Translater
Tuesday, 6 September 2022
पत्रकार आतंकी नहीं हैं
सुप्रीम कोर्ट ने रंगदारी के एक मामले में झारखंड पुलिस के एक स्थानीय हिन्दी पत्रकार अरूप चटजा के घर रात में पहुंचने और उन्हें गिरफ्तार करने से पहले बैडरूम से घसीटकर बाहर लाने की घटना की निन्दा की है। कोर्ट ने कहा कि पत्रकार आतंकवादी नहीं हैं। शीर्ष अदालत ने पुलिस कार्यंवाही को राज्य की ज्यादती बताते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि झारखंड में पूरी तरह अराजकता व्याप्त है। जस्टिस डीवाईं चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की बैंच ने पत्रकार को अंतरिम जमानत देने के झारखंड हाईं कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
बैंच ने कहा—हमने मामले के तथ्यों को देखा है। ऐसा लगता है कि झारखंड में पूरी तरह अराजकता व्याप्त है। कोर्ट ने घटना पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए झारखंड के अतिरिक्त महाधिवक्ता अरुणम चौधरी से कहा—आप आधी रात को एक पत्रकार का दरवाजा खटखटाते हैं और उसे बैडरूम से बाहर निकालते हैं। यह बहुत ज्यादा है। आप ऐसा एक ऐसे व्यक्ति के साथ कर रहे हैं जो पत्रकार है और पत्रकार आतंकवादी नहीं हैं। शीर्ष अदालत ने कहा—हाईं कोर्ट ने सही तरह से एक विस्तृत आदेश के जरिये पत्रकार को अंतरिम जमानत दी, जिसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। न्यायाधीशों ने मामले का निपटारा करते हुए चौधरी से कहा—क्षमा करें, हम आपकी याचिका पर विचार नहीं करने जा रहे हैं। चूंकि यह एक अंतरिम आदेश है और मामला वहां लंबित है, आप जाकर हाईं कोर्ट से बात करें। चौधरी ने आरोप लगाया कि पत्रकार अरुप चटजा ब्लैकमेल करने और जबरन वसूली जैसी गतिविधियों में शामिल रहे हैं और उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। इस पर बैंच ने कहा कि वह भाग्यशाली हैं कि तीन दिन में बाहर आ गए, अन्यथा उनके जैसे लोगों को जमानत से पहले दो-तीन महीने जेल में बिताने पड़ते हैं। हाईं कोर्ट द्वारा 19 जुलाईं को चटजा को दी गईं जमानत के खिलाफ झारखंड सरकार ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अरुप चटजा की पत्नी और चैनल के निदेशक बेबी चटजा ने हाईं कोर्ट का रुख किया था और दावा किया था कि उनके पति को 16-17 जुलाईं, 2022 की मध्यरात्रि को उनके रांची स्थित आवास से रात 12:20 बजे गिरफ्तार किया गया जो दंड प्राव््िराया संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन है।
——अनिल नरेन्द्र
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