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Sunday, 4 September 2011

राजनीतिक आकाओं के कहने पर भेजा नोटिस ः अरविन्द केजरीवाल


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
अन्ना हजारे के आंदोलन से गुस्से से भरी मनमोहन सिंह सरकार ने अब उन लोगों को चिन्हित कर निशाने पर लेना शुरू कर दिया है जिन्होंने उसकी मिट्टी पलीत करने में सक्रिय भूमिका निभाई। मीडिया पर लगाम लगाने के लिए विशेष ग्रुप बनाने की खबर है। अन्ना के मंच से सरकार को छूट करने वाले फिल्म अभिनेता ओम पुरी और किरण बेदी पर पहले ही मानहानि का केस लग चुका है। सांसदों के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणी को लेकर संसद में विशेषाधिकार हनन के मामले का सामना कर रहीं किरण बेदी का टीम अन्ना अब खुलकर साथ दे रही है। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि पूरी टीम एकजुट होकर किरण बेदी के साथ है। इस तरह के कदम से जनता के बीच यह धारणा जाएगी कि सांसद उनसे बदला लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जब नोटिस मिलेगा तो वह उस पर जवाब देगी।
टीम अन्ना के एक और महत्वपूर्ण सदस्य पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण सीडी प्रकरण में फंसते नजर आ रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने सीडी मामले में कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। इसमें जानकारी दी गई है कि
सीडी में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और शांति भूषण की बातचीत का टेप असली है। इसमें किसी तरह के जोड़तोड़ के प्रमाण नहीं हैं। यदि यह सीडी असली है तो यह सीधे-सीधे उच्चतम न्यायालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला बनता है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार इस मामले में उनके पास एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह भी है। वह गवाह है चर्चित सांसद अमर सिंह। उन्होंने पुलिस को पूछताछ में जानकारी दी है कि उन्होंने अपने घर के लैंडलाइन फोन से खुद शांति भूषण से मुलायम सिंह की बात कराई थी।
मनमोहन सिंह सरकार को सबसे ज्यादा खुंदक अरविन्द केजरीवाल से है। टीम अन्ना में केजरीवाल को वह सबसे बड़ा रोड़ा मानती है। अब केजरीवाल को भी कटघरे में खड़ा करने के प्रयास हो रहे हैं। अरविन्द केजरीवाल के भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से वर्ष 2006 में दिए गए इस्तीफे को केंद्र सरकार ने अब तक मंजूरी नहीं दी है। सेवा शर्तों के मुताबिक केंद्र सरकार ने समय से पहले नौकरी छोड़ने के लिए उनसे तीन लाख रुपये की मांग की थी। अब यह रकम नौ लाख हो गई है। केजरीवाल ने इससे छूट के लिए आवेदन किया था जिस पर
अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है। सरकार से सीधे टकराव के बाद केंद्र सरकार का कार्मिक विभाग (डीओपीटी) केजरीवाल के इस्तीफे का मामला फिर से खोल सकता है। राजस्व सेवा के अधिकारी के तौर पर केजरीवाल ने वर्ष 2000 में दो साल का स्टडी लीव (अध्ययन अवकाश) ली थी। इस दौरान केंद्र सरकार के नियमों के मुताबिक उन्हें वेतन दिया गया था। इस अवधि के बाद उन्होंने दो साल का बिना वेतन का अध्ययन अवकाश भी लिया। सेवा शर्तों के मुताबिक छुट्टी से लौटने के बाद कम से कम तीन साल नौकरी करनी पड़ती है। लेकिन केजरीवाल ने इससे पहले ही 2006 में इस्तीफा दे दिया। ऐसे में डीओपीटी ने उनसे तीन लाख रुपये की मांग की। इसके जवाब में केजरीवाल ने आवेदन किया कि उनके पास इतनी रकम नहीं है, इसलिए उन्हें इससे छूट दी जाए। मगर अब तक डीओपीटी ने इस पर अंतिम फैसला नहीं किया है। हालांकि इस्तीफे के तुरन्त बाद केजरीवाल को इससे बड़ी रकम मैगसेसे पुरस्कार के तौर पर मिली थी।
शुक्रवार को अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया कि उन्हें नौ लाख रुपये का भुगतान करने का नोटिस `राजनीतिक आकाओं' के कहने पर भेजा गया है। जन लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे द्वारा अनशन करने से 10 दिन पहले आयकर विभाग ने पांच अगस्त को केजरीवाल को एक नोटिस भेजा। नोटिस में केजरीवाल से उनके आयकर आयुक्त रहते हुए अध्ययन अवकाश पर जाने की अवधि की तनख्वाह, उस पर लगे ब्याज तथा कर्ज के पुनर्भुगतान की ब्याज सहित बकाया राशि को मिलाकर कुल 9.27 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा गया। केजरीवाल ने कहा कि आयकर विभाग ने मेरे दो वर्ष अवकाश पर रहने के दौरान प्रभावी रहे बांड की गलत व्याख्या की है। मैंने बांड का कोई उल्लंघन नहीं किया है। आयकर विभाग ने यह नोटिस राजनीतिक आकाओं के दबाव में भेजा है। हजारे के एक अन्य साथी कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने सबक नहीं लिया है और वह कुत्सित तरीके पर उतर आई है। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग द्वारा केजरीवाल को भेजे गए नोटिस में उनसे दो वर्ष की तनख्वाह के रूप में 3.54 लाख, उस पर ब्याज के रूप में 4.16 लाख, कम्प्यूटर के कर्ज की बकाया राशि के रूप में 51,000 रुपये और उस पर ब्याज के रूप में 1.04 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा है। इस तरह उन्हें नौ लाख से अधिक रुपये की राशि देने को कहा गया है।
