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Tuesday, 17 May 2011

Those who abuse the Lord will always suffer.

Anil Narendra
Karunanidhi’s Dravida Munnetra Kazhgam suffered a total washout in the recent elections to the Tamil Nadu Assembly. Of the 234 seats in the Assembly, his party could get just 31 seats while Jayalalitha’s AIADMK got huge 200 seats. With his defeat, I am particularly happy because this is the fate that should befall those abusing Lord Rama. He is the same person who had said at a Press Conference that Lord Rama was an imaginary figure and also that the Ramayana had no basis. And from which engineering college did Lord Rama get his degree? These very remarks the Ravana of this era were made on the Setu controversy. Some of the stanzas of the Ramayana come to my mind on this issue.
`राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा कोई न कुल रोबन हारा'
Meaning that “Not giving due respect to Lord Rama has brought you to this pass. And due to this you have reached a stage where even in your family there is no one left even to cry for you.”
The people have done what is written in one part of the Ramayana.
“जाको प्रिय न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि काति वैरी सम।। यद्यपि परम स्नेही”
Meaning that“Anyone who does not respect Rama Sita, he should be totally ignored, however dear he might be to you.”
When Karunanidhi and his stooge T R Baalu suggested that Ram Setu should be destroyed, their downfall started that very moment.
“जो अपराध भगत कर करहीं, राम रोष पावक सो जरहीं”
Meaning that, “Anyone who demeans devotees, he gets burnt in the fire of anger of Lord Rama, that he invited because of his utterances. Lord Rama does not spare anyone who insults his devotees.”
Ram Setu was built not by Rama, but by his ardent devotee Lord Hanuman and his army of followers. And the idea of destroying the Setu given by Karunanidhi was an insult to the devotees of Lord Rama. Devotee of Lord Rama, Lord Ram the Protector of Devotees could never tolerate all this. That is why in Ramcharitramanas, Saint Tulsidas said:
“जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा, ताकि मति पहिले हर लीन्हा”
Meaning that “anyone who troubles the Almighty will have to pay for it by inviting misery upon himself. And whomsoever the Lord wishes to punish, he takes control of his mind first.”
And that is what has happened to Karunanidhi who is so unwell that one cannot say how he will be affected by the defeat at the hustings. His daughter Kanimozhi might go to jail any time. A Raja is already in jail. One of his wives, Dayalu Ammal might also get into trouble. T R Baalu is out and it is difficult to say whether he will get power again. In all, the whole family is scattered.
After the humiliating defeat of Karunanidhi, what his attitude will be towards the Manmohan Singh government could cause concern for the Central Government, because he can withdraw his ministers from the government, but the Congress Party should not be too worried by this. The shortfall in case of DMK MPs pulling out of the government can be met and the Congress Party should not be bothered by this.
In the 2G spectrum scam, the government should be open about investigating Karunanidhi and company without any fear or pressure.The supporter of Rajiv Gandhi’s assassin, the LTTE, Karunanidhi, deserved this fate.
Read this Article in Hindi: http://anilnarendrablog.blogspot.com/2011/05/blog-post_15.html

भाजपा के इस शर्मनाक प्रदर्शन का जिम्मेदार कौन?

