और महिला, युवा एवं बुजुर्ग मतदाताओं का उत्साह वोट प्रतिशत बढ़ाने में सहायक बना। उन्होंने उम्मीद जताई कि दूसरे चरण के मतदान में भी मतदाताओं का उत्साह बढ़-चढ़ कर वोट करेगा। सीईसी ने कहा कि बिहार ने देश को राह दिखाई है। पहले चरण में महागठबंधन के सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव, डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा, सम्राट चौधरी समेत कई बड़े नामों की किस्मत दांव पर है। इस चरण में बिहार में दो दशकों से सत्तासीन नीतीश कुमार या उनकी जगह कोई और इस दौर के चुनाव में एक बड़ा बहस का मुद्दा रहा। हाल के चुनावों में यह सवाल इतनी मजबूती के साथ कभी नहीं पूछा गया था। जनता जो भी निर्णय लेगी, वह राज्य की सामाजिक-राजनीतिक दिशा तय करेगी। सबसे सकारात्मक बात यह रही कि बिहार की जनता ने इस बात को समझा और 2020 की तुलना में लगभग 13-14 प्रतिशत ज्यादा वोट दिया। बिहार के 18 जिलों की 121 सीटों के लिए हुए रिकार्ड मतदान पर दोनों गठबंधन के नेता, कार्यकर्ताओं के जरिए आंकलन करने में लगे हैं। दोनों ही तरफ से हालांकि जीत के दावे पहले ही कर दिए गए हैं। एनडीए नेता बंपर वोटिंग को महिला मतदाताओं के चमत्कार के रूप में देख रहे हैं तो महागठबंधन अपने लिए बेहतर मान रहा है। मतदान केंद्रों पर महिला मतदाताओं की लंबी कतारें दिखने के बाद एनडीए में कहा जा रहा है कि यह सीएम नीतीश कुमार द्वारा महिला रोजगार योजना के जरिए 1 करोड़ 40 लाख महिलाओं को दिए गए 10-10 हजार रुपए के बाद पैदा भरोसे के लिए वोट है। सीएम की यह स्कीम आगे भी जारी रहनी है और इनके अलावा पीएम मोदी की केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों पर भी भरोसे का वोट है। लेकिन आरजेडी इसे तेजस्वी यादव द्वारा सरकार बनते ही आगामी मकर पांति पर 14 जनवरी को 30 हजार रुपए (हर महीने 2500 रुपए की स्कीम) देने के वादे के लिए किया गया वोट है। कांग्रेस को भरोसा है कि युवा वर्ग ने वोट चोरी के मुद्दे को लेकर सत्तारुढ़ गठबंधन के खिलाफ वोट दिया है। इस बार चुनाव में एसआईआर और वोट चोरी भी मुद्दे रहे। युवा तबके में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा था। लगता भी है कि इस बार जेन-जी (18-25 वर्ष) के युवाओं ने भी बढ़-चढ़ कर वोट दिया है। याद रहे कि वोटिंग के एक दिन पहले ही राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर यह आरोप लगाए। फिर एसआईआर के कारण पहले के मुकाबले करीब 47 लाख कम वोट हैं। इसके बावजूद जनता ने पोलिंग बूथों पर पहुंचकर अपनी राय जोर-शोर से प्रकट की। चुनावी धांधलियों के आरोप भी लग रहे हैं। कहीं तो स्ट्रांग रूम में अवैध लोगों की एंट्री बताई जा रही है, कहीं ईवीएम की पर्चियां सड़कों पर फेंकी जा रही हैं तो कहीं पर वोटिंग मशीन खराब होने और बिजली काटने के आरोप लग रहे हैं। नेताओं को भगाया जा रहा है तो कहीं गोबर तक फेंका गया है। एनडीए सरकार को हर मोर्चे पर विफल बताते हुए लालू प्रसाद यादव की टिप्पणी जोरदार रही। अपने एक्स हैंडल पर लालू ने लिखा ः तवा पर रोटी पलटती रहनी चाहिए नहीं तो जल जाएगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 8 November 2025

ममदानी की ऐतिहासिक जीत

अमेरिका में इस साल यानी 2025 में दो ऐसे चुनाव हुए हैं जिनका असर पूरी दुनिया में पड़ा है। पहला 20 जनवरी को हुआ जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने। इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। दूसरा चुनाव 4 नवम्बर को हुआ जब जोहरान ममदानी ने न्यूयार्क सिटी के मेयर का चुनाव जीता है। यह कोई साधारण चुनाव नहीं था। कई मामलों में यह ऐतिहासिक चुनाव था। पहली बार 1892 के बाद से न्यूयार्क के सबसे युवा मेयर जोहरान ममदानी की जीत हुई है। वो न्यूयार्क सिटी के पहले मुस्लिम मेयर भी होंगे। उन्होंने पिछले साल ही चुनावी मैदान में पांव रखा था। उस समय उनके पास न तो कोई बड़ी पहचान थी, न ही बहुत सारे पैसे और न ही पार्टी का समर्थन था। यही वजह है कि उनकी एंड्रयू कुओमो और रिपब्लिक उम्मीदवार कार्टिस स्लिवा पर मिली जीत न केवल असाधारण थी पर कई मायनों में ऐतिहासिक भी है। ममदानी युवा और करिश्माई हैं। फ्री चाइल्ड केयर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के विस्तार और फ्री मार्पेट सिस्टम में सरकारी दखल जैसे वामपंथी मुद्दों का समर्थन किया। न्यूयार्क शहर में करीब 48 फीसदी ईसाई और 11 फीसदी यहूदी हैं। यहां मुस्लिम भी नौ फीसदी हैं जो अमेरिका में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी का घर है। कहा जाता है कि 9ध्11 के बाद इस्लामोफोबिया की विरासत से यह शहर अब तक उभर नहीं सका है। यहां आज तक कोई मुस्लिम मेयर रहा भी नहीं। इसके बावजूद अगर ममदानी को जीत मिली है तो यह केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि उनकी सुविचारित मुहिम की जीत अधिक लगती है। 34 साल के जिस युवा को उसके कम अनुभव की वजह से पहले चुनावी लड़ाई में कमजोर माना जा रहा था, बाद में वही सबसे अहम फैक्टर साबित हुआ। उनकी खासियत रही जनता से जुड़ाव। उन्होंने विज्ञापनों पर खर्च करने की बजाए सीधे लोगों से संवाद किया। आम शहरों की समस्याओं को समझा और कई ऐसे वादे किए जो न्यूयार्क के नागरिकों को समझ आ गए, भा गए। ममदानी ने अपने चुनावी अभियान के दौरान भी मैनहैटन और न्यूयार्क सिटी के रहने वाले बड़े कार्पोरेट और कारोबारियों की कड़ी आलोचना की थी। इसलिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, एलन मस्क और तमाम उद्योगपतियों ने ममदानी का जमकर विरोध भी किया। ट्रंप ने धमकी भी दे डाली कि अगर ममदानी जीते तो वो उसकी फंडिंग बंद कर देंगे। उनकी मुस्लिम होने पर भी आलोचना की गई पर ममदानी ने खुलकर स्वीकार किया कि वह एक मुसलमान हैं और इस पर उन्हें गर्व है। इसलिए तमाम इस्लामिक दुनिया में उनकी जीत को एक नए युग का आगाज माना जा रहा है। वह न केवल ट्रंप के लिए सिरदर्द बन सकते हैं बल्कि नेतन्याहू को तो अगर वह न्यूयार्क आए तो उन्हें गिरफ्तार करने की भी धमकी वह दे चुके हैं। वह हमारे प्रधानमंत्री की भी आलोचना कर चुके हैं और 2002 गुजरात दंगों को याद कराते रहते हैं। हालांकि जीतने के बाद अपने पहले भाषण में ममदानी ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को याद किया। अपनी विक्ट्री स्पीच में ममदानी ने पंडित नेहरू को याद करते हुए कहा, मैं जवाहर लाल नेहरू के शब्दों के बारे में सोचता हूं। इतिहास में ऐसा क्षण बहुत कम आता है, जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं। जब एक युग का अंत होता है और एक राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है। आज रात हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। -अनिल नरेन्द्र