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बाबा रामदेव को घेरने में लगी सरकार


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 4th September 2011
अनिल नरेन्द्र
बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन से खार खाई कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार अब इनसे खुंदक निकाल रही है। जब से यह आंदोलन हुए हैं सरकार इनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। बाबा रामदेव को सरकार अब खुद बाबा को विदेशी मुद्रा विनियम प्रबंधन अधिनियम (फेमा) में घेरने पर उतारू है।
प्रवर्तन निदेशालय ने बाबा रामदेव और उनके ट्रस्ट के खिलाफ फेमा कानून का उल्लंघन करने का केस दर्ज कर लिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बाबा रामदेव की संस्था पर विदेशों से होने वाले धन के लेन-देन में नियमों की अनदेखी करने के आरोप में यह केस दर्ज किया है। इसके अलावा स्काटलैंड में बाबा को दान में मिले कथित `द्वीप' के प्रकरण की भी पड़ताल की जा रही है।
प्रवर्तन निदेशालय और जांच एजेंसियां यह देखने का प्रयास कर रही हैं कि इस द्वीप को प्राप्त करने में बाबा और उनकी संस्था ने कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं की है। ऐसे में जल्द ही इस मामले में बाबा के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण और योग गुरु के वरिष्ठ प्रबंधकों से पूछताछ के आसार हैं।
प्रवर्तन निदेशालय ने भारतीय रिजर्व बैंक और विदेशी जांच एजेंसियों तथा बैंकों के माध्यम से मिली नकारियों के आधार पर मामले दर्ज किए हैं। ईडी सूत्रों के मुताबिक बाबा रामदेव की संस्था पतंजलि योग पीठ, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और योग मंदिर ट्रस्ट के माध्यम से अनियमित वित्तीय लेन-देन की जानकारी मिली है। इन संस्थाओं ने अमेरिका, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन समेत कई देशों से विदेशी मुद्रा प्राप्त की है और ऐसा करने में बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी हुई है। बताते हैं कि ब्रिटेन से ही एक मामला करीब सात करोड़ रुपये के लेन-देन से जुड़ा है। यह मामला बेनामी सौदे से जुड़ा है। इसके अलावा ब्रिटेन के सामान्य व्यापारियों और फुटकर दुकानदारों से मिलकर भी अवैध वित्तीय लेन-देन के सबूत मिले हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ईडी को मिले दस्तावेजों के अनुसार बाबा रामदेव की कम्पनियों ने निर्यात से हुई लगभग 1.8 करोड़ रुपये (चार लाख डालर) की आमदनी के बारे में केंद्रीय बैंक को कोई जानकारी नहीं दी है। नियम के मुताबिक निर्यात से विदेशी मुद्रा में हुई आमदनी की सूचना छह महीने के भीतर आरबीआई को देना जरूरी है। बाबा रामदेव से जुड़ी कम्पनियों ने छह महीने के बाद भी आरबीआई को कुछ नहीं बताया।
बाबा रामदेव और उनकी कम्पनियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा फेमा के तहत मुकदमें से पदाथी स्थित पतंजलि एण्ड हर्बल पार्प में कर्मचारियों में अपने भविष्य को लेकर चिन्ता हो गई है। पदाथी स्थित फूड पार्प में करीब पांच हजार कर्मचारी काम करते हैं। फूड पार्प के आसपास गांवों के लोग भी बड़ी संख्या में कार्य करते हैं। सभी को चिन्ता है कि कहीं ईडी ट्रस्ट के खातों को सीज न कर दे और उनका भविष्य अधर में न पड़ जाए। उधर बाबा रामदेव ने हरिद्वार में कहा कि उन्होंने या उनके ट्रस्ट ने किसी भी तरह के लेन-देन में कोई असंवैधानिक कार्य नहीं किया है। बाबा ने बताया कि अभी तक प्रवर्तन निदेशालय से उन्हें या उनके ट्रस्ट के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की कोई अधिकृत जानकारी नहीं दी गई है। उन्हें इसकी जानकारी मीडिया से मिली है। उन्होंने कहा कि नोटिस मिलने पर माकूल जवाब दिया जाएगा। बाबा रामदेव हरिद्वार के कनखल स्थित दिव्य योग फॉर्मेसी में गुरुवार को पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने या उनके ट्रस्ट ने किसी भी तरह का कोई भी असंवैधानिक काम नहीं किया है और न ही कोई गैर-कानूनी लेन-देन किया है।
