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Wednesday, 15 June 2011

पेनेटा बैरंग लौटे ः अमेरिका- पाक में तनाव जारी


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th June 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका और पाकिस्तान संबंधों में आया तनाव जारी है। अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख लियोन पेनेटा जिस मकसद को लेकर पाकिस्तान पहुंचे थे, लगता है उसमें उन्हें खास सफलता नहीं मिली। आईएसआई के साथ तल्ख रिश्तों में सुधार पर बिना किसी सहमति के पेनेटा स्वदेश रवाना हो गए। पेनेटा शुक्रवार की शाम इस्लामाबाद पहुंचे थे। स्थानीय मीडिया के मुताबिक पेनेटा ने पाक सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी और आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शुजा पाशा से मुलाकात की हालांकि वह प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति से नहीं मिले। पेनेटा शनिवार को ही वापस स्वदेश लौट गए। अमेरिकी टीवी एबीसी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार पेनेटा ने सेना प्रमुख और आईएसआई प्रमुख को कबायली इलाकों में आतंकवादियों के बम बनाने के दो कारखानों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। पेनेटा ने पाशा से उपग्रह से मिली और कुछ मुख्य खुफिया जानकारी भी साझी की जिससे यह साबित होता है कि पाकिस्तानी सुरक्षाबलों द्वारा पाक में इस्लामी उग्रवादियों को मदद के सबूत हैं। टाइम पत्रिका ने भी अपनी वेबसाइट पर एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा कि सीआईए ने पाकिस्तानी जनरलों को 10 मिनट का एक सम्पादित वीडियो को भी दिखाया जिसमें आतंकवादियों को वजीरिस्तान में बम बनाने के दो कारखानों को खाली कराते दिखाया गया है।
खबरों के अनुसार पाकिस्तानी सैन्य तंत्र और आईएसआई ने पेनेटा की बात को एक तरह से नकार दिया और उस पर कोई तवज्जों नहीं दी। उलटा पाकिस्तानी आला अफसरों ने पेनेटा से कहा कि उसे अपनी जमीन पर अमेरिकी सैनिक बर्दाश्त नहीं है। पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी ने बताया कि पेनेटा ने इस बात पर चिन्ता जाहिर की कि पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी सेनाओं की टुकड़ियों की तादाद को घटाने का फैसला पाकिस्तान सरकार ने किया है। अगले महीने अमेरिका के रक्षा मंत्री बनने वाले पेनेटा का कार्यक्रम गुप्त रखा गया तथा उनके आगमन की जानकारी लोगों को नहीं दी गई। उल्लेखनीय है कि पेनेटा की यह यात्रा गत दो मई को एबटाबाद के इलाके में अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद हुई है। पाकिस्तान ने इस घटना को अपनी सप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए इस पर सख्त एतराज किया था।
कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने कहा था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और आईएसआई के बीच सहयोग खत्म हो गया है। उन्होंने टाइम पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा, `अगर अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ विश्वास बहाली के लिए उचित कदम नहीं उठाए तो अमेरिका के साथ मेरी सरकार को मुश्किल में डाल सकता है।' उन्होंने कहा कि सीआईए और आईएसआई के बीच सहयोग खत्म होने के कारण अमेरिका और पाकिस्तान के बीच आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और अफगानिस्तान से अंतर्राष्ट्रीय सेना के निकलने की रणनीति पर मतभेद हैं। उन्होंने अमेरिका द्वारा बार-बार ड्रोन हमलों से नाराजगी जताते हुए कहा कि उनकी सरकार जनता के प्रति जवाबदेही है और ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तान में अमेरिकी विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं। उन्होंने अमेरिका से कहा, `मैं सैन्य शासक नहीं हूं, मैं एक आवामी शख्सियत हूं। अगर लोगों की राय आपके खिलाफ हो तो मैं आपके साथ खड़ा नहीं हो सकता बल्कि मुझे जनता की राय के साथ चलना है।' टाइम पत्रिका के अनुसार लादेन की मौत के बाद अमेरिका में एक तरफ यह मांग की जा रही है कि सहयोग के लिए पाकिस्तान पर दबाव डाला जाए वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के भीतर अमेरिकी विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं। एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के खिलाफ हुई अमेरिकी कार्रवाई का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री गिलानी ने कहा जाहिर है हमें आश्चर्य हुआ कि अमेरिका ने एकतरफा कार्रवाई क्यों की जबकि हम आतंकवाद के खिलाफ मिलकर कार्रवाई कर रहे हैं। ओसामा की मौत के बाद से अमेरिका में भी पाक विरोधी भावनाओं में वृद्धि हुई है। कई अमेरिकी सांसदों ने पाक को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर अंकुश लगाने की मांग की है। लियोन पेनेटा ने अगर विश्वास बहाली के लिए पाक दौरा किया था तो उन्हें इसमें खास सफलता नहीं मिली दिखती। बाकी अन्दरखाते दोनों खुफिया एजेंसियों में क्या बात हुई है, पता नहीं चल सकता। इतना जरूर कहा जा सकता है कि अमेरिका और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में इस समय तनाव नजर आ रहा है।