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
Published on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
भाजपा के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद निराशाजनक रहे। असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और प. बंगाल में भाजपा राष्ट्रीय दल के रूप में पहचान के लिए तरस गई। कर्नाटक में उपचुनावों में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने जरूर अपना दबदबा बनाए रखा। चुनावों में पहली बार भाजपा के बड़े नेताओं की अपनी रणनीतिक कौशल दिखाने के लिए ड्यूटी लगाई गई थी, लेकिन कोई भी नेता अपना चमत्कार नहीं दिखा सका। भाजपा को असम और पश्चिम बंगाल में अच्छे परिणाम की उम्मीद थी। पार्टी को केरल में भी अपना खाता खोलने की पूरी उम्मीद थी। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के पास दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु और केरल की कमान थी। विजय गोयल के पास असम और चन्दन मित्रा के पास पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी थी। उनके ऊपर सुपर बोस थे अरुण जेटली।
भाजपा को सबसे बड़ा झटका असम में लगा है। सवाल हो रहा है कि आखिर पूर्वोत्तर के इस राज्य में भाजपा क्यों पिटी? वह भी तब जबकि सबसे ज्यादा ताकत भाजपा नेतृत्व ने इसी राज्य में लगाई थी। पार्टी के चार-चार महासचिव असम में डेरा डाले रहे। पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर अरुण जेटली तक लोगों से वोट मांगने के लिए उतरे। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने दर्जनों सभाएं संबोधित की। लेकिन इन सबके बाद भी पार्टी की लुटिया डूब गई। राज्य में सरकार बनाने का सपना पाले भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि असम गण परिषद (एजीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद सरकार बन जाएगी और सरकार न भी बनी तो पार्टी एक बड़ी ताकत के रूप में उभरेगी। मगर पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में जीतीं 10 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई और असम की विधानसभा में पार्टी की ताकत आधी हो गई।
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भाजपा खाता खोलने के लिए ही चुनाव लड़ रही थी पर केरल में उसका यह सपना इस बार भी साकार नहीं हो पाया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी ने तो कटाक्ष भी किया कि भाजपा खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहती है लेकिन पांच राज्यों की लगभग 800 विधानसभा सीटों में से वह आठ सीटें भी नहीं जीत पाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा को एक सीट मिली है जबकि असम में चार सीटों से ही संतोष करना प़ड़ा। बाकी कहीं खाता नहीं खुल सका है। अब भाजपा नेतृत्व भले ही यह कहकर अपनी झेंप मिटा रही हो कि हमें तो पहले से ही बहुत उम्मीद नहीं थी। भाजपा नेताओं ने केरल में अपनी पूरी ताकत इसलिए लगाई थी कि अगर वहां कमल खिल जाता तो वह इस बात का ढिंढोरा पीट सकती थी कि दक्षिण के लालगढ़ में भी हम पहुंच गए हैं। भाजपा को केरल में 9 फीसदी वोट जरूर मिले पर खाता नहीं खोल पाई। असम और प. बंगाल में भाजपा के लिए सबसे रणनीतिक असफलता यह रही कि दोनों ही राज्यों में पार्टी का किसी दल या गठबंधन के साथ तालमेल नहीं हो पाया। इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए जवाब कौन देगा? राज्य के प्रभारी और महासचिव विजय गोयल, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वरुण गांधी या फिर खुद अध्यक्ष नितिन गडकरी?

परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी-कम गम लेकर आए हैं

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

Publish on 17 May 2011
अनिल नरेन्द्र
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए थोड़ी खुशी थोड़ा गम लेकर आए हैं। खुशी इसलिए कि तमिलनाडु और उसके पड़ोसी केंद्र शासित क्षेत्र पुडुचेरी को छोड़कर कांग्रेस और उसके गठबंधन का परचम हर जगह लहराया है। वहीं केंद्र में मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का इन पांच राज्यों में तकरीबन सूपड़ा साफ हो गया है। पार्टी के लिए सबसे ज्यादा राहत असम से है जहां उसने न केवल तीसरी बार सत्ता में वापसी की है बल्कि पिछली बार से भी ज्यादा सीटें हासिल की हैं। केरल में उसके नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में जरूर पहुंचा है लेकिन मामूली बढ़त के साथ जहां उसकी नैया कभी भी डूब सकती है। बंगाल में पूरी जीत ममता बनर्जी की है जबकि तमिलनाडु जहां 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला बड़ा मुद्दा था वहां उसका तथा द्रमुक का सूपड़ा साफ हो गया है। पुडुचेरी भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया और सबसे खतरनाक समाचार कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश से आया है जहां अपने सबसे बड़े गढ़ में हुए उपचुनाव में उसके बड़े नेता बुरी तरह हारे हैं बल्कि उसके बागी नेता जगन मोहन रेड्डी तथा उनकी मां को भारी जीत मिली है।
अगर केंद्रीय भावी राजनीति को देखें तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का अकेला बहुमत पा जाना कांग्रेस और यूपीए नेतृत्व के लिए दिक्कत खड़ी कर सकती है। ममता का अब यूपीए सरकार में न केवल दबदबा बढ़ जाएगा बल्कि उसकी बार्गेनिंग पॉवर भी ज्यादा हो जाएगी। यही हाल जयललिता का भी होगा। जयललिता की बार्गेनिंग शक्ति के बारे में तो कांग्रेस को अच्छा अनुभव है। ममता ने कांग्रेस को पश्चिम बंगाल सरकार में शामिल होने को कहा है। अब सरकार में शामिल होने का फैसला कांग्रेस को करना है। वैसे देखा जाए तो उसके पास हां कहने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है। अगर केंद्र सरकार में यदि दोनों पार्टियां शामिल हैं तो पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं? कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो ममता की भारी जीत ने कांग्रेस की रणनीति कुछ समय के लिए पंचर कर दी है। कुल मिलाकर राज्य और केंद्र, दोनों की राजनीति के हिसाब से तृणमूल का ग्रॉफ इस समय काफी ऊंचा है।
इन पांच राज्यों के नतीजों को कांग्रेस नेतृत्व ने लीग मैच मानते हुए अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड के क्वार्टर फाइनल की तैयारी शुरू कर दी है। नतीजों की समीक्षा और आगे की रणनीति बनाने के लिए बैठकों के दौर आरम्भ हो चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक सरकार में जहां बंगाल के नतीजे प्रणब मुखर्जी की ताकत में इजाफा कर सकते हैं वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस की दूरदर्शी पी. चिदम्बरम के महत्व पर सवाल खड़े कर सकती है। ममता के मुख्यमंत्री बनने से खाली होने वाले रेल मंत्रालय की कमान किसी को सौंपने के साथ-साथ कई वरिष्ठ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल करके सरकार और संगठन को अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड और आखिर में गुजरात और हिमाचल चुनावों के लिए तैयार करना कांग्रेस नेतृत्व की अब प्राथमिकता होनी चाहिए। कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि इन पांच राज्यों के परिणाम कांग्रेस के लिए ज्यादा खुशी और कम गम लेकर आए हैं।