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Friday, 2 September 2011

15 सितम्बर से दिल्ली में सिटीजन चार्टर लागू होने जा रहा है


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd September 2011
अनिल नरेन्द्र
देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले गांधीवादी अन्ना हजारे काआंदोलन रंग लाने लगा है। दिल्ली की शीला दीक्षित की सरकार ने दिल्ली में सिटीजन चार्टर को 15 सितम्बर से लागू करने की घोषणा कर दी है। इस तरह दिल्ली पहला राज्य होगा जहां सिटीजन चार्टर लागू होगा। अगर यह सिटीजन चार्टर सही से लागू होता है तो दिल्ली वालों को रोजमर्रा आ रही समस्याओं में कमी जरूर आएगी। छोटे-छोटे काम पर महत्वपूर्ण कामों में जो भ्रष्टाचार चलता है उस पर अंकुश जरूर लगेगा। दिल्ली वालों को राशन कार्ड, बर्थ व डेथ सर्टिफिकेट, राजस्व विभाग से जुड़े सर्टिफिकेट तय समय पर मिलेंगे।
संबंधित विभागों को तयशुदा समय पर यह काम करना होगा। ऐसा न किए जाने पर अधिकारी पर जुर्माना हो सकता है। सीएम शीला दीक्षित का कहना है कि 15सितम्बर से इस कानून को कड़ाई से लागू किया जा रहा है। दिल्ली सरकार ने 28 मार्च को दिल्ली नागरिक विधेयक 2011 नोटिफाई किया था। इस विधेयक से जुड़े सारे नियम बना लिए गए हैं। वैसे तो सरकार के विभिन्न विभागों ने कई सर्टिफिकेट, लाइसेंस, आदि देने के लिए समयसीमा तय कर रखी है। यह नियम सरकार के अलावा नई दिल्ली नगर पालिका, दिल्ली नगर निगम पर भी लागू होगा।
लेकिन इनका लाभ लोगों को इसलिए नहीं मिल पा रहा क्योंकि इस काम को करने वाले अधिकारी के खिलाफ कोई एक्शन का प्रावधान नहीं है। नए कानून के बन जाने से संबद्ध विभाग के अधिकारी को तय सीमा में काम करना होगा वरना उस पर जुर्माना होगा।
नए कानून के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को रेवेन्यू विभाग, आदि से कोई सर्टिफिकेट लेना है तो वह आवेदन करेगा। अगर समयसीमा के भीतर सर्टिफिकेट नहीं मिला तो अधिकारी से शिकायत करेगा। शिकायत सही पाए जाने पर उस विभाग के सर्टिफिकेट बनाने वाले अधिकारी पर जुर्माना लगाया जाएगा। जुर्माने से बचने के लिए अधिकारी तय समय में सर्टिफिकेट बनाने की कोशिश करेगा। अगर सर्टिफिकेट बनाने में कोई तकनीकी पेंच है तो सक्षम अधिकारी उसकी जांच करेगा। लेकिन सब कुछ सही पाए जाने के बाद सर्टिफिकेट नहीं बना तो संबद्ध
अधिकारी की यह अक्षमता उसकी एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में भी दर्ज करा दी जाएगी, जिससे उसका प्रमोशन और इंक्रीमेंट प्रभावित होगी। विभाग का कहना है कि हम सारा काम ऑनलाइन से भी करने का प्रयास कर रहे हैं। शिकायत भी ऑनलाइन की जा सकेगी और बाद में सर्टिफिकेट भी ऑनलाइन लिया जा सकेगा।
इन सेवाओं में एपीएल, बीपीएल, अंत्योदय के राशन कार्डों को बनवाना व नवीनीकरण, एससी, एसटी व ओबीसी सर्टिफिकेट बनाना, रिहायशी प्रमाण-पत्र बनाना, लर्निंग लाइसेंस बनाना, व्हीकल रजिस्ट्रेशन, जन्म एवं मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने के अलावा अन्य सभी आवश्यक व प्रमुख सर्विस शामिल हैं।
अगर तय समयसीमा में काम नहीं होता तो संबंधित दोषी कर्मचारी पर 10 रुपये से 200 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। हम समझते हैं कि ऐसा सिटीजन चार्टर जहां तक हो सके सभी सेवाओं पर लागू किया जाना चाहिए। लेकिन शिकायत और अपील के सिस्टम पर खास गौर किए जाने की जरूरत है, क्योंकि मामले कहीं भी लटक सकते हैं। 10 रुपये का जुर्माना भी आज के जमाने में काफी कम है।
बेशक अन्ना हजारे की एक मांग पूरी हो गई है पर देखना यह है कि इसकी इंप्लीमेंटेशन कैसा होता है? कानून तो अपनी जगह ठीक है पर अगर उसको सही से इंप्लीमेंट नहीं किया गया तो नतीजा फिर वही सिफर होगा।

अगला एजेंडा चुनाव सुधारों का होना चाहिए


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 3rd September 2011
अनिल नरेन्द्र
लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे ने पहली लड़ाई जीत ली है। अब टीम अन्ना का अगला एजेंडा चुनाव सुधारों का होगा। इसके संकेत खुद अन्ना दे चुके हैं। रामलीला मैदान में अन्ना ने कहा कि देश से भ्रष्टाचार को मुक्तकरने के लिए जरूरी है कि चुनावी प्रक्रिया में व्यापक सुधार किए जाएं वरना जो नेता एक-एक चुनाव में 10-10 करोड़ रुपये खर्च कर डालते हैं, उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे राजनीति में साधु-संत बने रहें। अन्ना ने दो मुद्दे दिए हैं। पहला है `राइट टू रिजेक्ट' और दूसरा है `राइट टू रिकॉल।' `राइट टू रिकॉल' यानि की यदि चुना हुआ प्रतिनिधि जनता के हिसाब से काम न करे तो उसे बीच में ही वापस बुलाने का अधिकार मतदाताओं के पास जरूर होना चाहिए। मैंने बहुत समय पहले यह बात इसी कॉलम में रखी थी।