लाल आतंक में अचानक वृद्धि


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 15th June 2011
अनिल नरेन्द्र
जिस तरीके से छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में माओवादियों ने एक बार फिर आतंक मचा रखा है उससे पता चलता है कि केंद्र की माओवादियों के प्रति ढुलमुल नीति का कितना नुकसान हो रहा है। पिछले 25 दिनों में माओवादियों ने विभिन्न वारदातों में 34 निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया है। इनके निशाने पर हैं अर्द्धसैनिक बल और पुलिस बल। छत्तीसगढ़ में फोर्स पर हमले तेज करते हुए इन माओवादियों ने बस्तर में लगातार दूसरे दिन भी जमकर खूनखराबा किया। दंतेवाड़ा से देर रात गश्त से लौट रही पुलिस पार्टी को निशाना बनाते हुए उनकी एंटी लैंड माइन गाड़ी को बारुदी सुरंग विस्फोट से उड़ा दिया। हमले में 15 जवान शहीद हो गए। इनमें सात एमपीओ एवं तीन कांस्टेबल थे। तीन जवानों की हालत गम्भीर है। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि एंटी लैंड माइन व्हीकल के परखचे उड़ गए। 24 घंटे के भीतर सुरक्षाबलों पर यह दूसरा हमला था। इससे पहले गुरुवार को तड़के नारायणपुर जिले में माओवादियों ने बेस कैम्प के पास हमला किया जिसमें पांच जवान शहीद हुए थे। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर कटे कल्याण थाने के गाटम के जंगल में नक्सलियों ने आधी रात को वारदात को अंजाम दिया। नक्सलियों द्वारा जवानों पर एक के बाद एक हमले को सेना के जवानों में खौफ पैदा करने की माओवादियों की रणनीति मानी जा रही है। दरअसल जंगल वार की ट्रेनिंग लेने सेना बस्तर पहुंच गई है। पहले चरण में लखनऊ से 500 जवानों की टुकड़ी आई है। बस्तर के नारायणपुर जिले में आर्मी का ट्रेनिंग सेंटर बनाया जा रहा है। दक्षिण बस्तर के जंगलों में छत्तीसगढ़ के अलावा उड़ीसा एवं आंध्र प्रदेश से बड़ी तादाद में नक्सली/माओवादी पहुंच चुके हैं। खुफिया तंत्र की ताजा रिपोर्ट के तहत दंतेवाड़ा के पहाड़ी ठिकानों में करीब 3000 माओवादियों का जमावड़ा हो चुका है।
बस्तर में सेना की दस्तक से बौखलाए माओवादियों ने एक बड़े मिशन को अंजाम देने की रणनीति बनाई लगती है। सेना की आमद के बाद से ही बीते एक पखवाड़े में चार बड़ी घटनाओं ने समूचे छत्तीसगढ़ में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। खुफिया विभाग की एक रिपोर्ट यह भी है कि बस्तर में सोची-समझी रणनीति के तहत माओवादी हमलों को अंजाम दे रहे हैं। इनकी अगली योजना शासन तंत्र का ध्यान जंगलों में उलझाकर शहरों में नेटवर्प और मजबूत करना है। शहरों में अपना नेटवर्प बनाने के बाद यह माओवादी कोई न कोई बड़ी वारदात करके अपनी ताकत का अहसास कराने की फिराक में हैं। यह तत्व चुपचाप अपनी गतिविधियों को बढ़ाने में लगे हैं। देश का राजनीतिक नेतृत्व दिल्ली के शोरगुल में उलझा हुआ है और यह गम्भीर समस्या जैसे उसकी प्राथमिकताओं में कहीं पिछड़ चुकी है। माओवादियों के खिलाफ दो साल पहले घोषित बहुचर्चित रणनीति का क्या हुआ, आज यह सवाल पूछने का वैध अधिकार है? तब विद्रोहग्रस्त इलाकों के विकास एवं सुरक्षाबलों की कार्रवाई की दो सूत्रीय रणनीति देश के सामने रखी गई थी। लेकिन आज ये दोनों सूत्र कहीं पहुंचते नहीं दिखते। उन इलाकों की आदिवासी आबादी की भावनाओं पर मरहम लगाने की कोई ठोस योजना कार्यरूप लेती नहीं दिखती है। जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि सरकारी स्तर पर सिर्प रस्म अदायगी न हो बल्कि उन योजनाओं व रणनीतियों को अमली रूप दिया जाए जिनकी घोषणाएं वर्षों से की जाती रही हैं।

