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Friday, 30 December 2022
बिहार का शराब माफिया
शराब माफिया उस दिन पार्टी में किसे ने दे दिया, हम हल्का सा पी लिए तो सर चक्कर देने लगा। काम छोड़कर चले आए। हम डॉक्टर के पास नहीं जा रहे थे, लेकिन फिर ये कांड हो गया तो मां रोने लगी, तब डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर बोले कि एकाध महीने में आंखों से थोड़ा बहुत दिखने लगेगा। सत्येन्द्र महतो बिहार में छपरा के बहरौली गांव के हैं। उनकी आंखें आम इंसानों की तरह दिखती हैं लेकिन जहरीली शराब की वजह से आंखों की रोशनी चली गईं है। सत्येन्द्र 12 दिसम्बर की शाम पड़ोस के एक गांव में जनेऊ (उपनयन) समारोह में काम करने गए थे। वहां किसी ने शराब दी जिसे पीकर उनकी तबीयत खराब हो गईं और इधर सारण के कईं इलाकों में जहरीली शराब ने मौत का तांडव मचा दिया।
स्थानीय रिपोटरों के मुताबिक बहरौली में भी जहरीली शराब से वुछ लोगों की मौत हुईं है। मां की जिद पर सत्येन्द्र समय पर हास्पिटल पहुंच गए तो जान बच गईं, लेकिन आंखों की रोशनी चली गईं। मजदूरी कर घर चलाने वाले सत्येन्द्र का परिवार अब वैसे चलेगा, इसका वुछ पता नहीं है। लेकिन वो अब भी जहरीली शराब के कारोबारियांे के बारे में वुछ बताना नहीं चाहते। शराब कहां से आईं अब यह नहीं बताऊंगा।
सत्येन्द्र के इन शब्दों के पीछे शराब माफिया का डर है या कानून का, इस पर भी वो खामोश हैं। लेकिन जहरीली शराब से प्रभावित सारण के इलाके में शराब के इस अवैध कारोबार की जानकारी कईं लोगों को है।
इसुआपुर के सरवरा गांव की नीता देवी के हाथ लगातार थरथरा रहे है।
उनके पति विक्की महतो पहले गुजरात की एक वंपनी में काम करते थे।
वहीं की पैक्ट्री का एंट्री कार्ड दिखाते हुए नीता देवी वुछ बताने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बता नहीं पा रही हैं। नीता का तीन साल का बेटा भी बोल नहीं पाता, लेकिन इसी उम्र में पिता का उसे संस्कार करना पड़ा। नीता देवी ने जिंदगी के 22 साल भी पूरे नहीं किए लेकिन पति छोड़कर चला गया। विक्की महतो की कच्ची झोपड़ी में बीवी तीन बच्चे और बूढ़े मां-बाप रह गए हैं। जहरीली शराब ने ही 25 साल के विक्की की भी जान ले ली। अब इनके पास हर महीने सरकार की तरफ से मुफ्त मिलने वाला एक किलो गेंहू और तीन किलो चावल रह गया है। विक्की के पिता लाल बाबू महतो का कहना है कि एक किलोमीटर दूर दनरहिया में दारू बिकता है। वहीं 14 तारीख को दारू पीकर घर आया और कहने लगा तबीयत खराब लग रही है। फिर उल्टी करने लगा। मैंने कहा चलो डॉक्टर के पास, तो नहीं गया। रात में दो बजे तबीयत बिगड़ी और बैचेनी होने लगी। एम्बुलेंस बुलाईं, लेकिन रास्ते में ही 15 तारीख की सुबह उसकी मौत हो गईं। उनका कहना है कि बिहार में दारू वैसे आता है, ये तो नीतीश वुमार बता सकते हैं, लेकिन इधर दारू का टैंकर आता है। बिहार में यह आरोप भी लगाया जाता है कि ज्यादातर शराब माफिया राजनेताओं या राजनीतिक दलों के आसपास रहने की कोशिश करते हैं ताकि इसकी आड़ में वो अपना धंधा चला सवें, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश वुमार कह चुके हैं कि जो लोग जहरीली शराब पीकर मारे गए, उनके परिवार को सरकार की तरफ से कोईं मुआवजा नहीं मिलेगा। इस शराब कांड में मारे गए ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। इसमें सबसे बड़ी तादाद गरीब और रोज मेहनत कर घर चलाने वालों की है। यहां कईं परिवार ऐसे भी हैं जिसके पास भोजन का संकट पहले से था और अब कर्ज में भी डूब गए हैं। इस समस्या का कोईं हल नजर नहीं आता।
साल दर साल यही किस्सा दोहराया जाता है। शराब-बंदी ने उल्टा इन माफियाओं की मदद ही की है। दुख की बात तो यह है कि इसका शिकार होने वाले अधिकतर गरीब मजदूर तबके के लोग हैं। वह तो चले जाते हैं पीछे छोड़ देते हैं रोता-बिलखता परिवार।
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