जर्मनी में यह सिस्टम लागू है और वर्तमान सरकार इसी के तहत बनी है। `राइट टू रिजेक्ट' का दबाव हमारे सांसदों पर जरूर बनेगा। अभी तो यह हो रहा है कि एक बार वह चुनाव जीतकर आ जाएं तो उन्हें अगले पांच सालों तक जनता की फिक्र नहीं होती। केवल संसद भंग न हो और उन्हें दोबारा चुनावों का सामना न करना पड़े यही एक चिन्ता रहती है। झारखंड के निर्दलीय सांसद इन्दर सिंह नामधारी ने कहा कि अन्ना की दोनों मांगों में सबसे लोकप्रिय मांग `राइट टू रिजेक्ट' है। इससे राजनीति में दबंगई और काले धन पर रोक लग सकती है।
देश में सबसे अधिक मतदाता युवा हैं। आज का युवा वर्ग जागरूक हो चुका है और वह चाहता है कि राजनीति का अपराधीकरण रुके। अन्ना की इस मांग से राजनीति में साफ-सुथरी छवि के लोगों को ही प्रवेश मिलेगा। नामधारी ने कहा कि जन प्रतिनिधियों के वापस बुलाने के लिए जयप्रकाश नारायण के आह्वान देश में लोकप्रिय हो चुका है। हालांकि अभी यह टेढ़ी खीर है। पंचायतों में देखा जाता है कि जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का प्रावधान है। लेकिन एक बार चुनाव होने के बाद जन प्रतिनिधियों को फिलहाल वापस बुलाना इसलिए असम्भव है क्योंकि कोई ऐसा प्रावधान नहीं जिसके तहत वापस बुलाया जा सके।
कांग्रेस की तरफ से कहा गया है कि `राइट टू रिजेक्ट' व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाता वोट नहीं देते। उन्होंने कहा कि आज मतदाता जागरूक हुआ है। अन्ना के आंदोलन के बाद स्थिति बदली है। सांसदों का मानना है कि अन्ना का `राइट टू रिजेक्ट' यानि मतदान के समय भी प्रत्याशी की नापसंद के विकल्प का जन आंदोलन अधिक उग्र हो सकता है। सरकार यदि झुक गई तो सांसदों का कहना है कि राजनीति करना मुश्किल हो जाएगा।
अन्ना के सहयोगी अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि चुनाव सुधारों को लेकर वे लोग जल्दी ही एक एजेंडा जनता के सामने लाएंगे। उनकी कोशिश रहेगी कि अगले एक साल में देश की चुनावी तस्वीर बदल जाए। चुनाव सुधार का एजेंडा जनलोकपाल से भी व्यापक है। एक तरह से यह तो मौजूदा व्यवस्था परिवर्तन का एक हिस्सा है। इसके लिए पूरे देश में एक साथ बदलाव की मशॉल जलानी होगी, तभी राजनीतिक दलों पर कारगर दबाव बन पाएगा। क्योंकि इस बदलाव के लिए कई संवैधानिक संशोधन भी करने पड़ सकते हैं। टीम अन्ना ने उम्मीद बांधी है कि 26 जनवरी से पहले लोकपाल कानून बन जाएगा। केजरीवाल को अब यह आशंका नहीं है कि जनता के दबाव को देखने के बाद सरकार के लोगों की इसमें कोई गड़बड़ी करने की हिम्मत होगी।
यह उचित ही है कि चुनाव सुधारों के सन्दर्भ में अन्ना द्वारा उठाए गए मुद्दों पर बहस हो। यह बहस गति पकड़नी चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार के मूल में खर्चीली होती चुनावी राजनीति है। यह एक सच्चाई है कि लोकसभा, विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार अनाप-शनाप खर्च करते हैं और चुने जाने के बाद उससे दोगुना रुपया कमाने के चक्कर में रहते हैं। वह यह मानकर चलते हैं कि अगर अगला चुनाव वह किसी कारण हार जाते हैं तो भी उनके पास इतना धन होना चाहिए कि उनका राजनीतिक वनवास ठीक से कट जाए। इसलिए वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के चक्कर में रहते हैं और आमतौर से यह अवैध तरीके से अर्जित किया जाता है। दरअसल इसी कारण काले धन के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए मनमोहन सरकार कोई ठोस पहल नहीं कर रही है। चुनावी प्रक्रिया को काले धन से मुक्त करने के लिए तरह-तरह के सुझाव सामने आ चुके हैं। इनमें से एक सुझाव यह है कि चुनाव खर्च का वहन सरकारी कोष से हो। अभी हाल में राहुल गांधी ने भी यही सुझाव दिया, लेकिन निर्वाचन आयोग इससे सहमत नहीं है। उसे यह भय है कि इससे समस्या और विकराल हो जाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त इस सुझाव को इसलिए खतरनाक विचार मानते हैं, क्योंकि उन्हें आशंका है कि तब उम्मीदवार सरकारी कोष से मिले धन के साथ-साथ अपने धन का भी इस्तेमाल करेंगे। राजनीतिक दलों को चुनाव सुधारों का विरोध करने की जगह मौजूदा माहौल को समझते हुए चुनाव सुधारों की दिशा में आगे बढ़ें, क्योंकि भ्रष्टाचार की तरह से आम जनता इसे भी लम्बे अरसे तक अब सहन करने वाली नहीं कि देश को दिशा देने वाली राजनीति अनुचित संसाधनों पर आश्रित हो। जब राजनीति ही साफ-सुथरी नहीं होगी तो फिर वह देश का भला कैसे कर सकेगी?