Tuesday, 14 June 2011

एक और बहादुर कलम का सिपाही शहीद हुआ

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th June 2011
अनिल नरेन्द्र
एक और कलम का सिपाही हिंसा का शिकार हो गया। मोस्ट वांटेड आतंकवादी दाऊद इब्राहिम के छोटे भाई इकबाल कासकर के अंगरक्षक की हत्या के बाद दाऊद के विरोधी छोटा राजन से बातचीत पर आधारित एक रिपोर्ट लिखने के महीने-भर के भीतर मशहूर क्राइम रिपोर्टर जे डे की शनिवार को मुंबई के पोवई के डी मार्ट के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई। मोटरसाइकिल पर सवार होकर आए बदमाशों ने जे डे के सिर पर गोलियां मारीं और उन्होंने हीरानंदानी अस्पताल पहुंचने के बाद दम तोड़ दिया। ज्योतिर्मय डे जिन्हें प्यार से जे डे कहकर पुकारा जाता था अत्यंत लोकप्रिय क्राइम रिपोर्टर थे। इंडियन एक्सप्रेस व हिन्दुस्तान टाइम्स में काम करने के दौरान तमाम चौंकाने वाली अपराध खबरें लिखने वाले जे डे इन दिनों मिड डे के अपराध सम्पादक थे। मिड डे में उनकी एक सहयोगी ने बताया कि गुरुवार को ही जे डे ने दफ्तर की एक बैठक में हिस्सा लिया था और तब तक वह पूरी तरह सामान्य दिख रहे थे। अंडरवर्ल्ड से उन्हें धमकियां आम बात हो चुकी थीं। डे को ये लगता रहा था कि तमाम डॉन से सीधा परिचय होने के चलते शायद ही उनका कोई गुर्गा उन पर कभी कातिलाना हमला करने की कोशिश करेगा। अंडरवर्ल्ड में भी जे डे की हत्या की खबर से हलचल मची है। कोई यह मानने को तैयार नहीं कि यह काम किसी भाई का हो सकता है। अपनी खबरियों पर भरोसा करने वाले जे डे ने पिछले सात मार्च में अंडरवर्ल्ड की मुंबई में वापसी पर एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी थी। इसी रिपोर्ट के बाद से डे को धमकियां मिलनी शुरू हुई थीं। लेकिन इसे अपने पेशे का हिस्सा मानकर डे ने कभी इस तरफ तवज्जों नहीं दी। इन्हीं खबरियों पर पिछले साल लिखी पुस्तक जोटो डायल की रिलीज के दौरान जे डे ने बताया था कि मुंबई में अंडरवर्ल्ड अब पहले से ज्यादा खतरनाक हो गया है, क्योंकि इसकी घुसपैठ सियासत की सबसे ऊंची पायदानों तक हो चुकी है। उन्होंने बताया था कि अब डॉन के सीधे कनेक्शन राजनेताओं से स्थापित हो चुके हैं जो उन्हें पूरा संरक्षण देते हैं। ज्योतिर्मय डे की हत्या के एक दिन बाद रविवार को पुलिस ने कहा कि यह काम तेल माफिया के लोगों का भी हो सकता है। एक सीनियर पुलिस अफसर के मुताबिक ज्योतिर्मय डे ने तेल माफिया के खिलाफ काफी कुछ लिखा था, हो सकता है कि उसी ने निशाना बनाया हो। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने रविवार को इमरजेंसी मीटिंग बुलाई और जांच का जायजा लिया।
ज्योतिर्मय की हत्या से फिर से यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या मुंबई में फिर 90 के दशक की तरह गैंग वॉर का दौर लौट आया है? दाऊद के भाई पर हमला, अब जे डे की हत्या तो इस ओर संकेत दे रहा है। पुलिस का कहना है कि मुंबई अंडरवर्ल्ड सीन बहुत तेजी से बदल रहा है। नए-नए खिलाड़ी गेम में आ रहे हैं। गैंग वॉर भी शुरू हो गया है। ज्योतिर्मय की हत्या ने एक बार फिर सारी दुनिया को याद करवा दिया है कि पत्रकार बिरादरी कितना जोखिम लेकर अपना काम करती है। अभी हाल ही में एक पाकिस्तानी पत्रकार की भी हत्या की गई थी। हमें जे डे की हत्या का बहुत दुःख है और उसके परिवार को हम यह जरूर बताना चाहेंगे कि इस संकट की बेला में वह अकेला नहीं हम भी उनके दर्द में साथ हैं। जे डे जैसे बहादुर, साहसी पत्रकार कभी मरते नहीं। उनकी लेखनी हमेशा जिन्दा रहती है।

राणा का बरी होना भारत के लिए झटका

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 14th June 2011
अनिल नरेन्द्र
अमेरिका में शिकागो की अदालत ने पाकिस्तानी मूल के कनाडाई नागरिक तहव्वुर हुसैन राणा को मुंबई हमलों में सहयोग करने के आरोप से बरी कर दिया है। इस फैसले से भारत को धक्का लगना स्वाभाविक ही है। हो सकता है कि राणा के 26/11 में सीधे शामिल होने की बात अदालत में साबित होने से भारत का पक्ष ज्यादा मजबूत होता, लेकिन लगता नहीं है कि राणा के खिलाफ जो सबूत थे, वे इतने पुख्ता नहीं थे कि ज्यूरी के सदस्यों को प्रभावित कर सकें। भारत का स्पष्ट मानना है कि 26/11 सीधा-सीधा आईएसआई ऑपरेशन था और राणा को इस हमले की पूरी जानकारी थी। उसने इस मामले में डेविड कोलमैन हेडली से बातचीत भी की थी। हेडली ने जो ताज महल होटल व छत्रपति शिवाजी स्टेडियम की वीडियो खींची थी उस पर राणा से डिस्कस हुई थी। पाकिस्तान से आतंकवादी मुंबई में कहां उतरेंगे और शहर में घुसेंगे यहां तक सलाह-मशविरा हुआ था। हेडली ने न केवल राणा को
26/11 हमलों के बारे में बताया बल्कि उसे यह भी कहा कि वह नवम्बर 2008 में मुंबई किसी हालत में न जाए। भारत के लिए इस मुकदमे का विशेष महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इसमें आईएसआई की भूमिका साफ हो रही थी और लश्कर-ए-तोयबा का खतरा उभर कर आया। अब यह माना जा रहा है कि अलकायदा उतार पर है और लश्कर-ए-तोयबा इस वक्त दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी संगठन है। चूंकि 9/11 का आतंकवादी हमला अलकायदा ने किया था, इसलिए अमेरिका के निशाने पर अलकायदा ज्यादा था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि राणा ने लश्कर को हमले का साजो-समान तो मुहैया करवाया पर उसे इस हमले की जानकारी नहीं थी, अपने गले से तो नहीं उतर रहा। ज्यूरी ने राणा के खिलाफ जो आरोप या दावे थे, उन्हें नकार दिया। दावा था कि हेडली ने राणा की मदद से भारत के सम्भावित लक्ष्यों की खुफिया जानकारी एकत्र की थी। हेडली ने राणा की सहमति से अपनी गतिविधियों को छिपाने के लिए फर्स्ट इमीग्रेशन सर्विसिस का ऑफिस मुंबई में खोला। राणा ने हेडली को भारत का वीजा हासिल करने में मदद की थी। दोनों ने मिलकर एकत्र की गई खुफिया जानकारियों की समीक्षा की। राणा ने हेडली से कहा था कि हमले में शामिल आतंकियों को पाक का सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए।
यह तो साबित हो चुका है कि मुंबई हमले को आईएसआई और पाकिस्तानी नौसेना की मदद से अंजाम दिया गया था, ऐसे में राणा को मुंबई हमले की साजिश में संलिप्तता से बरी करने से ऐसा प्रतीत होता है कि एफबीआई और आईएसआई का कोई सौदा हुआ है। शिकागो की अदालत में भारत को अपना पक्ष भी रखना चाहिए था। गृहमंत्रालय की चूक हुई है। अब भी मौका है। मुंबई हमलो के दौरान मारे गए कुछ यहूदियों के रिश्तेदारों ने न्यूयार्प की अदालत में एक और मुकदमा दायर किया है और इसमें आईएसआई प्रमुख को समन भेजे गए हैं। भारत सरकार को यह सुनहरा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। अमेरिका के अपने हित हैं, फिलहाल उन्हें लगता है कि उनकी हिटलिस्ट में अलकायदा है जबकि भारत के लिए पाकिस्तान और आईएसआई को बेनकाब करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत को समझना पड़ेगा कि हमें आतंकवाद के खिलाफ अकेले ही लड़ना पड़ेगा, हम अमेरिका पर ज्यादा विश्वास नहीं कर सकते।