Thursday, 6 November 2025

बाहुबल, बदला, सियासी संग्राम का प्रतीक मोकामा



बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा विधानसभा सीट सुर्खियों में है। 30 अक्टूबर को जन सुराज पार्टी के समर्थक बाहुबली दुलारचंद यादव की सरेआम हत्या ने राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। यह सीट सिर्फ दो बाहुबली परिवारों की सियासत-विरासत का प्रतीक बन चुकी है, बल्कि बिहार की राजनीति में बाहुबल और सत्ता के गठजोड़ की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है। पिछले हफ्ते गुरुवार को दुलारचंद यादव की हत्या कर दी गई थी। दुलारचंद की हत्या का आरोप बाहुबली अनंत सिंह पर लगा। अनंत सिंह को राजनीतिक दबाव के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। शनिवार देर रात पटना पुलिस ने बाढ़ शहर के बेढना गांव से अनंत सिंह को उन्हीं के करगिल मार्पेट से गिरफ्तार कर लिया था। अनंत सिंह इसी करगिल मार्पेट की इमारत में रहते हैं। अनंत सिंह की गिरफ्तारी जब हुई तो उनके एक समर्थक संदीप कुमार ने बताया कि रात 12.30 बजे पटना पुलिस आई थी और विधायक जी को अपने साथ ले गई। अनंत सिंह मोकामा में हर जाति के हीरो हैं। सूरजभान सिंह चाहे जितनी कोशिश कर लें इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा। वीणा सिंह इलाके के बाहुबली नेता सूरजभान सिंह की पत्नी हैं और उन्हें ही राष्ट्रीय जनता दल ने मोकामा सीट से उम्मीदवार बनाया है। मोकामा से अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी विधायक हैं लेकिन इस बार खुद अनंत सिंह चुनावी मैदान में हैं। बता दें कि मोकामा भूमिहारों के दबदबे वाला इलाका है। सूरजभान और अनंत दोनें इसी जाति से ताल्लुक रखते हैं। जन सुराज पार्टी से पीयूष प्रियदर्शी मैदान में हैं, जो धानुक जाति से हैं। ऐसे में लड़ाई केवल भूमिहारों के वोट को लामबंद करने की नहीं है बल्कि गैर यादव ओबीसी और दलित वोटों को हासिल करने की भी है। दुलारचंद की हत्या के प्रत्यक्षदर्शी पीयूष प्रियदर्शी के अनुसार घोसवरी प्रखंड के तारतर गांव में अनंत सिंह आए थे। इसी गांव से अनंत सिंह का काफिला निकला। पीयूष प्रियदर्शी कहते हैं बसावनचक गांव से मेरा काफिला जा रहा था, मेरे साथ दुलारचंद यादव भी थे। यह मोकामा विधानसभा क्षेत्र के टाल का इलाका है। दोनों का काफिला तारतर और बसावनचक गांव के बीच में टकराया। अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद पटना के एसएसपी कार्तिकेय शर्मा ने रविवार को प्रेस कांफ्रेंस में कहा, दुलारचंद की हत्या जहां हुई वहां अनंत सिंह मौजूद थे। अनंत सिंह इस मामले में मुख्य अभियुक्त हैं। रविवार को अनंत सिंह को गिरफ्तार कर पटना की सीजेएम की अदालत में पेश किया गया और अदालत ने अनंत सिंह व उनके दो अन्य साथियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। आदेश के बाद तीनों को बेऊर जेल भेजा गया। मोकामा के जदयू प्रत्याशी अनंत सिंह के साथ ही मणिकांत ठाकुर और रंजीत कुमार को शनिवार देर रात गिरफ्तार किया गया था। तारतर दुलारचंद का गांव है। दो बाहुबलियों के बीच पीयूष का चुनाव लड़ना बताता है कि वह किसी से डरते नहीं हैं। भूमिहारों के बाद धानुकों की तादाद अच्छी खासी है। धानुक उनके साथ हैं। दुलारचंद के पोते नीरज यादव ने आरोप लगाया है कि अनंत सिंह के साथ रंजीत राम और मणिकांत ठाकुर की गिरफ्तारी मामले में नया जातीय मोड़ देने के लिए की गई है। यह उलझाने के लिए किया गया है कि इसमें दलित भी शामिल हैं। अनंत सिंह के साथ जिन दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है, वे नदावां गांव के हैं। नदावां अनंत सिंह का पैतृक गांव है। गीता ने बीबीसी को बताया कि उन्हें रविवार सुबह पता चला कि उनके पति को गिरफ्तार कर लिया गया है। गीता कहती हैं कि मेरे पति अनंत सिंह के लिए खाना बनाते थे। उनका यही गुनाह है। अनंत सिंह को जेल में कोई सेवा करने के लिए चाहिए, इसलिए दोनों को पुलिस साथ ले गई है। 58 साल के अनंत सिंह और उनके परिवार का मोकामा विधानसभा क्षेत्र में पिछले 35 सालों से दबदबा है। अनंत कुमार 1990 के दशक में तब चर्चा में आए जब उन पर कई गंभीर आरोप लगे। उनके खिलाफ हत्या, अपराध के दर्जनों मामले हैं। जिसमें एके-47 बरामदगी भी शामिल है। सूरजभान सिंह ने सन 2000 में मोकामा से अनंत सिंह के भाई को हराकर अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। सूरजभान सिंह भी हत्या, रंगदारी के मामले में घिरे रहे हैं। दुलारचंद यादव ने 1990 में विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन मामूली अंतर से अनंत सिंह के भाई दिलीप सिंह से हार गए थे। 1991 से 2010 के बीच उन पर हत्या, अपहरण, रंगदारी से जुड़े 11 मामले दर्ज हुए थे। 1990 से अब तक मोकामा सीट का इतिहास बाहुबल, प्रभाव और बदले की राजनीति से भरा हुआ है। इसीलिए इन बाहुबलियों को गैंग्स ऑफ मोकामा कहा जाता है।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 4 November 2025

