Saturday, 29 December 2018

महासेतु से चीन सीमा तक पहुंच आसान हुई

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 94वीं जयंती पर पीएम मोदी ने मंगलवार को देश का सबसे लंबा बोगीबील रेल-सड़क पुल जनता को समर्पित किया। इस मौके पर उन्होंने तिनसुखिया-नाहरलगुन इंटरसिटी एक्सप्रेस की शुरुआत भी की। 9.94 किलोमीटर लंबे इस पुल का निर्माण अटल सरकार के समय शुरू हुआ था। असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बना यह पुल दक्षिणी किनारे पर डिब्रूगढ़ उत्तरी किनारे पर धीमाजी जिले को जोड़ता है। इस पुल का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि यह देश का सबसे लंबा पुल है, लगभग पांच किलोमीटर लंबा। इसे इतना मजबूत बनाया गया है कि बिना किसी शिकन के यह 120 वर्षों तक साथ निभाता रहेगा। इस परियोजना की आधारशिला पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने 22  जनवरी, 1997 को रखी थी जबकि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में 21 अप्रैल 2002 को इसका काम शुरू हुआ था। कांग्रेस की नेतृत्व वाली सरकार ने 2007 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया था। इनके क्रियान्वयन में देरी के कारण इस परियोजना की लागत 85 फीसद तक बढ़ गई। इसकी अनुमानित लागत 3,230.02 करोड़ रुपए थी जो बढ़कर 5,960 करोड़ रुपए हो गई। लंबे अरसे तक विकास की मुख्य धारा से कटे रहे पूर्वोत्तर में इस पुल का क्या महत्व है, यह इससे समझा जा सकता है कि इसकी वजह से डिब्रूगढ़ और अरुणाचल प्रदेश की राजधानी इटा नगर के बीच की सड़क मार्ग से दूरी 150 किलोमीटर और इन दोनों शहरों के रेलमार्ग की दूरी 750 किलोमीटर कम हो जाएगी। इस पुल के निचले हिस्से में रेल लाइन बनाई गई है और ऊपरी तल में सड़क मार्ग। यह पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों की जिन्दगी को तो आसान बनाएगा ही, साथ ही भारतीय सेना के लिए भी एक अहम इंफ्रास्ट्रक्चर साबित होगा। सेना की जरूरतों को दिखते हुए ही इसको इतना मजबूत बनाया गया है कि इस पर न सिर्प भारी-भरकम टैंकों की आवाजाही हो सकती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर वायुसेना के जेट विमान भी उतारे जा सकते हैं। यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि बोगीबील पुल से कुछ ही आगे भारत और चीन की सीमा है यानि वह जगह, जहां चीन का विस्तारवाद हमेशा से भारत के लिए सिरदर्द बना रहा है। इस लिहाज से यह पुल इस क्षेत्र में सेना को मिली महज एक सुविधा ही नहीं, बल्कि उसे मिला एक नया आत्मविश्वास भी है। पुल का निर्माण विदेशी तकनीक व उपकरणों से हुआ है। इसमें 80 हजार टन स्टील लगा है। रिएक्टर स्केल पर सात की तीव्रता का भूकंप झेल सकता है। इस पुल के अस्तित्व में आने से निश्चित रूप से पूर्वोत्तर में विकास का एक नया फलक खुल गया है, साथ ही यह पुल सामरिक दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं। बधाई।

-अनिल नरेन्द्र

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