Sunday, 12 June 2011

अब नॉन पॉलिटिकल मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी आमने-सामने

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 12th June 2011
अनिल नरेन्द्र
मुझे मनमोहन सिंह सरकार पर कभी-कभी दया भी आती है कभी निराशा भी। दया इसलिए आती है कि इस सरकार को जो लोग चला रहे हैं वह सभी नॉन पॉलिटिकल (गैर राजनीतिज्ञ) हैं। सबसे ऊपर सोनिया गांधी हैं जो सुपर प्राइम मिनिस्टर हैं और सरकार का रिमोट कंट्रोल हैं। वह नॉन पॉलिटिकल हैं। उनके नीचे हैं प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जिन्होंने अपनी जिन्दगी में एक भी चुनाव नहीं लड़ा। सोनिया गांधी के मुख्य एडवाइजर अहमद पटेल सरीखे के लोग हैं जो पर्दे के पीछे से फैसले करते हैं, वह भी गैर राजनीतिज्ञ से ही हैं। इसलिए यह सरकार जो भी फैसले करती है उसमें नौकरशाह की बदबू ज्यादा आती है राजनीतिक होने की कम। इसी से निराशा होती है। आप हाल ही में इस सरकार के महत्वपूर्ण फैसले देखिए। चाहे वह अन्ना हजारे का मामला रहा हो, चाहे बाबा रामदेव का। दोनों में भी बड़े बचकाने तरीके से इस मनमोहन सरकार ने मामले को हैंडिल किया। मेरी बात तो छोड़िए अब तो कांग्रेस पार्टी के अन्दर बाबा के प्रकरण को लेकर घमासान छिड़ गया है।
रामलीला मैदान में लगे बाबा रामदेव के योग शिविर को पुलिसिया कार्रवाई के तहत हटाने के बाद कांग्रेस में घमासान छिड़ गया है। इस प्रकरण में अब एक तरीके से कांग्रेस पार्टी और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और सरकार में मंत्री की कुर्सी सम्भालने वाले कई वरिष्ठ नेता आपस में ही भिड़ गए हैं। सबसे ज्यादा मुखर पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह हैं। दिग्विजय सिंह जितना भला-बुरा बाबा रामदेव को कह रहे हैं, उससे अधिक वे अपनी पार्टी की सरकार के मंत्रियों पर निशाना साध रहे हैं। ताजा आक्रमण उन्होंने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी पर किया है जबकि सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को भूलकर पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय ने सरकार पर निक्रियता का ही आरोप मढ़ दिया है। दिग्विजय ने प्रणब मुखर्जी और केंद्र के तीन मंत्रियों को बाबा से बातचीत करने के लिए एयरपोर्ट जाने पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि प्रणब ने तो बाबा को लेकर अपना पूरा भविष्य ही दांव पर लगा दिया। सरकार की आलोचना करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि केंद्र में प्रणब जब से मंत्री हैं, तब रामदेव पैदा भी नहीं हुए थे। मंत्रियों को एयरपोर्ट पर जाकर बाबा को मनाने के बारे में अपनी नाखुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि यदि वे मंत्री होते तो कभी रामदेव को नहीं मनाते। यही नहीं, सरकार में कांग्रेस के दिग्गज मंत्रियों के स्वर भी पार्टी के साथ हो लिए हैं। सुबोध कान्त सहाय ने मुख खोला और कहा कि रामलीला मैदान में बाबा के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई पर स्पष्टीकरण में सरकार की तरफ से शिथिलता बरती गई। हालांकि सहाय उन मंत्रियों में शामिल थे, जो सरकार की तरफ से बाबा के साथ बातचीत कर रहे थे। सहाय ने कहा कि जब पहले से ही सरकार की तरफ से तय हो चुका था कि यदि अनशन से बाबा अपने समर्थकों के साथ नहीं हटे, तो उन पर पुलिसिया कार्रवाई की जाएगी। कार्रवाई होने के बाद गृहमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा चार दिन बाद स्पष्टीकरण दिया गया। इससे जनता में गलत संदेश गया और इससे सरकार और पार्टी, दोनों की छवि खराब हुई।