प्रधानमंत्री का गठबंधन पर तीखा हमला


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के लिए जारी एनडीए के संकल्प पत्र की तारीफ करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, एनडीए का संकल्प-पत्र आत्मनिर्भर और विकसित बिहार के हमारे विजन को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। इसमें किसान भाई-बहनों, युवाओं और माताओं-बहनों के साथ ही राज्य के मेरे सभी परिवार जनों के जीवन को और आसान बनाने के लिए हमारी प्रतिबद्धता दिखाई देगी। पीएम ने कहा बिहार के चौतरफा विकास के लिए राज्य की डबल इंजन सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। राज्य के बदलावों का साक्षी बना है। इसमें और तेजी लाकर सुशासन को जन-जन की समृद्धि का आधार बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। उम्मीद है कि इन प्रयासों को जनता का समर्थन मिलेगा। वहीं प्रधानमंत्री ने गत गुरुवार को मुजफ्फरपुर जिले के मोतीपुर चीनी मिल मैदान और छपरा हवाई अड्डे मैदान में सभाओं को संबोधित किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस-राजद गठबंधन पांच ‘क' कट्टा, ाtढरता, कटुता, कुशासन और करप्शन का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह पांच ‘क' राजद के जंगलराज की पहचान है। राजग-कांग्रेस का घोषणा पत्र वास्तव में एक रेट चार्ट है। उनके वादे रंगदारी, फिरौती, भ्रष्टाचार, लूट के हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि राजग की रैलियों में किस तरह के गाने बजाए जा रहे हैं। इनमें, कट्टा, दुनाली और बहन-बेटियों के अपहरण की बात है। मोदी ने मुजफ्फपुर और छपरा में अपनी रैलियों में यह दावा किया कि राज्य में राजद शासन के दौरान 35,000-40,000 अपहरण हुए और गुंडे वाहन शोरूम लूटते थे। उनका इशारा पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सबसे बड़ी बेटी मीसा भारती की शादी की ओर था। मीसा वर्तमान में पाटलीपुत्र से सांसद हैं। मोदी ने कहा कि दूसरी ओर राजग सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और सम्मान देने तथा बिहार सहित अन्य राज्यों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करने का पक्षधर है। प्रधानमंत्री ने कहा कि सभी सर्वे बता रहे हैं कि आरजेडी-कांग्रेस को अब तक की सबसे कम सीटें मिलेंगी। एनडीए को सबसे बड़ी जीत मिलने जा रही है। मोदी ने कहा कि एनडीए सरकार छठ पूजा को यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शामिल करवाने के लिए प्रयास करेगी। दूसरी ओर आरजेडी-कांग्रेसियों की भक्ति, समता, ममता, समरता के महापर्व को ड्रामा-नौटंकी बता रहे हैं। उन्होंने लोगों से पूछा कि आपने कभी राजद और कांग्रेस वालों को राम मंदिर जाते देखा क्या? उन्हें डर है अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन कर लेंगे तो उनके वोट बैंक नाराज हो जाएंगे। तुष्टिकरण का गणित बिगड़ जाएगा। आपकी आस्था का जो लोग सम्मान नहीं कर सकते वह कभी यहां आकर के स्थलों का विकास नहीं कर सकते। पीएम ने कहा, एनडीए का सवाल है कि बिहार में पढ़ाई, कमाई, दवाई और सिंचाई के भरपूर अवसर बने। यहां के बेटा-बेटी अब पलायन नहीं करेंगे। बल्कि यहीं काम कर बिहार का नाम रोशन करेंगे। पीएम ने जीएसटी छूट का पा करते हुए कहा कि इससे बिहार के युवाओं ने इस साल सितम्बर-अक्टूबर में डेढ़ लाख से अधिक मोटरसाइकिलें खरीदीं। जंगलराज में नई गाड़ी खरीदते ही आरजेडी के गुंडे पीछे लग जाते थे। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 1 November 2025

