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Friday, 20 December 2013

अंतत लोकपाल बिल का अन्ना का सपना पूरा हुआ

46 सालों की कोशिशों के बाद आखिरकार देश को अब ऐतिहासिक लोकपाल कानून लगभग मिल गया है। राज्यसभा ने पहले ही पास कर दिया, बुधवार को लोकसभा ने भी लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक 2013 को ध्वनिमत से पारित कर दिया। समाजवादी पार्टी को छोड़कर बाकी अन्य दलों विशेषकर भाजपा, वाम और बसपा आदि ने विधेयक का समर्थन किया। विधेयक का विरोध कर रहे सपा सदस्य सदन से वाकआउट कर गए। 2011 में जब अन्ना हजारे लोकपाल को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे तभी से यह लगने लगा था कि वह दिन दूर नहीं जब सरकार व राजनीतिक दलों को जनता की मांग को स्वीकार करना होगा। आज अगर यह कानून बनने जा रहा है तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय अन्ना हजारे को जाता है। यह उन्हीं के संघर्ष का नतीजा है। कांग्रेस और भाजपा ने भी इसका समर्थन करके अच्छा काम किया। इस क्रम में हमें कांग्रेसी सांसद व संसदीय प्रवर समिति के अध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी को नहीं भूलना चाहिए। चतुर्वेदी की प्रशंसा करना सियासी दल भी नहीं भूले। नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा कि दो साल पहले 27 दिसम्बर 2011 को इस सरकार ने लोकपाल विधेयक पर कन्नी काट ली थी। जेटली ने कहा कि विधेयक पर आम सहमति बनाने के लिए प्रवर समिति के अध्यक्ष सत्यव्रत चतुर्वेदी  ने पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर कड़ी मेहनत की। जेटली के बाद सभी वक्ताओं ने चतुर्वेदी के प्रयास की सराहना की। दरअसल जब सरकार ने विपक्षी दलों की आशंकाओं को दूर कर दिया और उनके तकरीबन सारे सुझाव नए विधेयक में डाल दिए गए तो विधेयक के रुकने का कोई सवाल ही नहीं था। बेशक लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार पूरी तरह से नहीं रुकेगा पर यह सही दिशा में एक सही कदम तो है ही। सबसे बड़ी बात मेरी राय में इस विधेयक से हर स्तर पर पहली बार नेताओं, अफसरों इत्यादि की जवाबदेही तय होगी। अब तक तो किसी की किसी स्तर पर जवाबदेही ही नहीं थी। जैसा अन्ना ने कहा अब मैं खुश हूं। 50 प्रतिशत भ्रष्टाचार तो मिटेगा। संसद की मंजूरी के बाद विधेयक राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। उनके हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाएगा। राज्यों में लोकपाल की तर्ज पर लोकायुक्त बनेंगे। इसके लिए संबंधित राज्यों को कानून बनाने के लिए 365 दिन का समय दिया गया है। संशोधित लोकपाल बिल में प्रमुख प्रावधान कुछ इस प्रकार हैंöलोकपाल की जांच के दायरे में प्रधानमंत्री, सांसद और केंद्र सरकार के समूह ए, बी, सी, डी के अधिकारी और कर्मचारी आएंगे। लोकायुक्त के दायरे में मुख्यमंत्री, राज्यों के मंत्री, विधायक और राज्य सरकार के अधिकारी होंगे। लोकपाल को कुछ मामलों में दीवानी अदालत के अधिकार भी होंगे यानि यह सजा तक दे सकता है। लोकपाल के पास भ्रष्ट अधिकारी की सम्पत्ति को अस्थायी तौर पर अटैच करने का अधिकार होगा। विशेष परिस्थितियों में भ्रष्ट तरीके से कमाई गई सम्पत्ति, आय, प्राप्तियों या फायदों को जब्त करने का अधिकार होगा। केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए उतनी विशेष अदालतों का गठन करना होगा जितनी लोकपाल बताए। अगर एक साल के समय में सुनवाई पूरी नहीं हो पाती तो विशेष अदालत इसके कारण दर्ज करेगी और सुनवाई तीन महीने में पूरी करनी होगी। यह अवधि तीन-तीन महीने के हिसाब से बढ़ाई जा सकती है। यह एक ऐतिहासिक कदम है और इसका असर जरूर होगा।

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