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Sunday, 15 December 2013

तीसरी बार डॉ. हर्षवर्धन के हाथ से सीएम कुर्सी फिसली

अपनी-अपनी राय हो सकती है। मेरी राय में बीजेपी ने दिल्ली में जनादेश को एक तरह ठुकरा दिया। बीजेपी के सीएम कैंडिडेट डॉ. हर्षवर्धन ने उपराज्यपाल को सूचित कर दिया है कि उनकी पार्टी के पास चूंकि बहुमत नहीं है, इसलिए सरकार बनाने में असमर्थ हैं। दिल्लीवासियों से डॉ. हर्षवर्धन ने सरकार नहीं बना पाने के लिए क्षमा याचना में कहा कि राष्ट्रपति ने उपराज्यपाल को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि सरकार बनाने का दावा पेश करने वाली पार्टी को सात दिन के भीतर सदन में बहुमत साबित करना होगा। चूंकि भाजपा के पास बहुमत नहीं है तो वह भला कैसे सरकार बना सकती है। राजनीति में शुचिता, पारदर्शिता और स्वच्छता की दुहाई देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा का किसी अन्य दल में तोड़फोड़ करने का कोई इरादा नहीं है और न ही ऐसी सरकार में विश्वास है। बीजेपी ने हाई मॉडल ग्राउंड, ऊंचे राजनीतिक मापदंड तो स्थापित कर दिए पर आई हुई सत्ता को ठुकरा दिया। दिल्ली में 15 साल विपक्ष में बैठने की शायद बीजेपी को आदत सी बन गई है। यही तो फर्प है कांग्रेस और बीजेपी में। कांग्रेस सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं होती चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े और बीजेपी सत्ता लेने को तैयार नहीं। यह ठीक है कि डॉ. हर्षवर्धन के पास बहुमत नहीं है पर अगर वह एक अल्पमत सरकार बना लेते और शपथ लेते ही इतिहास में अपना नाम लिखवा लेते, सभी विधायक बन जाते। शपथ लेने के बाद वह उपराज्यपाल को पत्र लिखते कि हम चाहते हैं कि शक्ति परीक्षण के बाद अगर हमें बहुमत मिलता है तो यह दो-तीन कदम फौरी उठाए जातेःö बिजली की दरों में 30 फीसदी कटौती, पानी के बिलों में राहत, 9 गैस सिलेंडरों की जगह 12 सिलेंडर इत्यादि-इत्यादि। बहुमत सिद्ध करने की जब बारी आती तो संभव था कुछ भी हो सकता था। न तो कांग्रेस और न ही आप के विधायक और न ही दिल्ली की जनता छह महीने में दोबारा चुनाव चाहती है। संभव है कि मतदान के दिन कांग्रेसी विधायक सदन से किसी न किसी बहाने वाकआउट कर जाते, कुछ भी हो सकता था। मान लो बहुमत न भी सिद्ध होता तो त्यागपत्र दे देते और जनता से कह सकते थे कि हम तो जनहित में बहुत से कदम उठाना चाहते थे पर कांग्रेस और आप ने हमें ऐसा करने से रोका (दोबारा) चुनाव में पार्टी की स्थिति और मजबूत होती। बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए थी इस मत के बहुत से बीजेपी विधायक भी हैं। दिल्ली अध्यक्ष विजय गोयल तो खुलकर बोल रहे हैं कि बीजेपी को राजधानी में सरकार बनाने के प्रयास जारी रखना चाहिए। उनका कहना है कि पार्टी के चुने गए अधिकतर प्रतिनिधि चुनाव नहीं चाहते। इसके अलावा जनता भी दोबारा चुनाव के मूड में नहीं है। डॉ. हर्षवर्धन के इंकार के बावजूद विजय गोयल का कहना है कि पार्टी को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए प्रयास जारी रखने चाहिए और इसके लिए आम आदमी पार्टी से बातचीत करनी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस चुनाव में जीते हुए अधिकतर पार्टी उम्मीदवार उनसे आकर गुजारिश कर रहे हैं कि दिल्ली में दोबारा चुनाव न होने देने के लिए कवायद की जानी चाहिए और बीजेपी को सरकार बनानी चाहिए। बहुमत न मिलने के बावजूद खबरों के अनुसार भाजपा विधायकों का भी दबाव था कि भाजपा सरकार बनाए, लेकिन पार्टी आलाकमान के आगे उनकी एक न चली। ऐसे विधायकों की संख्या एक दर्जन से अधिक बताई जा रही है। बुधवार देर रात उपराज्यपाल नजीब जंग के आमंत्रण के बाद बृहस्पतिवार को भाजपा