कांग्रेस के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' तक ने चार मंत्रियों के बाबा को हवाई अड्डे पर रिसीव करने पर कड़ा एतराज जताया है। पार्टी के मुख पत्र होते हुए भी उसने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि क्या चार वरिष्ठ मंत्रियों का हवाई अड्डा जाना जरूरी था? अनिल शास्त्री इस पत्रिका के सम्पादक हैं। सम्पादकीय में कहा गया है कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह नागरिक समाज की मांगों पर अनुकूल रुख अपनाए, लेकिन यह काम इस तरीके से होना चाहिए कि निर्वाचित सरकार की गरिमा एवं उसके न्याय सम्मत अधिकारों का हनन नहीं हो। सम्पादकीय के मुताबिक किसी विशिष्ठ समूह को सड़कों पर संवैधानिक मामलों के बारे में फैसला करने की इजाजत नहीं दी जा सकती और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि कानून निर्माण की कुछ खास प्रक्रिया होती है। `कांग्रेस संदेश' के सम्पादक अनिल शास्त्राr हैं और इसके सम्पादक मंडल में सलमान खुर्शीद और सरबजीत सिंह भी शामिल हैं। दूसरी ओर दिग्विजय के बयान से कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता सहमत नजर नहीं आ रहे हैं। हवाई अड्डे के बारे में मंत्रियों की मजबूरी गिनाते हुए पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सरकार को रामदेव के दिल्ली आने की सूचना थी और इससे पहले ही उन्हें अनशन नहीं करने के लिए मनाने पर जुटी थी। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल और पर्यटन मंत्री सुबोध कान्त सहाय रामदेव से फोन पर सम्पर्प में थे पर दिल्ली आने से ठीक पहले रामदेव से फोन पर सम्पर्प नहीं हो पा रहा था। जैसे ही सम्पर्प हुआ तब तक रामदेव दिल्ली हवाई अड्डे पहुंच गए और उनसे कई मुद्दों पर बात करने के लिए मंत्रियों ने हवाई अड्डे के वीआईपी लान में बात करना मुनासिब समझा।
कांग्रेस में बढ़ रही खिलाफत का सिलसिला अब प्रदेशों तक पहुंच गया है। प्रादेशिक नेताओं ने भी अब पार्टी रणनीतिकारों को पत्र लिखकर मांग करनी शुरू कर दी है कि पार्टी के जो नेता बाबा रामदेव से जुड़े हैं, उन्हें संगठन व सरकार में महत्व नहीं मिलना चाहिए। उज्जैन से कांग्रेस सांसद प्रेम चन्द गुड्डू ने राज्य प्रभारी व पार्टी महासचिव वीके हरिप्रसाद को पत्र लिखकर यह मांग की है। केंद्रीय मंत्री कमलनाथ का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि जो लोग बाबा रामदेव के चरण धोते हैं, वे सरकार में क्यों बैठे हैं? पार्टी को इस पर गम्भीरता से सोचा चाहिए। वहीं कांग्रेस पार्टी के मुख पत्र `कांग्रेस संदेश' में छपे सम्पादकीय पर भी पार्टी ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। कांग्रेस महासचिव और मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने सम्पादक को चेतावनी दी है कि यह पत्रिका कांग्रेस का मुख पत्र है, यह बात उन्हें याद रखनी चाहिए और इसमें अपने विचार सम्पादक को थोपने का अधिकार नहीं है।
केंद्र सरकार के मिस्टर क्लीन-चेहरे एके एंटनी का पारदर्शिता पर गूढ़ बयान, प्रणब दा की आर्थिक मोर्चे पर घेराबंदी, चिदम्बरम की अचानक रामदेव के बहाने अपनी दृढ़ छवि पेश करने की कोशिशöये चन्द उदाहरण हैं जिनसे कांग्रेस पार्टी में भारी असंतोष का अहसास होता है। दरअसल पार्टी और सरकार, दोनों बाबा रामदेव प्रकरण को लेकर असहज स्थिति में पहुंच चुकी हैं। बाबा रामदेव पर अगली कार्रवाई भी इसी उधेड़बुन के बीच फंसी हुई है। प्रणब पर गुरुवार को एक अखबार में छपी खबर को लेकर भी पार्टी और सरकार में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। सरकार के अन्दर विरोधाभास सामने आ गया है। बाबा की हालत चिन्ताजनक स्थिति में पहुंच गई है। उन्हें जबरन आईसीयू में भर्ती कराया गया है। रामलीला मैदान में पुलिस लाठीचार्ज से प्रभावित राजबाला की हालत अत्यंत गम्भीर हो गई है। सरकार को समझ नहीं आ रहा कि वह अगला कदम उठाए तो क्या उठाए? बाबा को अगर कुछ हो गया तो क्या होगा? अन्त में मुंबई में शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने प्रश्न किया है कि चार जून को पुलिस रामलीला मैदान पर लाठीचार्ज के खिलाफ प्रिन्स राहुल गांधी धरने पर क्यों नहीं बैठे? जब वह भट्टा-पारसौल में पुलिस अत्याचार के खिलाफ धरना दे सकते हैं तो रामलीला मैदान कांड पर क्यों नहीं?
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Saturday, 11 June 2011