Thursday, 1 September 2011

खेल संगठनों पर लगाम वाले


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 2nd September 2011
अनिल नरेन्द्र
जब बात सियासतदानों पर लगाम कसने की हो तो भला बात कैसे बन सकती है? जी हां, मंगलवार को प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुई कैबिनेट बैठक में राष्ट्रीय खेल विकास बिल का जो हाल हुआ, उससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अपनी गतिविधियों पर यह खेल मठाधीश किसी भी प्रकार का अंकुश लगाने का विरोध जमकर करते हैं। इन्हें इस बात की भी परवाह नहीं कि कैबिनेट मीटिंग का अध्यक्ष कौन है। गालिबन यह पहली बार हुआ होगा जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी ही कैबिनेट में एक राजनीतिक चुनौती मिली हो। खेल मंत्री अजय माकन ने फरवरी के महीने में ही घोषित कर दिया था कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) सहित सभी खेल संघों को एक नई नियमांवली के तहत लाने के लिए मंत्रालय एक विधेयक लाएगा। मंगलवार को कैबिनेट में अजय माकन ने यह विधेयक रखा था। इसमें यह प्रस्ताव भी था कि बीसीसीआई भी आरटीआई कानून के दायरे में आए ताकि इसमें ज्यादा पारदर्शिता दिखाई पड़े। मंत्रालय ने खेल संघों से जुड़े पदाधिकारियों के लिए अधिकतम आयु और कार्यकाल के नियंत्रण के भी नियम प्रस्ताव रखे। देश के खेलों की दिशा-दशा तय करने वाले संगठनों की लगाम कसने के मकसद से लाए गए इस बिल की यह दुर्गति तय ही थी, क्योंकि खेल संगठनों को बेलगाम दौड़ा रहे कई सियासी धुरंधरों को यह अपना खेल बिगाड़ने का अस्त्र नजर आ रहा था। जाहिर है, ऐसे में कैबिनेट की बैठक में इस बिल का भविष्य तय कर रहे सियासी खिलाड़ियों के हाथ से यह हरी झंडी पा कैसे जाता। बिल को लेकर सबसे ज्यादा उत्तेजित कृषि मंत्री शरद पवार थे। वे इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के अध्यक्ष हैं। वे इस प्रस्ताव से खासे खफा थे कि खेल संघों के पदाधिकारियों के लिए 70 साल की अधिकतम आयु तय कर दी गई है। बुजुर्ग हो गए पवार ने आयु सीमा के इस प्रस्ताव पर खेल मंत्री से तीखे सवाल किए। सूत्रों के अनुसार इस मामले में उन्होंने यहां तक कह डाला कि यदि 70 साल की उम्र के बाद माना जाता है कि कोई काम ठीक से नहीं हो सकता, तो मैं समझता हूं कि इस कमरे में 70 साल की उम्र पार कर गए किसी व्यक्ति को नहीं होना चाहिए। यह कटाक्ष उन्होंने 70 पार कर गए वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री की ओर देखते हुए किया था। फारुख अब्दुल्ला भी इसी श्रेणी में आते हैं। कैबिनेट में इस बिल को लेकर शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, कमलनाथ, फारुख अब्दुल्ला और विलास राव देशमुख ने अपना विरोध जताया। इसलिए प्रधानमंत्री को खेल मंत्री से यह कहना पड़ा कि इस बिल का ड्राफ्ट दोबारा लाएं और इसमें से वे प्रस्ताव हटा दें, जिनको लेकर साथी मंत्री नाराज हैं। खेल मंत्री अजय माकन ने पारदर्शिता का हवाला देते हुए उन्हें समझाने की कोशिश की। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने विधेयक का समर्थन किया पर पवार, कमलनाथ, सीपी जोशी, विलास राव देशमुख, प्रफुल्ल पटेल जैसे कई नेताओं के विरोध ने रास्ता रोक दिया। ध्यान रहे कि सीपी जोशी राजस्थान क्रिकेट बोर्ड तो विलास राव मुंबई क्रिकेट बोर्ड के, जबकि पटेल भारतीय फुटबाल संघ में बतौर अध्यक्ष काबिज हैं। इससे पहले केंद्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री एवं बीसीसीआई उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला ने भी इस पर आपत्ति जताई। विपक्ष के अनुराग ठाकुर व विजय कुमार मल्होत्रा भी विरोध में शामिल थे।
