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Tuesday, 21 November 2017

पद्मावती की रिलीज पर संकट के बादल

बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली की एक सौ अस्सी करोड़ रुपए की लागत से बनी महत्वाकांक्षी और बहुचर्चित फिल्म पद्मावती को लेकर उभरा विवाद जिस तरह चल रहा है उससे फिल्म का तय समय पर रिलीज होना मुश्किल लग रहा है। फिल्म रिलीज होने से पहले ही विवादों में घिर गई है। फिल्म को एक दिसम्बर को रिलीज करने की योजना थी लेकिन अभी तक इसे सेंसर बोर्ड के पास नहीं भेजा गया है। यह फिल्म तभी विवादों में आ गई थी जब राजस्थान में उसकी शूटिंग के समय सेट पर करणी सेना ने तोड़-फोड़ करके अपनी मंशा जाहिर कर दी थी। करणी सेना और अखिल भारतीय क्षत्रिय युवा महासभा की आपत्ति इस बात पर है कि भंसाली ने पद्मावती के चरित्र को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। शूटिंग के टाइम जब तोड़-फोड़ हुई तो संजय लीला भंसाली ने नाराज लोगों को यह आश्वासन दिया था कि फिल्म में कुछ भी प्रचलित मान्यताओं के विपरीत नहीं होगा, लेकिन जब फिल्म पद्मावती का ट्रेलर आया तो लोगों को यही लगा कि उन्हें दिए गए आश्वासन को पूरा नहीं किया गया। जिस तरह यह समझना कठिन है कि पद्मावती के मान-सम्मान को लेकर चिंतित लोग फिल्म की विषयवस्तु आने और उसे देखे बिना इस नतीजे पर कैसे पहुंच गए कि उनका चित्रण सही तरह से नहीं किया गया है उसी तरह यह भी फिल्मकारों की ओर से इस काल्पनिक अंदेशे को दूर करने में तत्परता का परिचय क्यों नहीं दिया? ऐसा भी लगता है कि कुछ लोग ऐसे हैं जिनको दिलचस्पी इस विवाद को तूल देने में है। क्या इसलिए कि हंगामा होता रहे और मुफ्त का प्रचार मिलता रहे? ऐसे सवाल इसलिए भी उभरे हैं क्योंकि फिल्म निर्माता सेंसर बोर्ड की हां या न का इंतजार किए और यहां तक कि उसे सही तरह फिल्म की प्रति सौंपे बगैर कुछ चुनिन्दा लोगों को फिल्म दिखाना पसंद करते हैं, लेकिन इनमें वे लोग शामिल नहीं होते जो सबसे ज्यादा आपत्ति प्रकट कर रहे होते हैं? आखिर सेंसर बोर्ड से पहले फिल्म को मीडिया के  चुनिन्दा लोगों को दिखाने और उनके जरिये जनता को संदेश देने का क्या मतलब निकाला जाए। फिल्म निर्माता के रवैये पर सेंसर बोर्ड की आपत्ति सर्वथा उचित है। राजस्थान और साथ ही देश के अन्य हिस्सों में आज पद्मावती का विरोध हो रहा है। बेशक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए लेकिन इसी के साथ किसी को कला और रचनात्मकता के नाम पर धार्मिक सांस्कृतिक प्रसंगों एवं मान्यताओं के निरादर की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। कुछ लोग पूरे विवाद को इसमें उलझाने का प्रयास कर रहे हैं कि इतिहास में पद्मावती का पात्र मिलता ही नहीं। महत्वपूर्ण यह नहीं कि पद्मावती थी या नहीं? महत्वपूर्ण यह है कि फिल्म में क्या आपने पद्मावती का चरित्र वैसा ही दिखाया है जैसी मान्यता है? निस्संदेह मिथ्या धारणाओं को तोड़ने का काम किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करते समय लोगों को जानबूझ कर उद्वेलित-आक्रोशित करने का कोई मतलब नहीं। आमतौर पर ऐतिहासिक फिल्में हूबहू तथ्यों पर आधारित नहीं होतीं। फिल्म को मनोरंजक बनाने के लिए निर्माता-निर्देशक मसाले का तड़का लगाकर पेश करते हैं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि इतिहास को ऐसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाए कि किसी समुदाय की भावना आहत हो। भारत जैसे संकीर्ण और जातीय श्रेष्ठता पर गुमान करने वाले समाज में फिल्म निर्माताओं को खासतौर पर एहतियात बरतने की समझ होनी चाहिए। लेकिन संजय लीला भंसाली और दीपिका के खिलाफ जिस तरह का फतवा जारी किया गया है, उसकी भर्त्सना होनी चाहिए। किसी भी सभ्य और आधुनिक समाज में विरोध का यह तरीका स्वीकार्य नहीं। जो लोग भी शक्ति प्रदर्शन करने के साथ मनमानी कर रहे हैं वे न तो अपना भला कर रहे हैं और न ही समाज का। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कोई फिल्म प्रदर्शन के योग्य है या नहीं, इसे तय करने का अधिकार केवल सेंसर बोर्ड का है और यह काम उसे ही करने दिया जाना चाहिए।

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