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Wednesday, 8 October 2014

मैडल बेशक कम रहे पर फिर भी जश्न रहा एशियाड में

इंडिया को इंचियोन एशियन गेम्स में पिछली बार की तुलना में भले ही कम मैडल आए हों लेकिन फिर भी उसने देशवासियों को जश्न मनाने के कई मौके दिए। 17वां एशियन गेम्स कई मामलों में ऐतिहासिक रहा। पुरुष हाकी टीम ने जहां 48 साल बाद पाकिस्तान को पीटकर 16 साल के लंबे अंतराल को खत्म किया और पुरुष हाकी में गोल्ड मैडल जीता वहीं एमसी मेरीकॉम ने जो तीन बच्चों की मां है, ने शानदार पदर्शन कर सोना जीतने वाली पहली महिला बॉक्सर बनने के साथ अपनी महानता को और विस्तारित किया। योगेश्वर दत्त भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने 28 साल बाद रेसलिंग का गोल्ड जीतकर इतिहास रचा। 4X400 रिले में भार तीय महिलाओं ने गेम्स रिकॉर्ड के साथ लगातार चौथी बार गोल्ड जीतने में कामयाबी पाई। गेम्स के अंतिम दिन कबड्डी में पुरुषों और महिलाओं में दो स्वर्ण पदक जीतकर भारत 11 गोल्ड, 9 रजत और 37 कांस्य कुल मिलाकर 57 मैडल जीतकर आंठवें स्थान पर रहा। अगर सिर्फ मैडलों की संख्या गिनी जाए तो चीन, कोरिया, जापान, कजाकिस्तान, के बाद भारत पांचवें स्थान पर रहा। चीन ने एक बार फिर शानदार पदर्शन किया और अव्वल नंबर पर रहा। मगर भारत की स्थिति ग्वांग्झू में हुए पिछले एशियाड से बेहतर नहीं कही जा सकती जहां उसे 14 स्वर्ण सहित कुल 65 पदक मिले थे। भारत को इस बार 11 स्वर्ण सहित कुल 57 मैडल से संतोष करना पड़ रहा है। पदक तालिका में उठने की बात तो दूर रही भारत को अपना पिछला यानी छठा स्थान बरकरार रखने में भी मुश्किल हो गई। भारत दूसरा सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है। पिछले कुछ वर्षें से यह कहा जाता रहा है कि वह अपने विशाल बाजार के बूते एक बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है या जल्द ही बन जाएगा। पर इस आत्म छवि के बरक्स खेलों में अगर वह फिसड्डी नहीं तो कतार में पीछे खड़ा जरूर दिखता है। इंचियोन में हुए मुकाबले ओलंपिक से नहीं थे, एशिया तक ही सीमित थे पर भारत इसमें भी पहले तीन-चार में जगह नहीं बना सका। चीन, दक्षिण कोरिया और जापान से भारत के पदकों का अंतर काफी है। यह गिरावट क्या बताती है? यही कि खेल में आगे बढ़ने के इरादे और योजनाएं महज जुबानी हैं। हकीकत यह है कि जो चमकती सफलताएं नजर आती हैं। वे हमारे खिलाड़ियों के निजी चयन, पतिभा और लगन का परिणाम है। देश का कथित खेल ढांचा और अधिकारियों को इसका कोई श्रेय नहीं है। बहरहाल ये बातें भी पुरानी हो चुकी हैं पर बड़े खेल आयोजन के बाद इनहें दोहराया जाता है लेकिन सूरत नहीं बदलती। पूर्व यूपीए सरकार ने खेल पशासन ने पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए खेल विधेयक तैयार किया था। इस बारे में एनडीए सरकार का क्या रुख है यह अभी मालूम नहीं है लेकिन इंचियोन के परिणामों का सबक यह है कि उसे इस पश्न पर टालमटोल नहीं करनी चाहिए। व्यापक पक्षपात, राजनीतिक वर्चस्व और अकुशलता के कारण भी हम पिछड़ते हैं। ऐसा नहीं कि हमारे पास हुनर वाले खिलाड़ी नहीं हैं पर उनको मिलने वाली सुविधाओं का अभाव है। खेलों की फेडरेशनों में जिस तरह से खिलाड़ियों से बर्ताव किया जाता है मेरीकॉम पर आधारित फिल्म से पता चलता है। दरअसल देश में रानीतिक नेतृत्व पर बहुत कुछ निर्भर करता है और इसका खेल सहित हर क्षेत्र में असर पड़ता है। पिछला दशक इसका गवाह है और खेल में पिछड़ना इसी बात का लक्षण है।
अनिल नरेंद्र


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