सोती राजबाला को इस हालत में पहुंचाने का जिम्मेदार कौन?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 11th June 2011
अनिल नरेन्द्र
बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर शनिवार आधी रात के बाद बर्बर पुलिस कार्रवाई का आर्डर किसने दिया था? देश जानना चाहता है कि वह कौन व्यक्ति था जिसने निहत्थे, भूखे, सोते हुए बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों पर दिल्ली पुलिस को डंडे बरसाने व खदेड़ने का हुक्म दिया था? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि हमारे पास कोई और विकल्प नहीं था। मनमोहन सिंह कहते हैं कि इस अभियान को अंजाम देना दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन ईमानदारी की बात है कि कोई और विकल्प नहीं था। उन्होंने रामलीला मैदान में रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन के खिलाफ मध्यरात्रि के समय की गई पुलिस कार्रवाई के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में यह बात कही। वहीं हमारे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम जी कहते हैं कि 25 मई को स्वाभिमान ट्रस्ट से लिखित रूप में पुष्टि की थी कि रामलीला मैदान में आवासीय योग शिविर के सिवाय कोई और कार्यक्रम न होगा, लेकिन इसके बावजूद रामदेव ने एक जून को रामलीला मैदान में घोषणा की कि वह 4 जून से आमरण अनशन करेंगे। जब अनुमति की शर्तों का उल्लंघन होते देखा गया तो इस अनुमति को रद्द करके यह कार्रवाई की गई। चिदम्बरम के अनुसार पुलिस ने न्यूनतम हानि को ध्यान में रखकर यह कार्रवाई की। उन्होंने यह भी कहा कि बाबा रामदेव के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी का हाथ है और यह एक राजनीतिक आंदोलन था। हम श्री चिदम्बरम की दलीलों से सहमत नहीं हैं। मान भी लें कि बाबा रामदेव के पीछे संघ समर्थक भी थे और यह एक राजनीतिक आंदोलन था तो क्या? क्या संघ देशद्रोही है? क्या भ्रष्टाचार मुद्दा, मुद्दा नहीं रह जाता अगर संघ या भाजपा कहे? महत्वपूर्ण मुद्दा है न कि कौन किसके पीछे है। रही बात पुलिस की न्यूनतम हानि पर ध्यान रखने की तो श्रीमान आप जीबी पन्त अस्पताल जाकर उस अभागी राजबाला का हाल देखिए जो जीवन-मौत के बीच संघर्ष कर रही है। गुड़गांव निवासी राजबाला (50 वर्ष) शनिवार को पुलिस कहर का शिकार हुई थी। वह पेरेलाइज हो चुकी है और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा हुआ है। डाक्टरों ने वेंटिलेटर हटाने का प्रयास किया था पर फिर लगाना पड़ा क्योंकि राजबाला का सांस फूलने लगा था। आज भी पता नहीं कितने लोग लापता हैं, जिनके रिश्तेदार
दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं उन्हें ढूंढने के लिए। माननीय चिदम्बरम जी कृपया आप कुछ प्रश्नों का उत्तर दें। अगर सरकार को यह मालूम था कि बाबा रामदेव के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी थी तो उन्होंने 4 जून तक बाबा से बातचीत क्यों जारी रखी? आपने बाबा को हवाई अड्डे पर ही क्यों नहीं रोक दिया जबकि आपको यह मालूम था कि बाबा क्या करने दिल्ली आ रहे हैं? अगला सवाल है कि आपकी सरकार के चार मंत्री बाबा को लेने हवाई अड्डे क्यों गए थे? हमारी बात तो छोड़िए आपके महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी प्रश्न किया है कि मनमोहन सरकार के दूसरे नम्बर के मंत्री प्रणब मुखर्जी बाबा को लेने हवाई अड्डे क्यों गए थे? चलिए इसे भी छोड़िए। आप बताएं कि कपिल सिब्बल क्लैरिज होटल में इतने घंटे बाबा को क्या समझाने की कोशिश कर रहे थे? 3 जून को वह घंटों होटल के कमरे में बाबा से बातचीत कर रहे थे। क्या कपिल सिब्बल बाबा को डरा रहे थे कि हम यह कर देंगे अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी और जब बाबा ने आपकी बात नहीं मानी तो आपने उन्हें सबक सिखाने का फैसला कर लिया और नतीजा हुआ लाठीचार्ज? आपकी सरकार ने बाबा को 20 दिन के योग शिविर की क्यों इजाजत दी जबकि बाबा के पोस्टरों, बैनरों, होर्डिंग्सों में साफ लिखा था कि वह काले धन, भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ अनशन करेंगे? पुलिस एफआईआर कहती है कि रामलीला मैदान में 25000 लोगों के आने