Sunday, 15 May 2011

ममता की 18 साल पहले ली शपथ पूरी हुई

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi

प्रकाशित: 15 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
18 साल पहले जब बलात्कार की शिकार एक गरीब युवती को लेकर ममता बनर्जी ज्योति बसु (तत्कालीन मुख्यमंत्री) से न्याय मांगने गईं तो पुलिस ने उनका उत्पीड़न किया। उसी रात ममता ने शपथ ली कि जब तक वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ नहीं फेंकती हैं तब तक अपने केश नहीं बांधेंगी। अब ममता अपने केश बांध सकती हैं, उनकी शपथ पूरी हुई। प. बंगाल में वाम मोर्चा साफ हो गया है। परिवर्तन के रथ पर सवार ममता ने वाम मोर्चा के 34 साल पुराने लाल दुर्ग को ध्वस्त कर दिया है और ऐसा करके इतिहास रच दिया है। प्रदेश की जनता को इसी ऐतिहासिक पल का इंतजार था लेकिन इस पल का सबसे अधिक इंतजार ममता को था। 15वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा भारी बहुमत के साथ ममता बनर्जी के नेतृत्व में गठित होगी और तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने वाले वाम मोर्चा को विपक्ष में बैठना पड़ेगा। 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को 184 पर जीत के साथ अपने बलबूते पर स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ है। तृणमूल की सहयोगी कांग्रेस को 42 सीटों पर जीत हासिल हुई है। वाम मोर्चा में सबसे ज्यादा नुकसान माकपा को हुआ है जिसको मुश्किल से 40 सीटें ही मिलीं जबकि सहयोगी फारवर्ड ब्लॉक को 11, आरएसपी को सात, भाकपा को 2 सीटें ही मिल सकीं। निर्दलियों और अन्य ने सात सीटों पर जीत हासिल की। अन्य में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा भी शामिल है, जिसे दार्जीलिंग जिले में तीन सीटों पर जीत हासिल हुई। समाजवादी पार्टी को भी एक सीट मिली जबकि भाजपा का खाता नहीं खुल सका।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का तबसे पतन शुरू हुआ जब से सचिव प्रकाश करात ने कमान सम्भाली है। बड़े-बड़े नेताओं को बेइज्जत करना अब पार्टी में आम बात हो गई है। केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री अच्युतानन्द रहे हों या लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, इनकी अपनी ही पार्टी ने बेइज्जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बंगाल में कुशासन, सत्तासीन वाम पार्टियों में निचले स्तर पर फैला भ्रष्टाचार और जन समस्याओं की अनदेखी इसके पतन के कारण रहे। जनता ने निर्णायक जनादेश दिया है। उसने ममता को इतना बहुमत दिया है कि वे अपने दम-खम पर अकेले सरकार बना सकेंगी। ममता बनर्जी और जयललिता के अपने-अपने राज्यों में मुख्यमंत्री बनने से यह पहला मौका होगा जब दश के चार प्रदेशों में महिला मुख्यमंत्री होंगी। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पिछले 12 साल से इस शीर्ष पद पर आसीन हैं और वह सबसे अधिक समय से पद पर बनी रहने वाली महिला मुख्यमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं अगर मायावती दोबारा चुनाव जीत लेती हैं तो वह भी लगातार 10 साल राज करेंगी। स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी थीं जिन्होंने 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश की बागडोर सम्भाली थी। ममता की जीत से केंद्र सरकार में भी फेरबदल होगा, क्योंकि ममता सहित तृणमूल के मंत्री शायद अब अपने राज्य में चले जाएं। नया रेलमंत्री तो जरूर होगा, क्योंकि ममता ने हमेशा से राइटर्स बिल्डिंग का चार्ज चाहा है। उनका यह सपना पूरा हो गया है। प. बंगाल में कॉमरेडों की हार से दुनिया में वाम विचारधारा वाली सरकारों का लगभग सफाया हो गया है। बंगाल ही सबसे बड़ा गढ़ बचा था। चीन जैसे इक्का-दुक्का देशों को छोड़ दें तो दुनिया में वाम विचारधारा का अन्त हो गया है।