और अब बिहार चुनाव में राहुल की एंट्री


बिहार विधानसभा चुनाव का प्रचार अब धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंचता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद नेता तेजस्वी यादव तो मैदान में उतर ही चुके हैं। अगर कमी महसूस की जा रही है तो कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की कमी महसूस की जा रही थी। सियासी गलियारों में सवाल पूछा जा रहा था कि पिछले एक महीने से ज्यादा समय से राहुल गांधी कहां गायब हो गए? जब बिहार का चुनाव प्रचार अपनी चरम सीमा पर पहुंचता जा रहा है। ऐसे में राहुल गांधी की गैर मौजूदगी पर तरह-तरह के सवाल खड़े हो रहे थे। अंतत राहुल गांधी बिहार पहुंच ही गए और अगर यह कहा जाए कि उन्होंने एक ड्रेमेटिक एंट्री की तो यह कहना गलत नहीं होगा। राहुल गांधी ने मुजफ्फरपुर से अपनी पहली चुनावी रैली की शुरुआत की और दरभंगा में भी एक रैली को संबोधित किया। राहुल गांधी की रैलियों ने ही हंगामा खड़ा कर दिया। अपनी पहली रैली में उन्होंने कुछ ऐसा कहा जिस पर विवाद खड़ा हो गया। अपनी पहली चुनावी रैली में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। राहुल गांधी ने कहा, उन्हें सिर्फ आपका वोट चाहिए। अगर आप कहोगे नरेन्द्र मोदी जी आप ड्रामा करो तो वह कर देंगे। उन्हें कहो हम आपको वोट देंगे और आप स्टेज पर डांस करो तो वो डांस कर देंगे। चुनाव से पहले जो भी करवाना है, करवा लो क्योंकि चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी दिखाई ही नहीं देंगे। चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी जी अंबानी जी की शादी में दिखाई देंगे। किसानों-मजदूरों के साथ नहीं बल्कि सूट-बूट वालों के साथ दिखाई देंगे। उन्होंने कहा वो आपकी वोट चोरी में लगे हुए हैं क्योंकि वो कहते हैं यह इलेक्शन वाली बीमारी खत्म कर दो। महाराष्ट्र और हरियाणा में इन्होंने चुनाव चोरी किया है और बिहार में पूरी कोशिश करेंगे कि बिहार की आवाम की सरकार न बने। महागठबंधन की गारंटी है कि हर वर्ग, जात, धर्म की सरकार बिहार में बनाएंगे और किसी को पीछे नहीं छोड़ेंगे। इसी दौरान राहुल गांधी ने कहा कि 20 साल से नीतीश कुमार सरकार चला रहे हैं, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए उन्होंने क्या किया है? जनता का ऐसा विकास चाहती है जहां अडानी को एक-दो रुपए में जमीन दी जाए और लोगों को रोजगार न मिले। राहुल गांधी के बयान की भाजपा ने निंदा की है। भाजपा के प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने एक्स पर पोस्ट कर राहुल गांधी के बयान को एक लोकल गुंडे जैसी भाषा बताया और लिखा, राहुल गांधी एक लोकल गुंडे की तरह बोलते हैं। राहुल गांधी ने खुलेतौर पर भारत और बिहार के हर गरीब और उस शख्स का अपमान किया है जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को वोट दिया है। राहुल गांधी ने मतदाताओं और भारतीय लोकतंत्र का मजाक बनाया है। वहीं दरभंगा की रैली में राहुल गांधी ने कहा कि अमित शाह कहते हैं कि जमीन की कमी हैं तो फिर अडानी को एक रुपए में कौन सी जमीन दी जा रही है? उन्होंने कहा, जब अंबानी-अडानी को जमीन देनी होती है तो जमीन मिल जाती है। जब किसान से जमीन छीननी होती है तो दो मिनट में जमीन मिल जाती है। बिहार के बच्चों को बिजनेस या कारखाना चलाना हो तो अमित शाह कहते हैं कि बिहार में जमीन नहीं है। इसी दौरान राहुल गांधी ने (शायद पहली बार सार्वजनिक रूप से) घोषणा की कि महागठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव होंगे। चलते-चलते राहुल ने कहा कि एनडीए सरकार ने राज्य को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर पीछे धकेला है। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता अब महागठबंधन की ओर उम्मीद से देख रही है। हम बिहार को हर क्षेत्र में नंबर वन बनाएंगे। हमें मेड इन चाइना नहीं अब मेड इन बिहार चाहिए। उन्होंने बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए और कहा राज्य के युवा दिन-रात मेहनत करते हैं लेकिन अंत में पेपर लीक हो जाता है। कुछ चुने लोगों को एग्जाम से पहले पेपर दे दिया जाता है। यही शिक्षा व्यवस्था का हाल बदलना है। आप राहुल की दलीलों से सहमत हों या न हों पर इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि जो वो कह रहे हैं उसमें बहुत दम है और बिहार में इसी बदलाव की भी जरूरत है। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 30 October 2025

बिहार चुनाव में महिलाओं की भूमिका


बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार एक बड़ा बदलाव नजर आ रहा है। इस बार चुनाव में पहले के मुकाबले महिलाओं की ज्यादा भागीदारी देखने को मिल रही है। कई ऐसी उच्च शिक्षा ग्रहण कर चुकी बेटियां भी चुनावी मैदान में उतरी हैं जिनके कंधों पर पिता की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की चुनौती है। विधानसभा चुनाव में इस बार जो अच्छी बात देखने को मिल रही है वो है महिलाओं की भागीदारी जो आमतौर पर कम देखने को मिलती है। इस बार मैदान में ऐसी महिलाएं दांव आजमा रही हैं जिन्होंने बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों से उच्च शिक्षा ग्रहण की है। बिहार की चुनावी रणभूमि में उतरने का साहस दिखाने वाली इन बेटियों का आना एक शुभ और अच्छा संकेत माना जाएगा। सत्ताधारी पार्टी एनडीए की बात करें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुजुर्ग और विधवा पेंशन बढ़ा दी है। डोमिसाइल नीति के तहत बिहार की सरकारी नौकरियों में 35 फीसद स्थानीय महिलाओं की भागीदारी की घोषणा की है। सहायिका, आशा कार्यकर्ताओं, जीविका दीदियों का मानदेय बढ़ा दिया है। दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने महिलाओं को 2500 प्रति महीना देने की घोषणा की है। जीविका दीदियों का वेतन 30000 रुपये करने का ऐलान किया है। इसके अलावा मां योजना के तहत भी कई योजनाओं का ऐलान किया है। दरअसल बिहार में बड़ी संख्या में पुरुषों को रोजगार के लिए पलायन की वजह से भी महिला मतदाताओं का वोटिंग पैटर्न पुरुषों से ज्यादा रहा है। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा मतदान किया था। पिछले विधानसभा चुनाव में पुरुषों ने 54.55 प्रतिशत मतदान किया था तो महिलाओं ने 56.69 प्रतिशत मतदान किया था। मतलब पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने करीब 2 प्रतिशत ज्यादा वोट डाले थे। जीविका समूह, आंगनवाड़ी, सेविका सहायिकाओं और आशा कार्यकर्ताओं की मदद से चुनाव आयोग ने भी महिलाओं को मतदान के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया है। कई सीटों पर महिलाएं मजबूती से टक्कर देने के लिए तैयार हैं। ऐसे में इस बार महागठबंधन की तुलना में एनडीए ने महिलाओं पर ज्यादा भरोसा जताया है। जानकारी के मुताबिक एनडीए के पांच घटक दलों ने मिलकर 34 महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा जबकि महागठबंधन के सात घटक दलों ने मिलकर सिर्फ 31 महिलाओं को ही टिकट दिया। एनडीए की बात करें तो भाजपा और जेडीयू 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। इसके साथ दोनों ही दलों ने 13-13 महिलाओं को टिकट दिया है। अन्य घटक दलों की बात करें तो चिराग पासवान के लोजपा (र) जिनके खाते में 29 सीटें गई हैं ने पांच महिलाओं को टिकट दिया है। जीतन राम मांझी ने 2 सीटों पर और उपेन्द्र कुशवाहा ने एक महिला को टिकट दिया है। ये महिला उम्मीदवार उपेन्द्र कुशवाहा की पत्नी हैं। इसी तरह महागठबंधन की बात करें तो वह 254 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और आरजेडी ने 24 महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा है। हालांकि मोहनियां सीट से प्रत्याशी श्वेता सुमन का नामांकन रद्द कर दिया गया जिसके बाद यह नंबर 23 हो गया है। कांग्रेस 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और उसने 5 महिलाओं को टिकट दिया है। इसके अलावा सीपीआईएम दल जो 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, सिर्फ एक महिला को टिकट दिया है। वीआईपी और आईआईपी ने भी एक-एक महिला पर भरोसा जताया जबकि भाकपा और माकपा ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। बिहार में सत्ता दिलाने के लिए महिलाओं का वोट अहम और पुरुषों से ज्यादा रहा है मतदान प्रतिशत। बिहार में जबसे नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने हैं। उन्हें सूबे की सत्ता व सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाने में महिलाओं ने हमेशा अहम भूमिका निभाई है। इस बार भी महिला वोट अगली बिहार सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएगी। 
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 28 October 2025

कौन बनेगा एनडीए का मुख्यमंत्री?


बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं एनडीए यानि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को लेकर सस्पेंस गहराता जा रहा है। महागठबंधन ने जहां तेजस्वी यादव को सीएम फेस घोषित कर चुनावी मैदान में स्पष्ट संदेश दे दिया कि चुनाव के बाद तेजस्वी ही मुख्यमंत्री बनेंगे। वहीं एनडीए की तरफ से अब तक कोई चेहरा घोषित नहीं किया गया। जब हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के चाणक्य अमित शाह से यह सीधा सवाल पूछा गया कि आपके गठबंधन का सीएम फेस कौन होगा तो उन्होंने साफ कहा कि विधानसभा चुनाव के बाद विधायक दल का नेता बिहार का मुख्यमंत्री तय करेगा। यानि कि उन्होंने साफ इशारा किया कि अभी मुख्यमंत्री कौन होगा यह तय नहीं किया गया। वहीं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेता और महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने पावार को दावा किया कि अगर बिहार में एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बनी तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाएगा। राजग नेता ने दावा किया अमित शाह पहले ही साफ कर चुके हैं कि चुनाव के बाद विधायक तय करेंगे कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा। अगर राजग को सत्ता मिली तो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाएगा। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि नीतीश कुमार को भाजपा ने हाईजैक कर लिया है और गुजरात के दो लोग संकेत रूप से मोदी और अमित शाह बिहार चला रहे हैं। सवाल उठता है कि नीतीश कुमार की आज क्या स्थिति है? क्या वह मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर हो चुके हैं? या फिर अंदरखाते नीतीश कोई बड़ा खेला करने जा रहे हैं? पिछले 20 साल से बिहार की राजनीति दो बिहारी नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लालू यादव और नीतीश कुमार। पिछले 2 दशकों से तो नीतीश ही बिहार में सबसे सियासी नेता रहे हैं। अब सवाल यही है कि क्या चुनाव के बाद भाजपा नीतीश कुमार को किनारे कर अपना मुख्यमंत्री बनवाएगी? या फिर उन्हें एक बार जनता का चेहरा बनाकर सत्ता में बिठाएगी? राजनीतिक समीकरणों और आंकड़ों की नजर से देखें तो भाजपा के लिए नीतीश को दरकिनार करना आसान नहीं है। आईए समझते हैं क्यों? 71 सीटों का गणित तय करेगा फैसला इस बार। जेडीयू 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इनमें से 71 सीटें ऐसी हैं, जहां नीतीश कुमार की जेडीयू का मुकाबला सीधा तेजस्वी की आरजेडी और लेफ्ट दलों से है। यानि 70 प्रतिशत से ज्यादा सीटों पर नीतीश और तेजस्वी आमने-सामने हैं। ये बड़ी रणनीति है जो बिहार की राजनीति में सालों से देखी जाती है। नीतीश और लालू/तेजस्वी एक-दूसरे के खिलाफ ज्यादा सीटों पर लड़ें ताकि भाजपा पर निर्भरता कम हो। बिहार में आमतौर पर यह कहना है कि दोनों लालू और नीतीश एक बात पर एकमत हैं कि बिहार में किसी भी हालत में भाजपा को घुसने नहीं देना क्योंकि एक बार भाजपा घुस गई तो अगले 20 सालों तक कोई और पार्टी सत्ता में नहीं आ सकती। नीतीश को भी अब समझ आ गया है कि राजग अगर सत्ता में आया तो उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाने वाली है। नीतीश पुराने मंझे हुए सियासी खिलाड़ी हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा के भीतर अपना मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा भले पुरानी हो, लेकिन इस बार वह समीकरण उतना आसान नहीं है। क्योंकि जेडीयू भले कम सीटों पर लड़े, लेकिन उसकी जीतने वाली सीटें आरजेडी के खिलाफ होंगी, जिससे भाजपा के दबाव की गुजाइंश कम रह जाएगी। बिहार में राजनीतिक इतिहास गवाह है कि नीतीश कभी भी पाला बदलने में झिझकते नहीं हैं। 14 नवम्बर को नतीजे जो भी हों, लेकिन संकेत साफ है कि भाजपा की रणनीतियां जितनी आाढामक क्यों न हो, नीतीश कुमार अभी भी एनडीए की राजनीति के पावर बैलेंसर बने हुए हैं। जेडीयू के पास इतनी सीटें भले न हों कि वह सरकार अकेले बना सकें, लेकिन इतना जरूर है कि बिना उसके भाजपा का मुख्यमंत्री बनना लगभग नामुमकिन है। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 25 October 2025

