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Saturday, 5 April 2014

इन सूबेदारों का बढ़ता पभुत्व देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है

सियासी बाजार में चुनाव बाद तीसरे मोर्चे के गठन पर गुणा-भाग फिर तेज हो गया है। तीन-चार दिन पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी की ओर से सेक्यूलर पंट का पासा फेंकने और उसके बाद सीपीएम की ओर से इस पंट के लिए कांग्रेस की मदद लेने की बात आने से चुनाव बाद सम्भावित मोर्चे और इसके समीकरण का आंकलन करना जरूरी है। दरअसल तमाम ओपिनियन पोलों में यूपीए की करारी हार के आसार के बावजूद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांगेस तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की संभावना को तरकश के अंतिम तीर के तौर पर देखे रही है। समाजवादी पाटी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने दो दिन पहले बालाघाट (मध्य पदेश) में एक जनसभा में वादा किया कि अपैल में शुरू हो रहे आम चुनावों के बाद केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी जिसमें उनकी पाटी की अहम भूमिका रहेगी। भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि उनका (मोदी कापधानमंत्री बनने का सपना केवल दिवा स्वप्न ही रह जाएगा क्योंकि भाजपा इस बार के लोकसभा चुनावों में उत्तर पदेश से एक भी सीट जीतने में सफल नहीं होगी। बेशक कांग्रेस, मुलायम व पकाश करात चुनाव बाद तीसरे मोर्चे के गठन को हवा दे रहे हैं पर कुछ सत्य तो यह है कि यह राह इतनी आसान नहीं होगी। एक मिनट के लिए भले ही मान लें कि मोदी के नेतृत्व में एनडीए जादुई आंकड़ा 272+ नहीं ले पाता तो इस मोर्चे के लिए क्या एकत्र होना आसान होगा? इसमें कई दिक्कतें साथ नजर आती हैं। जयललिता और करुणानिधि एक मोर्चे का हिस्सा नहीं बन सकते। ममता बनजी और लेफ्ट का भी एक मोर्चे के साथ आना बेहद कठिन है। मायावती और मुलायम भी बहुत मुश्किल से एक मोर्चे में आएंगे। हालांकि यूपीए-2 का दोनों बाहर से समर्थन दे रहे हैं। पंट का नेता कौन होगा इसका फैसला आसान नहीं होगा। एक नहीं कई (मुलायम, जयललिता व ममता) पीएम बनने की इच्छा का सार्वजनिक इजहार कर चुके हैं। मेरा तो हमेशा से ही यह मानना रहा है कि इस देश को या तो कांग्रेस सही चला सकती है या भाजपा। भले ही इनके नेतृत्व में गठबंधन हो। यही दोनों देश को स्थायित्व और विकास के रास्ते पर चला कर सकते हैं। यह तीसरा मोर्चा जब-जब सत्ता में आया है देश दस-पंद्रह साल पीछे चला गया है। इतिहास भी इस बात का गवाह है। 1996 में कांग्रेस और भाजपा दोनों के बिना सरकार बनाने की कोशिश सफल रही। भाजपा 161 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पाटी तो बनी लेकिन बहुमत का आंकड़ा नहीं बन पाया। ऐसे में लेफ्ट, जेडीएस, टीडीपी, बीएसपी, एआईएडीएमके जैसे 13 दलों ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। देवेगौड़ा, पीएम बने लेकिन पयोग बहुत दिनों तक नहीं चला। अब मौजूदा राजनीतिक हालात के आधार पर देखें तो 2014 के चुनाव में अगर कोई संभावना बनती है जिसमें किसी के पास बहुमत नहां रहा तो कांग्रेस के लिए बेहतर स्थिति भाजपा समर्थित सरकार की बजाय ऐसे मोर्चे को समर्थन देने की संभावना है। केंद्र की सत्ता में क्षेत्रीय दलों का बढ़ता पभुत्व देश के लिए मेरी राय में दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि इन दलों के नेता क्षेत्रीय राजनीति को ध्यान में रखकर आसानी से पाला बदल लेते हैं। वर्ष 1996 से 1998 का समय क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती शक्ति और केंद्रीय सत्ता में उनकी निर्णायक भूमिका को रेखांकित रहा और भाजपा को सबक लेने वाला भी। इन दो वर्षें में तीन पधानमंत्री बने। मध्यकालीन इतिहास में अली बंधु जिस तरह दो चार महीनों के लिए दिल्ली तख्त पर मुगल बादशाहों को बैठाते थे ठीक उसी तर्ज पर यह क्षेत्रीय पार्टियां नया गठजोड़ बनाती हैं और फिर उसे तोड़ देती हैं। इस समय दल बदलने वाले लोगों की फेहरिस्त लंबी है। देश के नेता अपनी सुविधानुसार नए सिद्धांत गढ़ने, नए बहाने बनाकर जबरन गठजोड़ करने में माहिर हो चुके हैं पर देश की जनता भी पहले से ज्यादा समझदार हो चुकी है। वह इनकी चालबाजियों को समझती है। अंत में एक दिलचस्प खबर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की ख्वाहिश है कि इस चुनाव के बाद थर्ड पंट की सरकार बने और उन्हें पधानमंत्री बनने का मौका मिले, इसके लिए जया ज्योतिषियों के कहने पर नाम बदलने को भी तैयार हो गई हैं। अब जया (रब्a)की जगह वह जय्या(रब्aa) लिखने लगी हैं।

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