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Thursday, 5 April 2018

लोकतांत्रिक समाज में हिंसा समाधान नहीं

दलितों, आदिवासियों का उत्पीड़न एक सामाजिक सच्चाई है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता और इसे दूर करने की भी सख्त आवश्यकता है पर जो तरीका इसको करने में अपनाया गया है वह सही नहीं माना जा सकता। हिंसा की न तो गुंजाइश है और न ही यह सफल हो सकता है। भारत बंद भले ही न हुआ हो, लेकिन हिल जरूर गया है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के बारे में सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला पिछले दिनों आया, उसे लेकर दलित समुदाय में काफी आक्रोश है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि इस कानून में सिर्प प्राथमिकी के आधार पर जो गिरफ्तारी होती है, वह गलत है। आदर्श स्थिति तो शायद यह होती है कि सुप्रीम कोर्ट अगर किसी मसले पर कोई फैसला दे दे तो या तो उसे मान लिया जाए और नहीं तो उसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाली जाए। इस पर पुनर्विचार याचिका डाल भी दी गई है और इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्टीकरण दे दिया है। यह अलग मुद्दा है। ऐसा नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले के खिलाफ जनता पहली बार सड़कों पर उतरी हो। लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि यह न तो लाठी और बल से चलता है और न ही अनैतिक क्रियाकलापों से। लोकतंत्र की संचालन शक्ति सामाजिक और आर्थिक न्याय है और उसे अदालती स्तर पर ही नहीं बल्कि अन्य संस्थाओं के स्तर पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही हमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी समझने की कोशिश करनी होगी। दुनियाभर के नागरिक अधिकार संगठन, मानवाधिकार संस्थाएं हमेशा से यह कहती हैं कि अगर किसी भी गैर-नृशंस अपराध में सिर्प एफआईआर के आधार पर गिरफ्तारी का प्रावधान है तो उसका दुरुपयोग होगा। ऐसा हमने दहेज विरोधी कानून में भी देखा है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की रिव्यू पिटीशन पर टिप्पणी की कि हमने एससी/एसटी एक्ट को कमजोर नहीं किया है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उन्होंने फैसले को सही से पढ़ा ही नहीं या फिर निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा उन्हें गुमराह कर दिया गया है। हमने यही कहा है कि निर्दोष व्यक्तियों को सजा नहीं मिलनी चाहिए। भारत बंद में 15 राज्यों में प्रदर्शन हुए। इस दौरान हिन्दी बेल्ट के 10 राज्यों में उपद्रव के दौरान 13 लोगों की जानें गईं। दरअसल राजनीतिक दल दलित वोटों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। देश में 17 प्रतिशत दलित वोट हैं और 150 से अधिक लोकसभा सीटों पर दलितों का प्रभाव है। इसलिए आंदोलन के साथ सभी पार्टियां खड़ी हैं। जिन 12 राज्यों में हिंसा हुई वहां एससी/एसटी वर्ग से 80 सांसद हैं। दलितों को अपनी राय प्रकट करने का पूरा अधिकार है पर यह तरीका सही नहीं माना जा सकता।

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