Sunday, 21 October 2018

तिवारी का जाना एक उदारवादी युग का अंत

नारायण दत्त तिवारी हमारे बीच नहीं रहे। तिवारी जी का जाना मेरे लिए एक भारी क्षति है। अभी बीमार होने से पहले ही वह मेरे निवास पर उज्ज्वला जी के साथ पधारे थे। लंबे समय से बीमार चल रहे तिवारी जी ने अपनी आखिरी सांस बृहस्पतिवार 18 अक्तूबर को ली। संयोग देखिए कि 18 अक्तूबर को ही उनका 93वां जन्म दिन था। वह 18 अक्तूबर 1925 को पैदा हुए थे और 18 अक्तूबर 2018 को उनका निधन हुआ। एनडी तिवारी को समकालीन भारतीय राजनीति में अलग तरह से देखा जाता है। 17 वर्ष की किशोर आयु में खेल की बजाय नारायण दत्त तिवारी ने आजादी की लड़ाई को चुना। पहले नैनीताल और बाद में बरेली जेल में तिवारी जी ने कई तरह के कार्यों से ब्रिटिश हुकूमत को सीधी चुनौती दी। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से विधायक एवं कांग्रेस में शामिल होने की दास्तान अलग है। वह दो राज्यों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीएम बनने वाले अकेले नेता थे। नारायण दत्त तिवारी का जन्म नैनीताल के बलौटी गांव में हुआ था। उनके पिता पूर्णानंद तिवारी सरकारी विभाग में अफसर थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। एनडी तिवारी की राजनीति में एंटी स्वतंत्रता आंदोलन के जरिये हुई थी। 1947 में आजादी के साल ही वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। देश आजाद हुआ और तिवारी जी उत्तर प्रदेश में 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में नैनीताल से प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। यूपी का पहला चुनाव था और तिवारी ने जीत के साथ झंडा फहराया। इसके बाद से उनका लंबा राजनीतिक कैरियर शुरू हुआ। वह दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे, केंद्रीय वित्तमंत्री रहे। तिवारी ने साल 2014 में उज्ज्वला शर्मा से 88 वर्ष की उम्र में शादी की थी। करीब 60 साल की राजनीतिक यात्रा में एनडी तिवारी ने कई तरह के उतार-चढ़ाव देखे। उनके निजी जीवन में कई पर्सनल विवाद भी पैदा हुए। एनडी तिवारी समकालीन राजनीति के सबसे ज्यादा विनम्र नेताओं में से एक थे। इसी विनम्रता के कारण कई विवादों को उन्होंने विस्फोटक नहीं होने दिया। वह राजनीति में विरोधी एवं अपनी पार्टी के विधायकों व नेताओं को बराबर सम्मान देते थे। हालांकि इस तरह के सम्मान के कारण कई दूसरे विवाद भी पैदा होते रहे। तिवारी की इस राजनीतिक शैली के दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी कायल होने से नहीं बच पाए। 2003 में तिवारी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नैनीताल में जोरदार खैर मकदम किया। इससे अभिभूत अटल जी ने तिवारी को उत्तराखंड के विकास के लिए कई तरह की रियायतें दी थीं। आगे चलकर इन रियायतों ने सिडकुल की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। यही नहीं, योजना आयोग में तिवारी के साथ काम कर चुके पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह के संबंधों का भी तिवारी लाभ लेने से नहीं चूके। तिवारी जी के जाने का हमें बहुत दुख है। भगवान उनकी आत्मा को शांति दें। ओम शांति।

No comments:

Post a comment