की उम्मीद थी, जब आपको यह अनुमान था तो आपने शुक्रवार या शनिवार को आज्ञा को रद्द क्यों नहीं किया? अब बात करते हैं उस रात की पुलिस कार्रवाई की। क्या यह सही है कि दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने आपसे यह कहा था कि रात को सोते लोगों पर लाठीचार्ज करना, आंसू गैस छोड़ना सही नहीं होगा, खासकर जब वहां महिलाएं, बच्चे और पुरुष हैं? उन्होंने आपसे अनुरोध किया था कि मुझे कुछ समय दीजिए मैं कल (रविवार) को दिन में बाबा को रणजीत होटल किसी बहाने बुलाकर कस्टडी में ले लूंगा और फिर हम अनशन पर बैठे लोगों को शांति से हटने को कहेंगे और बिना बल प्रयोग करके रामलीला मैदान खाली करवा लेंगे पर आपने या आपके साथी मंत्री ने यह नहीं माना और कहा कि हमें दो घंटे के अन्दर रामलीला मैदान खाली चाहिए चाहे जो कुछ भी करना हो?
दिल्ली पुलिस ने क्यों आठ टीयर गैस सैल पंडाल के अन्दर मारे जबकि उन्हें मालूम था कि इससे आग लग सकती है और लग भी गई। अगर इस आग में महिलाएं, बच्चे व बुजुर्ग लपेट में आ जाते तो क्या होता? फिर आपने बत्ती भी बन्द कर दी और अंधेरा कर दिया। क्या पुलिस को इतना भी ध्यान नहीं आया कि अंधेरे में लोग भगदड़ में दबकर मर सकते हैं? आपने आंदोलनकारियों को खदेड़ दिया जबकि आपको यह मालूम था कि दिल्ली का रैड लाइट एरिया बहुत करीब है और वहां पर कई जवान महिलाएं भी थीं। दिल्ली पुलिस ने भी वहशियाना बर्ताव किया। अगर उसे पंडाल खाली करने का आदेश दिया भी गया था तो उसे भी थोड़ी मानवता दिखानी चाहिए थी। पिछले दिनों मिस्र में जब जनता सड़कों पर हुस्नी मुबारक के खिलाफ उतर आई थी तो मुबारक ने सेना और पुलिस को आदेश दिया था कि आंदोलनकारियों पर फायर करो और उन्हें चौक से हटाओ पर सेना व पुलिस ने साफ मना कर दिया था कि हम अपने लोगों पर गोलियां नहीं चलाएंगे। पुलिस भी कह सकती थी कि हम शांतिपूर्वक ढंग से जनता को वहां से हटाएंगे पर उन्होंने तो ऐसा बर्ताव किया जिससे सारा देश चौंक उठा। अब उस दिन के सबूत मिटाने के लिए विभिन्न चैनलों से फुटेज मांग रहे हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में उन्हें जवाब देना होगा कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी थी जिसके चलते निहत्थे, भूखे, सोते लोगों पर लाठियां बरसाईं, आंसू गैस छोड़ी? दिल्ली पुलिस के एक अफसर ने भी माना कि वरिष्ठ पुलिस अफसरों के आदेश के बावजूद कई बार मौके पर मौजूद अफसरों और जवानों को अपने विवेक का इस्तेमाल करना पड़ता है। पुलिस को मानवाधिकार तथा जमीनी हरकत को ध्यान में रखकर कार्रवाई करनी पड़ती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार ने पुलिस से अनुरोध किया कि उन्हें किसी भी कार्रवाई के दौरान संयम बरतना चाहिए और आंख-कान बन्द करके आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए।
राजघाट पर जब अन्ना हजारे एक दिन के अनशन पर बैठे थे तो वहां आंदोलनकारियों ने जमकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कपिल सिब्बल के खिलाफ नारे लगाए। जब अरविन्द केजरीवाल भाषण कर रहे थे तो बीच में ही जनता ने मनमोहन सिंह मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए। केजरीवाल रुक गए। उन्होंने फिर भाषण शुरू किया। इस बार कपिल सिब्बल के खिलाफ नारे लगने आरम्भ हो गए, केजरीवाल फिर रुक गए। तीसरी बार फिर शुरू किया। कुछ छात्रों ने अपने हाथों में पोस्टर ले रखे थे जिनमें मनमोहन सिंह को रावण दिखाया गया था जिसमें ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी, कनिमोझी, शरद पवार और प्रणब मुखर्जी के सिर बने हुए थे। उन सबसे ऊपर सोनिया गांधी का चेहरा बना हुआ था। इससे ही पता चलता है कि जनता में इस सरकार के प्रति कितना रोष है। रामलीला मैदान में लाठीचार्ज का कसूरवार आखिर कौन है? हो सकता है कि गृह मंत्रालय दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट सीपी या डीसीपी की कुर्बानी देकर अपना पल्ला झाड़ ले पर यह इंसाफ नहीं होगा। इसके लिए गृहमंत्री खुद जिम्मेदार हैं और पी. चिदम्बरम को इसकी जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी।
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Friday, 10 June 2011

