Saturday, 22 September 2018

महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति

संसद के मानसून सत्र में तीन तलाक बिल पास न हो पाने के बाद अब केंद्र सरकार ने दूसरा रास्ता निकाला है। कुल तीन संशोधनों के साथ तीन तलाक (तलाक--बिद्दत) को कानूनी रूप देने के लिए केंद्र सरकार ने अध्यादेश पास कर दिया है। अब मार्च 2019 तक इसे ही कानून की तरह बरता जाएगा। कुछ समय पहले केंद्र सरकार ने लोकसभा में इस आशय का जो बिल पास करवाया था, उसके कुछ पहलुओं पर विवाद था। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने तीन तलाक पर सुनवाई करते हुए इसे असंवैधानिक बताया था और संसद को इस पर कानून बनाने के लिए कहा था।  लेकिन लोकसभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में यह अटक गया, तो सरकार अब यह अध्यादेश लाई है और छह महीने में इसे संसद में पारित कराने की बाध्यता तो रहेगी ही। मुस्लिम संगठनों और कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दलों के विरोध को देखते हुए अध्यादेश में कुछ बदलाव किए गए हैंöजैसे तीन तलाक के मामले में गिरफ्तारी तभी होगी, जब इसकी शिकायत पत्नी या खून की रिश्तेदारी में से कोई करेगा। ऐसे ही महिला अगर चाहे तो समझौते का विकल्प खुला हैöइसके तहत पत्नी का पक्ष सुनने के बाद मजिस्ट्रेट पति को जमानत दे सकता है। कुल मिलाकर इसके प्रावधानों को अपेक्षाकृत लचीला बनाया गया है। जो बिल सरकार ने लोकसभा में पास करवाया था उसमें प्रावधान था कि केस कोई भी दर्ज करके बगैर वारंट के गिरफ्तारी हो सकती है। यह गैर-जमानती संज्ञेय अपराध था, जिसमें समझौते का कोई प्रावधान नहीं था। इन प्रावधानों को लेकर सशंक्ति विपक्ष ने मांग की थी कि बिल को चयन समिति के पास भेजा जाए ताकि हर पहलू पर विचार हो सके। जब अधिकांश मुस्लिम देशों ने एक साथ बोलकर दिए जाने वाले तीन तलाक को अपने यहां खत्म कर दिया है, तब भारत में इसके बरकरार रहने का कोई औचित्य ही नहीं है। यह दुख की बात है कि आजादी के बाद हमारे यहां हिन्दू महिलाओं को तो विवाह, उत्तराधिकार आदि से जुड़े कानूनी अधिकार प्रदान किए गए, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को इससे रिएक्शन के डर के कारण अलग रखा गया। निश्चय ही मुस्लिम महिलाओं के लिए कानून की तरह यह अध्यादेश भी मील का पत्थर साबित होने वाला है। हां, इसके संज्ञेय अपराध बनाए जाने से डर आज भी कायम है। जैसे केस दर्ज होते ही तीन तलाक देने वाले को जेल हो जाएगी तो पीड़िता को गुजारा-भत्ता कौन देगा? पति की सम्पत्ति कुर्प करने का रास्ता जरूर खुला है, लेकिन यह भी गुजारा-भत्ते की जिम्मेदारी तय करने के जितना ही लंबा है और घुमावदार है। ऐसे में पीड़िता की तकलीफ और बढ़ सकती है और उसे अलग तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। आधुनिक विश्व में और वह भी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के लिए अलग-अलग नियमों की इजाजत नहीं दी जा सकती। वैसे भी ऐसे नियमों की तो कमी नहीं जो महिलाओं को शोषण का शिकार बनाते रहें। ऐसे में इस पर आम सहमति बनाने की कोशिश बेहतर रहेगी।

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