Saturday, 22 December 2018

गब्बर सिंह टैक्स (जीएसटी) पर सरकार जागी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के सलैब से जुड़े प्रधानमंत्री के एक बयान को लेकर बृहस्पतिवार को उन पर निशाना साधा और कहा कि उनकी पार्टी ने गब्बर सिंह टैक्स पर प्रधानमंत्री को गहरी नींद से जगा दिया है, लेकिन अब भी वह हल्की झपकी ले रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के जिस विचार को ग्रैंड स्टुपिड थॉट (बेहद बकवास विचार) कहा था, अब उसी को लागू करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जी, देर आए दुरुस्त आए। दरअसल प्रधानमंत्री ने मंगलवार को संकेत दिया था कि आने वाले समय में 99 प्रतिशत वस्तुओं पर जीएसटी 18 प्रतिशत सलैब में आ सकती है। जीएसटी को जिस उद्देश्य से लागू किया गया था, वह उद्देश्य अभी तक पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। इसके एक देश, एक टैक्स और सरल बताया गया था, लेकिन अब तक इसमें कोई सरलता नहीं दिखी है। न ही इसे स्पष्ट तौर पर एक टैक्स कहा जा सकता है। इतना ही नहीं, न केवल सरकार बल्कि इसके मंत्री और अधिकारी भी जीएसटी की पॉलिसी को लेकर स्पष्ट नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वे स्वयं ही किसी उलझन में हैं, जो यह समझ नहीं पाते कि किस पॉलिसी को लागू करने पर उसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे? सार यह है कि जीएसटी में सुधार के लिए अभी बहुत काम करना है, जीएसटी सिम्पल नहीं बल्कि एक पेचीदा सिस्टम है जिसे असल में सरल बनाना बाकी है। तकनीकी पहलुओं पर भी सुधार की बेहद जरूरत है। खासतौर पर वेबसाइट में सुधार करने की। छोटे व्यापारियों को ध्यान में रखते हुए सरकार को चाहिए कि छोटे-छोटे जीएसटी केंद्र खोले जाएं, जहां व्यापारियों के लिए रिटर्न दाखिल करने की सुविधा हो या वे अपना टैक्स जमा कर सकें। अखबारों के लिए अति आवश्यक न्यूज प्रिन्ट पर जीएसटी इतिहास में पहली बार मोदी सरकार ने लगाया है। इसके कारण देशभर में सैकड़ों अखबार बंद हो गए हैं, कागज मिलें प्रभावित हुई हैं और हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। अखबार एक मिशन है, जनता के विचार प्रकट करने, सरकार को विभिन्न मुद्दों पर सुझाव देने के लिए। आप अगर अखबार ही बंद करवा देंगे तो आप जनता से बिल्कुल कट जाएंगे। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर अकेले कोई भी सरकार निर्भर नहीं हो सकती है। चैनल अधिकतर एक खास (अंग्रेजी भाषा) के दर्शकों को प्रभावित करता है। पर यह अधिकतर वोट नहीं देते। वोट देने वालों को स्थानीय भाषा के छोटे अखबार ज्यादा प्रभावित करते हैं। सरकार को न्यूज प्रिन्ट से जीएसटी बिल्कुल हटा लेना चाहिए। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह  पहली बार है कि मोदी सरकार ने न्यूज प्रिन्ट पर टैक्स लगाया है और इससे हजारों परिवारों को सीधा प्रभावित किया है।

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