Friday, 14 July 2017

देशभर की जिला अदालतों में 2.81 करोड़ मुकदमे लंबित हैं

उच्चतम न्यायालय में करीब 61 हजार मामले लंबित हैं। इस बीच प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा कि शीर्ष अदालत पुराने मामले निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक तरीके से काम कर रही है। उन्होंने मामला दायर करने वालों को आश्वासन दिया कि उनके सूचीबद्ध मामलों को हटाया नहीं जाएगा। प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर और न्यायमूर्ति डीवीई चन्द्रचूड़ की पीठ के सामने जब एक Eिचतित वकील ने अपने मामले का उल्लेख किया और अनुरोध किया कि सुनवाई से पहले इस मामले को सूची से हटाया नहीं जाना चाहिए तो पीठ ने कहाöहम सभी फास्ट ट्रैक तरीके से काम कर रहे हैं। चिंता मत कीजिए, मामलों को सूची से हटाया नहीं जाएगा। देशभर की अदालतों में लंबित मुकदमों की दरअसल भयावह तस्वीर सामने आई है। नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक विभिन्न जिला अदालतों में तकरीबन 2.81 करोड़ मुकदमे लंबित हैं। वहीं इन अदालतों में करीब 5000 जजों की भी कमी है। सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ज्यूडिशियरी एनुएल रिपोर्ट 2015-16 और सब-आर्डिनेट कोर्ट्स ऑफ इंडिया ः ए रिपोर्ट ऑन एक्सेस टू जस्टिस 2016 शीर्षक से दो रिपोर्ट जारी की हैं। इन रिपोर्टों में वर्तमान स्थिति से पार पाने के लिए अगले तीन साल में करीब 15,000 और जजों की नियुक्ति की जरूरत जताई है। आंकड़ों के मुताबिक जिला अदालतों में एक जुलाई 2015 से 30 जून 2016 की अवधि में 2,81,25,066 मुकदमे लंबित रहे। वहीं इस अवधि में कुल 1,89,04,222 मामलों का निस्तारण हुआ। रिपोर्ट में लंबित मुकदमों के लिए जजों की कमी को जिम्मेदार बताया गया है। इसके अनुसार निचली अदालतों में जजों की स्वीकृति संख्या 21,324 है, इनमें से 4954 पद खाली हैं। किसी भी देश की न्यायिक व्यवस्था में न्यायाधीश का पद सबसे सम्मानीय माना जाता है। लेकिन वर्तमान में देशभर के न्यायालयों में बड़ी संख्या में जजों के पद रिक्त हैं। इसकी वजह से कोर्टों में पेन्डिंग केसों की संख्या बढ़ रही है। पेन्डिंग केसों के निपटारे के लिए आने वाले समय में विभिन्न स्तरों पर जजों की भर्ती जरूरी है। ऐसे में ज्यूडिशियल सर्विस युवाओं के कैरियर का एक बेहतर विकल्प भी बन सकता है। सिर्फ उच्च न्यायालयों में जजों के 40 फीसदी पद खाली हैं। जबकि निचली अदालतों में 15 हजार से ज्यादा जजों की जरूरत है। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में औसतन प्रत्येक जिला न्यायाधीश पर 2,513, पश्चिम बंगाल में 1,963 और दिल्ली में 1,449 केस हैं।

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