बिहार चुनाव ः दूसरा राउंड तेजस्वी के नाम


जैसे-जैसे बिहार चुनाव में मतदान की तिथि करीब आती जा रही है चुनाव में वैसे-वैसे तेजी आ रही है। जैसे मैंने कुछ दिन पहले लिखा था कि मतदान आते-आते तक बिहार चुनाव में हमें कई राउंड का दंगल नजर आएगा। यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। इसके परिणाम के दूरगामी नतीजे होंगे। न केवल इनका असर राज्यों के विधानसभा चुनाव जो निकट भविष्य में होने वाले हैं उन पर पड़ेगा बल्कि कहें की सत्ता पर भी सीधा असर पड़ सकता है। बिहार चुनाव में पहला राउंड प्रशांत किशोर ने जीता जब उन्होंने सबसे पहले अपनी पार्टी जन सुराज पार्टी के उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की थी। अब दूसरा राउंड इंडिया यानि महागठबंधन के नाम गया है। क्योंकि उन्होंने अपना मुख्यमंत्री चेहरा सार्वजनिक कर दिया है। कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश किया है। साथ ही महागठबंधन ने घोषणा की है कि बिहार में उनकी सरकार बनने पर एक से ज्यादा उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। इनमें से एक डिप्टी सीएम विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी होंगे। अशोक गहलोत ने कहाö तेजस्वी एक नौजवान हैं, इनका लंबा भविष्य है, जिनका लंबा भविष्य होता है जनता उसका साथ देती है। ये नौजवान हैं और कमिटमेंट रखते हैं। पिछली बार इन्होंने जो नौकरी के स्लोगन दिए थे, जो वादे किए थे उसमें खरे उतरे। इस प्रेस कांफ्रेंस में तेजस्वी यादव, मनोज झा, कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, पवन खेड़ा, मुकेश सहनी व तमाम वाम दल के नेता मौजूद थे। इन सब नेताओं का एक साथ मंच पर होना यह संकेत देने का प्रयास था कि महागठबंधन में सब एक हैं, सब ठीक है। पिछले कुछ समय से यह संकेत मिल रहे थे कि महागठबंधन में जबरदस्त खींचतान व सीटों को लेकर टकराव है। खींचतान तो कुछ कम हुई पर सीट बंटवारे में अभी भी रार है। ऐसा माहौल बना दिया गया था जैसे महागठबंधन में आपस में फूट डालने और माहौल खराब करने के मकसद से प्रायोजित कैंपेन चलाया गया। ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे आपस में फूट पड़ गई है। अशोक गहलोत ने हालांकि यह माना कि 243 सीटों में 5-7 सीटों पर स्थानीय नेताओं और समीकरणों के कारण कई बार फ्रैंडली फाइट जैसी स्थिति बन जाती है। यह बहुत छोटी संख्या है परन्तु इसे लेकर मीडिया में महागठबंधन के खिलाफ कैंपेन चला दिया गया। बता दें कि बिहार में दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इसके लिए 6 और 11 नवम्बर को वोट डाले जाएंगे और 14 नवम्बर को नतीजों का ऐलान होगा। ऐसा माना जा रहा है कि महागठबंधन में अभी भी कुछ सीटों पर टकराव मौजूद है। 12 सीटों पर महागठबंधन के घटक दल आमने-सामने हैं। इनमें से 6 सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस और आरजेडी के उम्मीदवार आमने-सामने हैं, यही नहीं झारखंड में कांग्रेस, आरजेडी और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की गठबंधन सरकार चल रही है लेकिन मांगे पूरी नहीं होने पर जेएमएम ने बिहार चुनाव से खुद को बाहर कर लिया है। अभी तो चुनाव प्रचार जोर पकड़ने वाला है। अभी तो 14 नवम्बर तक कई और राउंड होने वाले हैं। अभी तो राउंड टू ही हुआ है। जैसे-जैसे प्रचार बढ़ेगा आपको मैं स्थिति से अवगत कराता रहूंगा। 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 23 October 2025

नो किंग्स प्रोटेस्ट: सड़कों पर 70 लाख अमेरिकी

 
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ रविवार को अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ। ऐसा लगा मानो पूरा अमेरिका सड़कों पर उतर गया हो। करीब 70 लाख से अधिक लोगों ने अमेरिका में 2600 जगहों पर नो किंग्स नाम से निकाली गई रैलियों में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि ट्रंप की नीतियां अमेरिका को तानाशाही की ओर ले जा रही हैं। शिकागो शहर में 1 लाख, वाशिंगटन डीसी में 2 लाख, लॉस एंजिलिस सिटी में 50 हजार और सैन डिएगो शहर में 25 हजार प्रदर्शनकारी शामिल हुए। टाइम्स स्क्वायर, बोस्टन कॉमन और अटलांटा सिविक सेंटर जैसे इलाकों में भारी भीड़ उमड़ी। सिएटल में लोगों ने स्पेन नीडल के पास डेढ़ किलोमीटर लंबी परेड निकाली। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने लोकतंत्र, न्याय और नागरिक स्वतंत्रता पर हमला किया है। ओरेगन के एक शिक्षक ने कहा कि हम शांति से यह बताना चाहते हैं कि अमेरिका किसी राजा का देश नहीं है। उनका कहना है कि फेडरल सैनिकों की तैनाती रोकी जाए, इमिग्रेशन छापे बढ़े हों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार की रक्षा हो। प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की। उन्होंने विरोध करने से ज्यादा देशभक्ति कुछ नहीं है या फांसीवाद का विरोध करें जैसे नारे लगाए। प्रदर्शनकारी ट्रंप की आप्रवासन शिक्षा और सुरक्षा नीति का भी विरोध कर रहे थे। अमेरिका समेत दुनिया भर में 2700 से ज्यादा नो किंग्स प्रदर्शन हुए हैं। लंदन स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर भी सैंकड़ों लोग जमा हुए। आयोजकों का कहना है कि वे प्रदर्शन ट्रंप की तानाशाही प्रवृतियों के खिलाफ एक प्रतिरोध है, इसे अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा प्रदर्शन बताया जा रहा है। मैड्रिड और वर्सिलोना में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए। ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर वापसी के बाद से यह तीसरा जन आंदोलन है। इस आंदोलन से संघीय कार्पामों और सेवाओं पर असर पड़ा है। वाशिंगटन में प्रदर्शन में शामिल शान हावर्ड ने कहा कि उन्होंने पहले कभी भी विरोध प्रदर्शन में भाग नहीं लिया था, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने जिस प्रकार से कानून की अवहेलना की है उससे वह बहुत आहत हैं। नो किंग्स थीम का मकसद उन विरोध प्रदर्शनों की याद दिलाना है जिनके कारण अमेरिका का जन्म हुआ, राजशाही और निरंकुशता को छोड़ा गया। गणतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया गया। ये विरोध प्रदर्शन ऐसे समय में हुए जब सीनेट में डेपोट्स और रिपब्लिकन के बीच गतिरोध के कारण सरकार का अधिकांश शट डाउन यानि बंद है, डेपोट्स मेडिकल बीमा और स्वास्थ्य संबंधी कार्पामों में कटौती को फिर से लागू करने की मांग कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा डेपोटिक शासित राज्यों में संघीय बल भेजने और अवैध प्रवासियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करने से इंकार किया कि उनकी कोई शाही महत्वकांक्षा है या वे किसी राजा की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने फॉक्स बिजनेस टीवी इंटरव्यू में कहा ये मुझे राजा कह रहे हैं। मैं राजा नहीं हूं। ट्रंप ने एआई वीडियो शेयर करते हुए इस पर प्रतिािढया दी। वीडियो में उनके सिर पर ताज दिखाई दे रहा है। वे एक लड़ाकू विमान में मास्क लगाकर बैठे हैं और जिस पर किंग ट्रंप लिखा है। प्रदर्शनकारियों पर बम बरसाते हुए दिख रहे हैं। 
-अनिल नरेन्द्र