भगवान राम को गाली देने वालों का यही हश्र होता है

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
प्रकाशित: 15 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
तमिलनाडु में एम. करुणानिधि की पार्टी द्रमुक का विधानसभा चुनाव में सफाया हो गया है। 234 सीटों की विधानसभा में करुणानिधि को सिर्प 31 सीटें ही मिली हैं जबकि अन्ना द्रमुक नेता जयललिता की पार्टी को 200 सीटें हासिल हुई हैं। करुणानिधि की हार से मुझे विशेष प्रसन्नता हुई है। भगवान राम को गाली देने वालों का यही हश्र होना चाहिए। यह वही करुणानिधि हैं जिन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में सवाल किया था कि राम एक काल्पनिक व्यक्ति थे। रामायण मात्र कपोल कल्पना है। उसका कोई वजूद नहीं है। राम ने किस इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री ली थी? यह टिप्पणी रावण के इस वंश ने सेतु समुद्रम परियोजना विवाद के दौरान की थी। मुझे रामायण की कुछ चौपाइयां याद आ रही हैं।
`राम विमुख अस हाल तुम्हारा। रहा कोई न कुल रोबन हारा'
अर्थात् भगवान राम से विमुख होने पर तुम्हारा ऐसा हाल हो गया है कि तुम्हारे परिवार में कोई रोने वाला भी नहीं बचा। जनता ने वही किया जो रामायण की इस चौपाई में लिखा है `जाको प्रिय न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि काति वैरी सम।। यद्यपि परम स्नेही' अर्थात् जिसे भगवान राम और मां सीता प्रिय न हों उसका त्याग कर देना चाहिए चाहे वह कितना भी अपना प्रिय क्यों न हो।
जब करुणानिधि और उनके चेले टीआर बालू ने रामसेतु को गिराने की वकालत की थी उसी समय से उनका पतन होना शुरू हो गया था। 
`जो अपराध भगत कर करहीं राम रोष पावक सो जरहीं' 
अर्थात् यदि कोई व्यक्ति भगवान राम के भक्तों के प्रति अपराध करता है तो वह प्रभु के क्रोध रूपी अग्नि में जलता है। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान राम उस दुष्ट व्यक्ति को कदापि नहीं माफ करते जो उनके भक्तों का दिल दुखाता है। रामसेतु का निर्माण भगवान राम ने नहीं बल्कि उनके भक्त हनुमान और हनुमान सेना ने किया था और करुणानिधि ने रामसेतु को तोड़ने के लिए जो तिकड़म रची थी उससे भगवान राम के भक्तों का दिल दुखा। इसे भक्त वत्सल भगवान राम कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। इसीलिए राम चरित मानस में संत तुलसीदास ने कहा हैö`जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा ताकि मति पहिले ही लीन्हा' अर्थात् भगवान जिसे अत्यंत कष्ट देना चाहते हैं उसकी बुद्धि को पहले ही हर लेते हैं। वही हुआ करुणानिधि के साथ। आज करुणानिधि खुद इतने बीमार हैं कि कहा नहीं जा सकता कि इस हार का उन पर क्या असर हो। उनकी बेटी कनिमोझी किसी भी समय जेल जा सकती हैं। ए. राजा पहले से ही जेल में हैं। एक पत्नी दयालु अम्मल भी फंस सकती है। टीआर बालू बाहर हैं और सत्ता में शायद ही कभी आएं। कुल मिलाकर पूरा परिवार ही बिखर रहा है।
करुणानिधि की इस शर्मनाक हार के बाद उनका मनमोहन सरकार के प्रति क्या रुख रहता है यह कांग्रेस के लिए थोड़ी चिन्ता पैदा कर सकता है। क्योंकि अब वे केंद्र सरकार से अपने मंत्री हटा सकते हैं पर कांग्रेस को इसकी ज्यादा चिन्ता नहीं होनी चाहिए। द्रमुक सांसदों की कमी पूरी हो जाएगी। हां अब कांग्रेस Šजी स्पेक्ट्रम घोटाले में खुलकर करुणानिधि एण्ड कम्पनी की जांच-पड़ताल बिना किसी दबाव के कर सकती है। राजीव गांधी के हत्यारे लिट्टे के समर्थक करुणानिधि का यही हश्र होना चाहिए था।
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Saturday, 14 May 2011

America endorses ISI role in 26/11

ANIL NARENDRA
It is gratifying to note that finally America has also accepted Pakistan’s role in the 26/11 Mumbai attack. In a court in Chicago a charge-sheet has been filed by the FBI on 25th April. This is the second charge-sheet. It names Sajid Meer Mazhar Iqbal Abu Kahaffa along with Major Iqbal as accused. Besides these a Lashkar-e-Taiba cadre referred to as “Member D” has also been made accused. America has also given India a dossier regarding the charge sheet. Among the five terrorists named with the charge sheet is one ISI Major Iqbal also. The court proceedings in the Chicago court will start on 16th May. All the accused named in the charge sheet are Pakistani citizen. Sajid, Abu and Iqbal though were identified earlier but it is for the first time that their names have been mentioned in the charge sheet. American born terrorists David Coleman and the Tahavur Rana have also been accused in the Mumbai Attack. According the American authorities Sajid Meer is a member of Lashkar-e-Taiba and his job was to coordinate Lashkar activities with other terrorists groups. He also assisted Headley in many ways. Everybody is aware that Headley has accepted his role in the Mumbai attack. Abu Kahaffa is also connected to the Lashkar. He is known to train new recruits in the art of modern war-fare, weapons etc. at the Lashkar Training Camps. Mazhar Iqbal and “Member D” are alleged to be self made commander of Lashkar. The lawyers have said a person named Iqbal helped in overall planning and providing financial help in the Mumbai Terrorist attack. Sajid Kahaffa and Mazhar helped Headley “Member D” and others to plan and execute 26/11. In the Mumbai attack on 26.11.2008 166 people which also included many foreigners, lost their lives.

