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Thursday, 5 December 2013

नाबालिग क्या इसी वजह से साफ छूट जाए क्योंकि वह 18 साल से कम है?

जब 16 दिसम्बर 2013 को वसंत विहार गैंग रेप कांड हुआ था, मैंने तभी इसी कालम में लिखा था कि इस हत्याकांड के मास्टर माइंड को इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि वह नाबालिग है। उसकी उम्र 18 साल से थोड़ी कम थी। अब पीड़िता के माता -पिता ने  सुपीम कोर्ट में याचिका दाखिल  की है। सुपीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली गैंग रेप पीड़िता के पिता की एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि आखिर जघन्य अपराधों में शामिल आरोपियों का नाबालिग होना कैसे तय किया जाए? पीड़िता के पिता ने अपनी याचिका में किशोर न्याय एक्ट को रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह  एक्ट संगीन अपराधों में लिप्त किशोरों पर सामान्य मुकदमा चलाने से रोकता है। दिल्ली गैंग रेप का मुख्य नाबालिग आरोपी भी घटना के वक्त साढ़े 17 वर्ष का था जिसे किशोर न्याय बोर्ड ने अधिकतम तीन साल की सजा दी थी। ऐसे में वह बड़ी सजा से बच गया। बहरहाल याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस वीएस चौहान की पीठ ने केन्द्राrय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को चार सप्ताह के अंदर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इस कांड में मुख्य आरोपी की उम्र उसके गांव के स्कूल पिंसिपल के पमाण पत्र के मुताबिक अपराध के वक्त 18 साल से 6 महीने कम थी, इसलिए उसका मुकदमा बाल अदालत में चलाना पड़ा। उसके बाद मुम्बई के चर्चित शक्ति मिल बलात्कार कांड में कम उम्र के अपराधियों की मौजूदगी ने इस बहस को हवा दी। ऐसे और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। मेरा तो हमेशा से मानना रहा है कि जब अमुक व्यक्ति ऐसे घिनौने कांड की प्लानिंग कर सकता है, उस पर अमल कर सकता है जो बालिगों की तरह हो तो वह नाबालिग कहां रह गया? उसकी उम्र का जुर्म से कोई ताल्लुक नहीं। यह एडल्ट जुर्म है और सजा भी एडल्टों जैसी होनी चाहिए। इन घटनाओं के मद्देनजर संगीन अपराधों के मामलों में किशोर न्याय कानून पर पुनर्विचार जरूरी हो गया है। मौजूदा कानून में संशोधन जरूरी है, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का पस्ताव है कि जघन्य अपराधों के मामले में नाबालिग की उम्रसीमा  18 साल की बजाय 16 साल तय की जाए। यह स्वागतयोग्य पस्ताव है। 16 दिसंबर कांड के बाद केन्द्र सरकार ने यौन हिंसा संबंधी कानून की समीक्षा के लिए सुपीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर अपराध दंड संहिता में संशोधन के लिए अध्यादेश जारी किया गया है और फिर उस संशोधन को विधेयक के जरिए संसद की भी मंजूरी मिली। भारत में अभी तक 18 साल से कम अपराधियों की वजह से कई समस्याएं पैदा हो रही हैं। एक समस्या तो यह हो रही है कि शातिर अपराधी हत्या या डकैती जैसे गंभीर अपराधों के लिए किशोरों का इस्तेमाल सोची-समझी रणनीति के तहत करने लगे हैं क्योंकि अगर वह पकड़े भी गए तो उन्हें ज्यादा से ज्यादा बाल सुधार गृह में काटने पड़ेंगे। पुलिस का कहना है कि अपराधों में बच्चों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। बाल सुधार गृहों की अलग समस्याएं हैं  इसलिए कुल मिलाकर इस ज्वलंत मुद्दे पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए और नाबालिग की उम्र घटाने पर कानून में संशोधन जरूरी है। 

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