इस घटनाक्रम से कई सवाल खड़े हो गए हैं। जो विधेयक प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और गृहमंत्री की खास पहल पर लाया गया हो उस पर कैबिनेट के पांच मंत्रियों ने बुलडोजर चला दिया हो साधारण स्थिति नहीं मानी जा सकती। इससे प्रधानमंत्री की अपनी कैबिनेट पर पकड़ के सवाल भी खड़े होते हैं। क्योंकि कैबिनेट बैठक में शरद पवार का यह कहना कि इस कमरे में भी तो 70 साल के बुजुर्ग बैठे हैं, सीधी पीएम को चुनौती थी। पवार यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने यहां तक धमकी दे दी कि यदि कैबिनेट में यह प्रस्ताव मंजूर हो गया तो वे इस मामले की शिकायत यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी के पास ले जाएंगे। पवार के तेवर देखकर प्रणब दा भी सन्न रह गए। मजेदार बात यह है कि इस प्रस्तावित विधेयक के खिलाफ भाजपा के अरुण जेटली, विजय कुमार मल्होत्रा, यशवंत सिन्हा व अनुराग ठाकुर जैसे दिग्गज भी हैं। क्योंकि यह लोग भी कई खेल संघों से दशकों से अड्डा जमाकर बैठे हैं। प्रधानमंत्री के लिए इतनी ही गनीमत है कि विपक्ष इस मामले में सरकार को घेरने की स्थिति में नहीं है। जो गिने-चुने नेता इसकी हिमायत कर रहे थे उनमें प्रमुख थे लालू प्रसाद यादव और कीर्ति आजाद। खेल विकास बिल के कई प्रावधान ऐसे हैं जो सालों से खेल संगठन की कुर्सी सम्भाल `मलाई' खा रहे राजनीतिक धुरंधरों का सूपड़ा साफ कर सकते हैं।
प्रस्तावित विधेयक ने खेल की दुनिया में हलचल मचा दी है। खासकर क्रिकेट की दुनिया में। सुनील गावस्कर जैसे दिग्गज क्रिकेटर ने कहा कि यदि बीसीसीआई को कुछ छिपाना नहीं है तो वह आरटीआई के दायरे में आने से इतना क्यों घबराती है। कपिल देव का कहना है कि जब बीसीसीआई सरकार से कोई अनुदान नहीं लेती तो उसे आरटीआई में कैसे कवर किया जा सकता है? दरअसल प्रस्तावित विधेयक में बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने की बात कही गई है। इसके अलावा इसमें क्रिकेटर्स को एंटी डोपिंग एजेंसी के तहत लाने का भी प्रावधान है। बीसीसीआई का कहना है कि इस बिल के जरिये सरकार उसे अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रही है जबकि सरकार का तर्प है कि वह उसे जवाबदेही और पारदर्शी बनाना चाहती है। गौरतलब है कि बीसीसीआई अपने आप में एक स्वायत्त संस्था है जो अपना फंड खुद ही मैनेज करती है। यह अलग बात है कि सरकार से वह टैक्स में छूट या अन्य तरह की दूसरी सहूलियतें लेती रहती है। पिछले कुछ समय से इस संगठन पर कई तरह के आरोप लग रहे हैं। खासतौर पर आईपीएल के आयोजन में वह सवालों के घेरे में रही है। इसलिए कई लोग मांग करने लगे हैं कि क्रिकेट जैसे सर्वाधिक लोकप्रिय खेल का संचालन करने वाली इस संस्था के कामकाज में पारदर्शिता लाई जाए ताकि पूरा देश इस पर नजर रख सके। भारत में क्रिकेट महज एक खेल नहीं है, यह देश की सोशल लाइफ के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है। इसलिए इस क्षेत्र को बिना किसी रेगुलेशन के छोड़ना ठीक नहीं है। अगर नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल पास हुआ तो बीसीसीआई का दर्जा भी देश के अन्य खेल फैडरेशनों के बराबर हो जाएगा और इसका संचालन भी उन्हीं की तरह होगा। लेकिन क्रिकेटरों के एक वर्ग की दलील है कि बीसीसीआई को और फैडरेशनों की तरह बनाना समझदारी-भरा कदम नहीं होगा। फैडरेशनों में बेशक कुछ कमियां हैं पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्होंने खेलों को कहां तक पहुंचाया है। आज खेल की दुनिया में भारत का नाम है। यह कुछ हद तक इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि बीसीसीआई ने बिना किसी दखल के अपने तरीके से काम कर, धनराशि का पुरस्कार इत्यादि देकर भारतीय क्रिकेट को अव्वल टीमों में से एक बनाया है। इसी तरह और भी खेल हैं जिनका प्रदर्शन पिछले एशिया गेम्स में देखने को मिला। अगर इस पर नियंत्रण लगाने की कोशिश की तो हो सकता है कि इसका प्रतिकूल असर खेलों पर पड़े। दरअसल दोनों पक्ष अपने-अपने दमदार तर्कों के साथ खड़े हैं, इसलिए हड़बड़ी में कुछ करना घातक हो सकता है। अगर बीसीसीआई जैसी संस्था को आरटीआई के दायरे में लाना है तो पहले इस कानून में संशोधन की जरूरत पड़ेगी। इस मसले पर और बहस की दरकार है, सभी पक्षों की राय जानकर ही कोई फैसला लेना बेहतर होगा।
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फिर विवादों में फंसे स्वामी अग्निवेश


Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st September 2011
अनिल नरेन्द्र