Baba’s non-violence (hathyoga) helpless before government violence (lathyoga)

- Anil Narendra
The way Baba Ramdev and his supporters were rounded up on Saturday night by Delhi Police, has become talk of the town. This episode has grabbed the electronic and print media. General public has reacted in two ways on the happenings of Saturday. There is a section, which says that Baba deserved the treatment he met. Baba had crossed all the limits. He had earned the ire of the government by announcing to continue his movement even after reaching an agreement with the government. Some say that Baba has sought permission for a yoga camp from Delhi Police and he had never mentioned about fast and agitation and had mentioned the number of supporters as 3,000 and also assured the gathering at Ram Lila Maidan will not cross this figure. Still, not only fast and non-violent agitation were organized, but his disciples in thousands gathered at Ram Lila Maidan. As such, the administration had the right to take necessary action. As far as the reaction of Manmohan government and Congress Party is concerned, the remarks by the Party General Secretary, Digvijay Singh were sufficient to gauge their mood. Targeting Baba Ramdev from the very beginning, Digvijay Singh has called him a thug (a swindler) and has demanded an enquiry into his activities. Justifying government action, he said that Baba met the same fate as that of a swindler. Digvijay said that after coming to Delhi, Baba Ramdev took shelter at Kushal Bagh Ashram of Swami Shakar Dev, but later, he abandoned him. Then, he duped the Yoga teacher, Baba Karamvir too. Digviajay said that Swami Shankar Dev is missing since July 2007 and no information on his whereabout is available. He further said that Baba Ramdev has duped his followers and the public by claiming to treat diseases like cancer without any authority. Perhaps, he wanted to cheat the government like he cheated public. These are the views and arguments of those, who justify the action taken by the Police on Saturday night.
Then, there is a majority of the people, which considers this to be the gravest mistake of the government, for which it should not be pardoned. I do not hesitate to say that government has failed to handle this Baba episode properly. The first mistake was that government should have not permitted Baba to start his fast. Under prevailing in Delhi laws, Ram Lila Maidan is prohibited for use for political activities. Bharat Swabhiman Manch and Patanjali Yoga Committee had asked for permission for a Yoga Camp and sit-in (dharna). Government could have very well said that we can permit yoga camp, but we will not permit sit-in at Ram Lila Maidan. The application for permission mentioned the number of supporters to be three thousand, but the intelligence agencies had clearly told the government that much more than three thousand people would gather at the Maidan. Second mistake, rather blunder, was that four ministers of government of India including number two in the cabinet, Pranab Mukherjee went to the airport to receive Baba Ramdev on his arrival in Delhi. Why? Why Baba was allowed to step out of the airport? It is learnt that a special BSF aircraft was ready to take him back to Haridwar. Driving away of Baba supporters from Ram Lila Maidan at dead of night on Saturday at 01.00 AM, who were sleeping in the Maidan and which included women, children and elderly persons was the third biggest stupidity of the government. Even the Supreme Court of India was startled by the savagery shown by the Delhi Police, which, taking cognizance of the matter, issued notices to the Central government and Delhi administration and asked them to reply within two weeks’ time. The Police brutality on Saturday night at Ram Lila Maidan was such frightening that mere mention of it makes one shiver. More than a hundred persons were injured in this brutal show of power by the Police, condition of many of whom is still said to be critical. The Police used all types of fair and foul means to stop Baba’s agitation. Agitators say that the Police not only used violence to drive away people from the Pandal, but it set fire to the stage. The teargas shells fired by the Police caused fire to the stage. The raging fire led to confusion, but thank God, it did not convert into second Dabwali. Hundreds of persons could have lost their lives. Dozens of children, women and elderly persons could have been crushed to death in the stampede caused by the lathi charge by the Police on these sleeping people. The experience narrated by the victims could make anybody angry. The agitators say that they had read about Jalianwala Bagh massacre in books, but they had first hand experience of that fateful incident on Saturday night. There are number of women among the agitators, victims of Police lathicharge, with whom the Police crossed all the limits of indecency and cruelty. The supporters of Baba Ramdev fled out of the Maidan to escape Police brutality, but after coming out they felt that they don’t even have proper clothes to wear nor money to reach their homes. Whatever they had, was left in the Ram Lila Maidan in the confusion. But where to go in such a state? Some headed for ITO or Connaught Place, while some left for Railway Station. A few of the women walked in the dead of night under the Ranjit Singh flyover to reach Arya Anathalaya, Barakhambha Road to take shelter. Shri Viresh Pratap Chowdhary runs this orphanage and Baba is a regular visitor here. A group of hundreds of disillusioned Baba supporters headed for Bangala Sahib and Rakabganj Gurudwaras. They didn’t have enough money, so they left on foot for Gurrudwaras to take shelter there. Seeing the plight of these devotees, victim of Police atrocities, Sewadars in the Gurudwaras, not only arranged for their stay immediately, but invited these agitators, who had been on fasting for 24 hours for lungar. There were number of devotees who expressed gratitude for shelter, but refused to take food saying that they will only break their fast only on Babaji’s directions. There were others, who took food after repeated requests by the Sewadars. According to Menakshi Shukla from Mahoba (UP) in Bangala Sahib Gurudwara, the way the Police drove them away from Ram Lila Maidan, made them feel that they were being uprooted from their homes. Now, I do not have clothes to wear and money to return to my home.
It is also startling to know that a number of persons are still missing. According to an eye witness, Police brought some blue line buses and many persons were taken by these buses out of Ram Lila Maidan. Family members of such persons are wandering from hospitals to dharmshalas and to places nearby the agitation site in search of their relatives. Weeping Shailendra Kumar, who with a batch of about 100 perosns came from Jamshedpur, Jharkhand to participate in Baba Ramdev’s agitation told that three women from his batch are missing since night. 53-year Kamla Bhagt, 50-year Renuka and Susheela Manjhi are missing. What is unfortunate that none of the Central Ministers has visited the victims of the Police atrocities. I think that the government has lost the winning game. The Police action has put the government in the dock not only in India, but before the world also. Even people in US are condemning the Police atrocities of Ram Lila Maidan. Baba has become hero overnight. I fail to understand, what difference could it make if Baba had breached the promise and announced to continue the agitation? What was the urgency that the government resorted to lathi charge on sleeping elderly persons, children and women at one in the night? The important question is, what effect will this episode have on people? Will the people of India not say that this government is oppressive, corrupt and is patronizing the corrupt? This reminds me of Jarnail Singh Bhindarawale. The government, at first promoted him and then did the operation Blue Star. History is repeating itself. Whatever remains, leaders like Digvijay Singh are making for it. He, on one hand, is causing the followers of Baba Ramdev to unite and on the other hand, continuously instigating Hindus.
For Digvijay Singh, Osama is Osamaji, Baba is a thug (cheater). The government has also been put in a difficult situation. The already besieged government has itself invited troubles. Let us see how it deals with the Anna Hazare agitation, which has been announced to start from June 08.