Thursday, 25 October 2018

क्या अदालती आदेश से पटाखे चलने बंद होंगे?

सुपीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि सात नवंबर को दिवाली  के पर्व पर पर्यावरण और कारोबार के बीच संतुलन बनाते हुए रात आठ बजे से 10 बजे के बीच ही पटाखे छोड़े जा सकते हैं। मंगलवार को सुनाए गए अपने फैसले में उसने पटाखों की बिकी पर पूरी तरह से बैन लगाने से मना कर दिया है। पर इस बारे में अदालत ने कुछ शर्तें जरूर तय कर दी हैं। अदालत ने साफ किया है कि पटाखे केवल लाइसेंसधारी व्यापारी ही बेच सकते हैं, वह भी पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाने वाले पटाखे। इनकी आनलाइन बिकी पर भी पाबंदी लगा दी गई है। कोर्ट ने दिवाली के दिन पटाखे फोड़ने की समय सीमा भी तय कर दी है। दिवाली जैसे त्यौहार के मौके पर खुशियों का इजहार करने के लिए बेहतर खानपान और रोशनी की सजावट से पैदा जगमग के अलावा कानफोड़ पटाखों का सहारा लोगों को कुछ देर की खुशी तो दे सकता है, लेकिन इसका पर्यावरण पर व्यापक असर होता है। पटाखों की आवाज और धुएं के पर्यावरण सहित लोगों की सेहत पर पड़ने वाले घातक असर के मद्देनजर इनसे बचने की सलाह लंबे समय से दी जाती रही है। ज्यादातर लोग इससे होने वाले नुकसानों को समझते भी हैं, मगर इनसे दूर रहने की कोशिश नहीं करते। खासकर बच्चों में बम फोड़ने का बड़ा चाव होता है। हवाई पटाखे उड़ाने के लिए बोतलों में उसे डालकर मजा लिया जाता है। बेशक पर्यावरणविदों से लेकर कई जागरूक नागरिकों ने इस मामले पर लोगों को समझाने से लेकर पटाखों पर रोक लगाने के लिए अदालतों तक का सहारा लिया है, लेकिन इसमें संदेह है कि इन पर पूरी तरह से रोक लगाना संभव हो। मुश्किल यह है कि उन्हें रोकने के लिए हमारे पास उतनी मैन पावर नहीं है कि वह घर-घर जाकर लोगों को बम फोड़ने से रोक सकें। हां भारी बमों और ऐसे पटाखे जो पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं, जैसे लड़ियां उनको पतिबंधित किया जाए तो शायद इसमें कमी आए। पर फिर सवाल यह भी उठाया जाता है कि पटाखों का व्यापार करोड़ों, अरबों रुपए का है और इसमें लाखों लोग जुड़े हुए हैं। आfिर्थक एंगल से भी देखना पड़ता है। अब इको पेंडली पटाखे भी आ गए हैं। इनसे न तो ध्वनि पदूषण होता है और न ही वायु पदूषण पर यह इतनी मात्रा में नहीं उपलब्ध होते। पटाखों का धुआं और शोर अपने पीछे कई तरह की बीमारियां और पर्यावरण के लिए दीर्घकालिक नुकसान छोड़ जाता है। अगर खुशी जाहिर करने के लिए ऐसे तौर-तरीकों का सहारा लिया जाए जो बिना किसी भेदभाव के पर्यावरण को व्यापक नुकसान नहीं पहुंचाएं उपलब्ध हों तो समस्या का समाधान संभव है। पर समाज को भी कोपरेट करना होगा।

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