विवादों का स्वामी अग्निवेश से चोली-दामन का साथ है। स्वामी अग्निवेश का ताजा विवाद है यू ट्यूब पर जारी हुई एक वीडियो । वीडियो में स्वामी अग्निवेश किसी कपिल नाम के शख्स से बात करते दिखे हैं। फुटेज के अनुसार टीम अन्ना के लिए अग्निवेश ने कहा, `ये तो पागल हो रहा है, जैसे हाथी हो।' स्वामी ने आगे कहा, `पूरी पार्लियामेंट ने जब खड़े होकर अनशन तोड़ने की अपील की तो अन्ना को तभी अनशन तोड़ देना चाहिए था।' इस वीडियो में सुनाई दे रही आवाज के मुताबिक अग्निवेश कहते हैं कि वे बहुत शर्मिंदा हैं कि केंद्र सरकार आखिर इतनी कमजोर क्यों दिखाई पड़ रही है। यही नहीं, अग्निवेश बातचीत के दौरान कपिल को इशारे से यह भी सलाह दे रहे हैं कि केंद्र सरकार अन्ना के आगे कतई झुके नहीं। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वीडियो को तोड़-मरोड़ कर (कट-पेस्ट) कर पेश किया गया है। वह कहते हैं कि जिस कपिल से वह बात कर रहे हैं वह हरिद्वार के कपिल मुनि महाराज हैं पर जब कपिल मुनि से हरिद्वार में सम्पर्प किया गया तो कपिल मुनि ने अग्निवेश से किसी भी तरह की बातचीत से इंकार कर दिया। यह पहली बार नहीं जब अग्निवेश पर सरकारी एजेंट होने का आरोप लगा हो। यही कारण है कि इस बार हजारे टीम ने उनसे दूरी बनाना सही समझा। पिछली बार जब अप्रैल में हजारे अनशन पर बैठे थे तब भी सरकार से समझौता करवाने में अग्निवेश सबसे आगे थे। टीम हजारे को अब महसूस हो रहा है कि अग्निवेश ने अन्ना को धोखा दिया है और अन्ना की पीठ में छुरा घोंपा है।
स्वामी अग्निवेश का जन्म 21 सितम्बर 1939 को छत्तीसगढ़ में हुआ। अग्निवेश ने कोलकाता में कानून और बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद आर्य समाज में संन्यास ग्रहण किया। आर्य समाज में काम करते हुए उन्होंने 1968 में एक राजनीतिक दल आर्य सभा बनाया। बाद में 1981 में बंधुआ मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। अग्निवेश ने हरियाणा से चुनाव लड़ा और मंत्री भी बने लेकिन मजदूरों पर लाठीचार्ज की एक घटना के बाद उन्होंने राजनीति से इस्तीफा दे दिया। कहा जाता है कि स्वामी अग्निवेश वाम विचारों के नेता हैं और सीताराम येचुरी से उनकी खास दोस्ती है। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि सोची-समझी चाल के तहत आर्य समाज में घुसपैठ करने के लिए स्वामी को लगाया गया है ताकि अन्दर से वह इसे कंट्रोल कर सकें। स्वामी अग्निवेश को माओवादियों से विशेष हमदर्दी है और वह हमेशा माओवादियों और केंद्र सरकार में शांतिवार्ता कराने के पक्षधर रहते हैं। माओवादी प्रवक्ता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाले स्वामी अग्निवेश का कहना है कि इस घटना ने शांतिवार्ता को गहरा झटका पहुंचाया है। हिन्दू धर्म का अपमान करने वाले भगवा चोला पहने हुए इस स्वामी को तब कतई शर्म नहीं आई जब श्रीनगर में एक शांति सम्मेलन के दौरान अमरनाथ यात्रा को धार्मिक धोखा करार देते हुए कहा था कि मुझे समझ नहीं आता कि `लोग अमरनाथ यात्रा पर क्यों जाते हैं? मेरा धर्म के इस प्रकार पर कोई विश्वास नहीं है। धर्म वह होता है जब गरीबों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़कर उन्हें न्याय दिलाए।' अहमदाबाद में एक सभा में अग्निवेश को अपने विचारों का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। भरी सभा में स्वामी नित्यानन्द ने स्वामी अग्निवेश को थप्पड़ मारा और उन्हें मंच से घसीटने की कोशिश की। इसके बाद हालांकि स्वामी नित्यानन्द को गिरफ्तार कर लिया गया पर स्वामी अग्निवेश की हिम्मत नहीं हुई कि स्वामी नित्यानन्द के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज करवाएं। अब हरियाणा के हांसी की एक कोर्ट ने उनके खिलाफ इसी बयान के लिए एक गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया है। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि उन्हें गिरफ्तार कर 19 सितम्बर को कोर्ट में पेश किया जाए। अग्निवेश ने यह भी कहा था कि अमरनाथ में बर्प का शिवलिंग बनना कोई ईश्वरीय चमत्कार नहीं है। यह तो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। फिर भी पता नहीं क्यों लाखों लोग बावले होकर अमरनाथ यात्रा जाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