के विधायक पार्टी नेताओं से सम्पर्प साधते रहे। हालांकि विधायक दल के नेता डॉ. हर्षवर्धन सुबह ही छत्तीसगढ़ के लिए रवाना हो गए थे, लेकिन विधायकों ने अपने प्रदेश स्तरीय नेताओं से इच्छा जाहिर की। प्रदेश पदाधिकारियों ने प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल से कहा कि सरकार बनाकर भाजपा को उम्मीद पैदा करनी चाहिए कि वह अल्पमत की सरकार में बेहतर प्रशासन दे सकती है। जब बहुमत साबित करने की बात आएगी तो डॉ. हर्षवर्धन सदन में यह साबित करें कि वह बेहतर सरकार देना चाहते हैं। दिल्लीवासियों को महंगाई से फौरी राहत देना चाहते हैं लेकिन दूसरे दलों के विधायकों ने साथ नहीं दिया, इसलिए वह इस्तीफा देने पर मजबूर हैं। यह तीसरा मौका है जब डॉ. हर्षवर्धन के हाथ से दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी फिसली है। इससे पहले भी दो बार उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी थी लेकिन आखिरी वक्त में पासा पलट गया। पहली बार डॉ. हर्षवर्धन का मुख्यमंत्री बनने का मौका तब आया था जब वर्ष 1993 से 1998 तक चली भाजपा सरकार के दौरान हालत बिगड़ने लगे थे। साहिब सिंह वर्मा को कुर्सी गंवानी पड़ी थी। उस समय तय हो गया था कि पार्टी हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री बनाएगी लेकिन आखिरी वक्त में प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा को भाजपा के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। उस समय भी पार्टी की जीत के पूरे आसार थे लेकिन नतीजा उल्टा हुआ। दूसरा मौका 2008 में आया तब भी डॉ. साहब के हाथ से कुर्सी खिसक गई। राजनीति का अंतिम पड़ाव सत्ता होता है इसीलिए तो आप सियासत में आते हो। भले ही आप की सरकार गिर जाती पर आप को कोशिश तो करनी चाहिए थी। कटु सत्य तो यह भी है कि कांग्रेस पार्टी छह महीने के अन्दर दिल्ली में फिर से विधानसभा चुनाव कतई नहीं चाहेगी। चुनाव में करारी हार के दंश से कांग्रेस अभी उभर भी नहीं पाई है और दोबारा चुनाव की आशंका ने पार्टी के लिए नेतृत्व का संकट खड़ा कर दिया है। कांग्रेस किसी भी कीमत पर सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने की भी पहल कर रही है। दरअसल कार्यवाहक मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं के चुनाव हारने के कारण कांग्रेस प्रदेश इकाई में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। सूत्रों की मानें तो शीला जी के नेतृत्व में पार्टी दोबारा चुनाव मैदान में नहीं उतरना चाहती है। साथ ही चार राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों को बदलने के पार्टी हाई कमान के फैसले को अमल में लाने के लिए भी दिल्ली राह का रोड़ा बन रही है। कांग्रेस आलाकमान मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष जेपी अग्रवाल की जगह ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहती है जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा सके। मौजूदा हालत में अगर दिल्ली में निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव होते हैं तो कांग्रेस को इतनी भी सीटें न मिले। रही बात भाजपा की तो इस बात की क्या गारंटी है कि दोबारा चुनाव में उसे स्पष्ट बहुमत मिले? अगर छह महीने बाद भी त्रिशंकु विधानसभा आई तो...? दिल्ली की गद्दी तक नरेन्द्र मोदी को पहुंचाने की खातिर भाजपा नेतृत्व ने डॉ. हर्षवर्धन और पार्टी की दिल्ली इकाई को दांव पर लगा दिया है। हो सकता है, वह सही साबित हो और मैं गलत। राजनीति में कुछ भी हो सकता है। इस अनिश्चितता के चलते दिल्ली की जनता महंगाई की मार से पिस रही है। महंगाई और बढ़ गई है।

-अनिल नरेन्द्र

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