Besides the proofs provided in the charge sheet in Chicago Court Indian investigating agencies have also collected other vital facts. Very recently new evidence emerged in a house in Karachi. Pakistani investigating Agency found a box containing a GPS (Global Positioning System). This house was used as control room during 26/11 attack. The boat named Kuber in each terrorists reached Mumbai also had a GPS phone. This GPS’s packing cartons was also found in the house in Karachi. The GPS number, model, date of packing matches a specifications of the GPS found on the Kuber. With these new evidences India’s case against Zaki-ur-Rehman, Lakhvi and six other terrorist involved in the Mumbai attacks will become stronger. As the Chicago case proceeds new facts are likely to emerge which will prove the involvement of the Pakistan army and ISI.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: भ्रष्ट जजों को बाहर फेंको

Vir Arjun, Hindi Daily Newspaper Published from Delhi
 प्रकाशित: 14 मई 2011
-अनिल नरेन्द्र
दिल्ली की अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (एडीजे) अर्चना सिन्हा का एक फैसला उन्हें इतना भारी पड़ेगा यह उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के लिए एडीजे अर्चना सिन्हा को न केवल तगड़ी लताड़ ही लगाई बल्कि नाराज बैंच ने दिल्ली हाई कोर्ट को अर्चना सिन्हा के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का भी आदेश दिया। मामला कुछ यूं है। सुप्रीम कोर्ट ने 6 अक्तूबर 2010 को अपने आदेश में किरायेदार उधम जैन चैरिटेबल ट्रस्ट, मध्य दिल्ली की याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद भी दिल्ली की अतिरिक्त जिला न्यायाधीश अर्चना सिन्हा ने किरायेदार को बाहर करने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी। इस पर नाराज बैंच ने कहा कि अर्चना सिन्हा को कोई अधिकार नहीं है कि वह हमारे आदेश को नकार दे और खुद को `सुपर सुप्रीम कोर्ट' साबित करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कहने को विवश होना पड़ रहा है कि अधीनस्थ न्यायपालिका का एक बाहरी हिस्सा बाहरी फायदों के चलते आदेश पारित कर पूरी न्यायपालिका की ख्याति धूमिल कर रही है।
जस्टिस मार्केंडय काटजू ने अपने फैसले में लिखा, `हम उन आरोपों पर कुछ नहीं कहना चाहते जिनमें अधीनस्थ न्यायपालिका क्या कर रही है, यह बताया जाता है। लेकिन हम यह जरूर चाहते हैं कि इस तरह का कदाचार पूरी तरह से खत्म होना चाहिए। अधीनस्थ न्यायपालिका में मौजूद इस तरह के जजों ने पूरी संस्था को बदनाम कर दिया है और इन्हें न्यायपालिका से बाहर फेंक देना चाहिए।' एक समय बैंच ने जज को मौखिक चेतावनी दी और उसे जेल भेज दिया जाएगा या निलम्बित कर दिया जाएगा, लेकिन जज सिन्हा के बार-बार माफी मांगने और दया दिखाने की याचना करने पर मामला अगली कार्रवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया। जस्टिस मार्केंडय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा की बैंच ने कहा, `आप सुप्रीम कोर्ट को मजाक में नहीं ले सकते। लोग जजों को संदेह की नजर से देखते हैं। कहा जाता है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के 80 प्रतिशत सदस्य भ्रष्ट हैं जो बहुत ही शर्मनाक है। हमारे सिर शर्म से झुक गए हैं।'
सुप्रीम कोर्ट की इस लताड़ से हम उम्मीद करते हैं कि निचली अदालतें कुछ सीख लेंगी और भविष्य में ऐसी कोई गुस्ताखी नहीं करेंगी जो जज अर्चना सिन्हा ने की है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि 80 प्रतिशत अधीनस्थ न्यायपालिका सदस्य भ्रष्ट हैं, भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट निचली अदालतों में क्या चल रहा है पूरी तरह वाकिफ है और यह टिप्पणी शायद इनमें थोड़ा सुधार करे पर इस दिशा में अभी और बहुत कुछ करना पड़ेगा ताकि निचली अदालतों में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सही दिशा में एक सही कदम जरूर है।