स्वामी अग्निवेश के विवादित वीडियो पर हो रहे हंगामे से कांग्रेस और उसकी अगुवाई वाली सरकार बहरहाल थोड़ा चिंतित जरूर होगी, कांग्रेस ने उन्हें सरकारी खजाने से अपकृत जो कर रखा है। दिल्ली सरकार ने बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए नियम-शर्तों को दरकिनार कर अग्निवेश के बंधुआ मुक्ति मोर्चा को 18 लाख रुपये जारी कर दिए। जैसे आनन-फानन में रुपये जारी हुए, एनजीओ ने वैसी ही बिना मतलब की 60 पेज की रिपोर्ट भी जारी कर दी। सर्वे में गेहूं, चावल जैसे किरयाने के साथ-साथ ऑफिस के टेलीफोन का बिल तक शामिल है। बंधुआ मजदूर कहां थे, कौन नियोजक था, इसका रिपोर्ट में कोई ब्यौरा नहीं है। हां खर्च का पूरा हिसाब 160 पन्नों में दर्ज जरूर है। दिल्ली सरकार की इस अंधेरगर्दीभरी दरियादिली के पांच वर्ष बाद अब महालेखा परीक्षक ने इस साठगांठ की जांच करने का फैसला किया है। यह बात 2006 की है। उस समय दिल्ली सरकार ने यकायक सभी नौ जिलों में बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए अग्निवेश के जन्तर-मन्तर स्थित संगठन को 18 लाख की एकमुश्त राशि दी थी। इसके लिए न तो कोई समझौता पत्र तैयार हुआ और न ही नियम व शर्तें तय की गईं। आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया है कि संस्था से सर्वे कराने का फैसला किसी आवेदन के आधार पर नहीं बल्कि सरकार के स्तर पर हुआ था। शायद यही कारण था कि पूरी राशि एकमुश्त अग्रिम मिल गई। स्वामी जी के और कारनामों की भी रिपोर्टें हैं, इनमें अवैध जमीनी कब्जा भी शामिल है पर इन सब आरोपों से स्वामी अग्निवेश को शायद ही कोई फर्प पड़े। उनका मकसद कुछ और ही है और जब तक उनके असल आका उनके काम से संतुष्ट हैं इन आरोपों का ज्यादा महत्व नहीं रह जाता।
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चार जून की बाबा रामदेव पर कार्रवाई किसके आदेश पर?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 1st September 2011
अनिल नरेन्द्र
चार जून की रात को रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के समर्थकों पर पुलिस की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबा व स्वाभिमान ट्रस्ट से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है जिसमें दिल्ली पुलिस पर वीडियो फुटेज से छेड़छाड़ करने का आरोप साबित हो सके। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एमाकस क्यूरे और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि यह बड़ा सवाल है कि पहले चार मंत्री बाबा रामदेव से मिलने जाते हैं। इसके चार दिन बाद अचानक उनके अनशन को तोड़ने और आधी रात को धारा-144 लगाकर पुलिस कार्रवाई करती है? आखिर यह किसके आदेश से किया जाता है? श्री धवन ने अन्ना हजारे को 16 अगस्त की सुबह अचानक गिरफ्तार किए जाने का जिक्र भी किया है। एमाकस क्यूरे ने दिल्ली सरकार और पुलिस के हलफनामों से असंतोष जताते हुए यह राज भी खोला कि चार जून की रात सीआरपीएफ ने आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया था। जस्टिस बीएस चौहान की बैंच के समक्ष एमाकस क्यूरे, राजीव धवन ने इस मामले में जिला जज से जांच कराए जाने और इस कार्रवाई के दुप्रभावों पर भी विचार करने की मांग रखी। हालांकि पीठ ने बाबा रामदेव के ट्रस्ट भारत स्वाभिमान से दिल्ली पुलिस पर लगाए गए उस आरोप पर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया जिसमें चार जून को हुई इस कार्रवाई के वीडियो फुटेज और सीडी से छेड़छाड़ करने का आरोप पुलिस पर ट्रस्ट की ओर से लगाया गया था। पीठ ने कहा कि अखबारों में आई फोटो और न्यूज चैनलों के वीडियो क्लिपिंग में थोड़ा विरोधाभास है। चार जून की कार्रवाई पर दिल्ली पुलिस बुरी तरह फंस गई है। `इधर कुआं उधर खाई' की स्थिति में फंसी दिल्ली पुलिस के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं। देखें आगे क्या करती है दिल्ली पुलिस?
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