Sunday, 16 December 2018

सुषमा स्वराज जी हमें यहां से निकालें

हाथ जोड़ के बेनती है मां जी सानू ऐथो कड्ड लो। नरक तो वी माड़ी जिन्दगी कट रहे आं ऐथे। साडी कोई सुनदा ऐथे। कंपनी नू कैंहदे आं तां सानू दूजी कंपनी विच चले जाण लई कह देंदे ने। जिन्हा दे तां इन्हां तो वी माड़े हाल ने। कोई सुनण वाला नहीं। यह बात गोराया के 29 साल के अवतार Eिसह ने भास्कर के रिपोर्टर से फोन पर की। अवतार सिंह दो साल से सऊदी अरब के रियाद में फंसा है। होशियारपुर के शशि ने बताया कि अगर एम्बेसी में जाते हैं तो कहा जाता है कि कंपनी हाथ खड़े करती है तो ही आपको इंडिया भेजा जा सकता है। सऊदी अरब के रियाद, जम्बो, युद्ध, कसीन के शहरों में फंसे पंजाब के युवकों की इतनी दुर्दशा है कि सुनकर भी दुख होता है। अवतार सिंह बताता है, (उन्हीं के शब्दों में) लेबर कोर्ट तों ले के लोकल पुलिस तक सारेआं अगे पेश हो के वेख लेआ पर ओ वी साडी नहीं सुणदे। हुण ना साडे कोल पासपोर्ट है ते न ही एकामा (एक तरह का पास या वीजा), कोई मैडिकल कार्ड वी साडे कोल नहीं। बहुत बुरा हाल है। वीजा नां होण करके जे असीं बाहर जाने आं तां पुलिस फड़ लैंदी है। की दसिए इक कमरे विच असीं 15-15 बंदे रह रहे आं। पता नहीं केहड़े वेले सानूं कौण फड़ के ले जावे, इत्थे दा पाणी समुंद्री है तो पाणी खराब होण करके किसी नूं लकवा हो चुक्का है तां किसे दी चमड़ी गलण लगी है। मैडिकल खत्म होण करके असीं अपणा इलाज वी नईं करवा सकदे। असीं सारे तुहाडे अगे हत्थ जोड़दें आं कि साडी गल सुषमा स्वराज जी कोल पहुंचाओ। बस ओहणा तो अलावा होर कोई चारा नहीं साडे कोल। सऊदी अरब में साइप्रस की जे एंड पी कंस्ट्रक्शन कंपनी से भारत के तीन हजार से अधिक नागरिक काम कर रहे थे। इनमें से लगभग 1200 युवक पंजाब के अलग-अलग जिलों के हैं और उनमें से 500 से 600 युवक जालंधर, होशियारपुर के। बलविन्दर ने बताया कि वह 2008 में जालंधर स्थित एक एजेंट के जरिये दुबई जे एंड पी कंपनी में काम करने गया था। 2012 में कंपनी के नए प्रोजेक्ट के चलते वह सऊदी अरब आ गया। तीन साल तक कंपनी की तरफ से मैडिकल कार्ड, एकामा (वीजा) और सैलेरी टाइम पर दी जा रही थी। मगर एक साल से वह काम कर रहे हैं, जिसके बदले न तो सैलेरी दी जा रही थी और न ही मैडिकल कार्ड बनाया जा रहा है। रियाद में फंसे अधिकतर युवकों के पास न तो पासपोर्ट है और न ही एकामा। अगर बिना एकामा बाहर जाते हैं तो पुलिस पकड़ लेती है। कंपनी एकामा बनवाने के लिए 8000 रियाल (1.50 लाख रुपए) मांगती है। दूसरी कंपनी में तो 12 घंटे काम करवाते हैं और आठ घंटे के पैसे दिए जाते हैं। पहले से काम कर रही लेबर को कई महीने से सैलेरी भी नहीं मिली। इन्हें बचाया कैसे जा सकता है? सरकार या तो भेजने वाले एजेंटों को पकड़े या फिर उन कंपनियों को मजबूर करे कि वह इन फंसे हुए युवकों को बचाए। सुषमा जी को इन्हें बचाना होगा।

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