Saturday, 18 October 2025

गठबंधनों में मचा घमासान


बिहार विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख गठबंधनों में मचा घमासान रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। प्रथम चरण के नामांकन भरने की आखिरी तारीख (17 अक्टूबर) करीब आ जाने के बावजूद भी दोनों गठबंधनों में संग्राम जारी है। गठबंधन की राजनीति में सहयोगी दलें के बीच रूठना-मनाना आम बात है। खासकर जब चुनाव सिर पर हो तो दबाव की राजनीति अपनी चर्म पर होती है। दोनों ही गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन में असंतोष चर्म सीमा पर है। पहले बात करते हैं महागठबंधन की। यह किसी से छिपा नहीं कि कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में मतभेद हैं। तभी तो नामांकन की अंतिम तिथि में जाकर सीट बंटवारे की घोषणा फाइनल हो सकी। दरअसल कांग्रेस यह साबित करना चाहती है कि गठबंधन में सीनियर पार्टनर है क्योंकि वह देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है जबकि राजद एक क्षेत्रीय दल है और उसे उसी हिसाब से सीटें का बंटवारा करना चाहिए। दूसरी ओर तेजस्वी यादव का मानना है कि उनकी पार्टी बिहार में कांग्रेस से कहीं बड़ा जनाधार रखती है इसलिए उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उम्मीद है कि दोनों के बीच सही मायनों में मतभेद मिट गए हैं और दोनों अपने इस इरादे पर पक्के हैं कि एनडीए को इस बार हराना है। वहीं अगर एनडीए की बात करें तो यहां कई मसले हैं। नीतीश कुमार चाहते हैं कि वह बड़े भाई की भूमिका में चुनाव में जाएं, इसलिए उन्हें भाजपा से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए थीं। वह यह भी चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर एनडीए चुनाव में जाए। जबकि भाजपा का कहना है कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा यह चुनाव के बाद चुने विधायक करेंगे। एक पेंच तो यह फंसा हुआ है। दूसरा पेच चिराग पासवान को लेकर फंसा हुआ है। नीतीश चिराग को एक आंख नहीं भाते। वह चाहते थे कि चिराग को 15 सीटें मिलें, जबकि भाजपा हाईकमान ने उन्हें 29 सीटें दे दीं। इन 29 सीटों में ऐसी भी कई सीटें शामिल हैं जहां जदयू का सिटिंग विधायक है। नतीजा यह हुआ कि जदयू ने चिराग की 7 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। बता दें कि चिराग ने पिछले विधानसभा चुनाव में जदयू को करारा झटका दिया था। तब उन्होंने जदयू कोटे की ज्यादातर सीटों पर प्रत्याशी उतार तीन दर्जन सीटों का नुकसान पहुंचाया था। इस कारण जदयू राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बन कर रह गई थी। कहा जा रहा है कि इस बार चिराग के कोटे की सीटों पर उम्मीदवार उतार नीतीश पुराना हिसाब चुकता कर रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी को 6-6 सीटें दी गई हैं। दोनों ही नाराज चल रहे हैं। भाजपा आलाकमान के दबाव में अब वह कह तो रह हैं कि सब ठीक है पर अंदर खाते आग सुलग रही है और चुनाव में एनडीए एक बंटा हुआ गठबंधन नजर आ सकता है। एक बात फिर से यह तो साबित हो गई कि आज भी बिहार में नीतीश कुमार एक महत्वपूर्ण फैक्टर हैं और उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। यह सही है कि पिछले कुछ समय से नीतीश की सेहत पर सवाल उठते रहे हैं और वह ज्यादा सक्रिय भी नहीं दिखे। पर पिछले तीन-चार दिनों में नीतीश अपने पुराने रंग में दिखाई दिए। जिस तरीके से उन्होंने अपनी पार्टी को संभालने के लिए सख्त कदम उठाए हैं उससे साफ है कि वह यह मानते हैं कि भाजपा उन्हें अगला मुख्यमंत्री नहीं बनाने वाली हैं। उन्हें यह भी समझ आ गया है कि उनके तीनों वरिष्ठ साथी अंदर खाते भाजपा समर्थक हैं और उनके इरादे पर पार्टी को अंदर से तोड़ना चाहते हैं। इसी वजह से नीतीश ने अब कई शर्तें भाजपा के सामने रखी हैं। देखना होगा कि उन्हें भाजपा मानती है या नहीं? उधर भाजपा तहे दिल से चाहती है कि पहला कि वह बिहार विधानसभा चुनाव हर हाल में जीते और बिहार का अगला मुख्यमंत्री भाजपा का हो। अब असल खेला शुरू होने वाला है। देखते हैं, आने वाले दिनों में क्या-क्या होता है? 
-अनिल नरेन्द्र

Thursday, 16 October 2025

मामला आईपीएस पूरन की आत्महत्या का


चंडीगढ़ में सीनियर आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार की आत्महत्या का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। 7 अक्टूबर को 2001 बैच के आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार ने अपने चंडीगढ़ स्थित आवास पर खुद को गोली मार ली थी। इस खुदकुशी से पूरे राज्य में पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। एक आईपीएस अधिकारी की मौत के बाद कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। पुलिस को उनके पास से एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ जिसमें उन्होंने हरियाणा पुलिस के डीजीपी समेत कई अधिकारियों को अपनी मौत का जिम्मेदार बताया। आईपीएस पूरन कुमार की पत्नी आईएएस अमनीत कुमार हैं। जब पति ने खुदकुशी की उस वक्त अमनीत देश से बाहर गई हुई थीं। उन्होंने लौटकर पूरे मामले की जानकारी हासिल की। अब अमनीत कुमार और पूरा परिवार आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है। परिवार ने आरोप लगाएं है कि पुलिस ने एफआईआर भी ठीक से नहीं लिखी और आरोपियों के नाम निश्चित जगह पर नहीं दिए गए है। परिवार लगातार न्याय की मांग कर रहा है। वाई पूरन कुमार की आत्महत्या के मामले में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) शत्रुजीत कपूर के पद से हटाने के लिए 31 सदस्यीय समिति ने राज्य सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेअल दिया है। वाई पूरन कुमार की मौत के बाद पूरे प्रदेश में दलितों में भारी आक्रोश है। ऐसे में इस पर महापंचायत का आयोजन किया गया था जिसमें इस बात पर सहमति बनी कि राज्य सरकार डीजीपी के खिलाफ सख्त एक्शन ले और उन्हें पद से हटाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पूरे हरियाणा में चंडीगढ़ में करीब 5000 सफाई कर्मचारी काम छोड़ देंगे। वहीं इस मामले में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने शनिवार को कहा था कि आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी और उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने पीड़ित परिवार को भी आश्वासन दिया कि सरकार उनके साथ है। इस दौरान उन्होंने इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करने की बात भी कही। पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है जो मामले की जांच में जुट गई है। वहीं कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने वाई पूरन कुमार की पत्नी को शोक संदेश भेजकर दुख जताया है। उन्होंने कहा कि आज भी हुक्मरानों का पूर्वाग्रह से ग्रस्त पक्षपातपूर्ण रवैया बड़े से बड़े अधिकारी को भी सामाजिक न्याय की कसौटी से वंचित रखता है। 10 अक्टूबर को पूरन की पत्नी को भेजे गए पत्र में लिखा आपके पति कुमार के देहांत की खबर स्तब्ध करने वाली भी है और मन को व्यथित करने वाली भी। आपार मुश्किल की इस घड़ी में मेरी ओर से आपके अलावा पूरे परिवार के प्रति गहरी संवेदनाएं। इस कठिन परिस्थिति में ईश्वर आपको धैर्य, साहस और संबल प्रदान करें। हरियाणा सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शनिवार को रोहतक के एसपी नरेन्द्र बिजारणिया को पद से हटा दिया है। सजा के तौर पर उन्हें अभी कहीं पोस्टिंग नहीं दी गई। उधर शनिवार को 5वें दिन भी वाई पूरन कुमार के शव का पोस्टमार्टम नहीं हो सका। चंडीगढ़ के गृहसचिव मनदीप बराड़ ने शनिवार को सुबह पूरन कुमार की पत्नी अमनीत कुमार के साथ मुलाकात की। इसके कुछ समय बाद चंडीगढ़ प्रशासन ने वाई पूरन कुमार के राव को सेक्टर-16 अस्पताल में रखवा दिया। खबर आई है कि पत्नी अमनीत कुमार ने हल्की धाराएं लगाने पर आपत्ति जताई थी और सख्त धाराएं नहीं लगाने तक पोस्टमार्टम व अंतिम संस्कार नहीं करने पर अड़ी थी। हरियाणा पुलिस ने रविवार को डीजीपी शत्रुजीत कपूर और तत्कालीन रोहतक एसपी नरेन्द्र बिजारणिया समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर में एससी-एसटी एक्ट की नई धाराएं जोड़ी हैं, जिसके तहत उम्र कैद की सजा के साथ जुर्माने का भी प्रावधान है। हम वाई पूरन कुमार को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं और उम्मीद करते है कि उनके परिवार के साथ न्याय हो और इस पक्षपाती रवैया की कड़ी निंदा करते हैं।
-अनिल नरेन्द्र

Tuesday, 14 October 2025

बिहार चुनाव ः पहला राउंड पीके के नाम


बिहार में होने वाले पहले चरण के विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन की प्रािढया शुरू हो गई है। इस चरण में 121 सीटों के लिए मतदान होना है। पावार को आयोग ने पहले चरण की अधिसूचना जारी की। इस चरण के लिए उम्मीदवार 17 अक्टूबर तक अपना नामांकन कर सकते हैं और इन सीटों के लिए आगामी 6 नवम्बर को मतदान होगा। इस लेख लिखने तक न तो एनडीए की सीट शेयरिंग फाइनल हुई है और न ही महागठबंधन की। एक उम्मीद की जा रही है कि इसकी घोषणा किसी भी वक्त हो सकती है। जहां एनडीए यानि सत्तारुढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में सीटों को लेकर घमासान मचा हुआ है और पिछले कई दिनों से दिल्ली और पटना में बैठकों का दौर चल रहा है। वहीं महागठबंधन में भी पूरी तरह सहमति नहीं बनी है। अभी भी कुछ सीटों पर मतभेद है। वहीं अगर किसी ने इस प्रािढया में नंबर मारा है तो वह हैं प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी ने। प्रशांत किशोर की जन सुराज ने पावार को बिहार विधानसभा चुनाव के लिए 51 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी। 51 उम्मीदवारों में 17 अति पिछड़े वर्ग से, 11 पिछड़े वर्ग से, 7 दलित, 7 मुस्लिम,नौ सामान्य वर्ग से हैं। इन 51 उम्मीदवारों में 6 महिलाएं हैं और गोपालगंज को भोरे सीट से एक ट्रांसजेंडर प्रीति किन्नर को टिकट मिला है। बिहार जाति सर्वे 2022 के अनुसार राज्य में अति पिछड़ी जातियां 36.01 फीसदी है और आबादी के लिहाज से यह सबसे बड़ा हिस्सा है। वहीं पिछड़ी जातियां 27.12 फीसदी है। पीके की उम्मीदवारों की सूची में कई पढ़े-लिखे प्रतिष्ठित लोग शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर होम गार्ड के पूर्व महानिदेशक, हाईकोर्ट के वकील, यूनिवर्सिटी केन्द्र यूके वाइस चांसलर, भोजपुरी फिल्मों के गायक, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की पोती जागृति ठाकुर को समस्तीपुर की मोरवा सीट से टिकट दिया गया है। इसके अलावा आरसीपी सिंह की बेटी लता सिंह को नालंदा की आस्थावां सीट से उतारा गया है। लगभग सभी उम्मीदवार पहली बार चुनावी मैदान में हैं। इसके अलावा जन सुराज से तीन डाक्टरों को भी उम्मीदवार बनाया गया है। उधर बिहार के दो अहम गठबंधन एनडीए और आरजेडी वाले महागठबंधन में सीटों के बंटवारे पर अभी तक कोई सहमति नहीं बन पाई है। कहा जा रहा है कि एनडीए के दो सहयोगी चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को जितनी सीटें दी जा रही है उससे वह नाखुश हैं। दूसरी तरफ महागठबंधन में भी कांग्रेस मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), झारखंड मुक्ति मोर्चा और पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोकजन शक्ति पार्टी अपनी सीटों को लेकर आरजेडी से सहमत नहीं हो पाए हैं। बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं। मुकेश साहनी 60 सीटें मांग रहे हैं और उपमुख्यमंत्री का पद भी। साहनी मल्लाह जाति से ताल्लुक रखते हैं और बिहार में इस जाति की आबादी 9.6 प्रतिशत है। प्रशांत किशोर ने अपनी पहली लिस्ट पर कहा, एक भी बाहुबली, धनबली, महाबली कोई नहीं मिलेगा। इसमें सिर्फ वो लोग मिलेंगे, जो बिहार को सुधारने का जज्बा लेकर इस प्रयास से जुड़े हैं। हमारे ज्यादातर उम्मीदवार पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। वो लोग जुड़े हैं, जो राजनीति नहीं जानते, लेकिन वे राजनीति के जरिए समाजसेवा करना चाहते हैं। 
-अनिल नरेन्द्र