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Thursday, 22 January 2015

राष्ट्रपति की नेक नसीहत, अध्यादेशों से बचें

मोदी सरकार के आठ माह के कार्यकाल में नौ अध्यादेश लाने के मद्देनजर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नसीहत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति ने सरकार को अध्यादेश राज से बचने का सीधा संदेश दिया है। उन्होंने विपक्ष को भी कड़ा संदेश देते हुए कह दिया है कि अल्पमत का विपक्ष बहुमत की आवाज को अकारण बाधित नहीं कर सकता। 16वीं लोकसभा में शासन और स्थिरता के लिए बहुमत मिला है। आए दिन अध्यादेश जारी करने से बचने के लिए दोनों को आपस में मिल बैठकर कोई व्यावहारिक समाधान निकालना चाहिए। महामहिम ने विधेयकों को पास कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुलाने को भी अव्यावहारिक बताया है। ऐसा कहकर उन्होंने मोदी सरकार को चौकस कर दिया है। संसदीय गरिमा के लगातार क्षरण पर देश का जागरूक जनमत चिंतित रहा है। मीडिया सहित कई मंचों पर यह चिंता व्यक्त की गई है और अब महामहिम ने इसे उठाया है। अभिभावक की तरह राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उचित ही दोनों पक्षों को याद दिलाया है कि जब संसद विधाई कार्य में विफल होती है तो उस पर से जनता का भरोसा टूटता है। उन्होंने साफ कहा है कि संसदीय कार्यवाही में बाधा नहीं डालनी चाहिए। शोर, हंगामा मचाने वाले अल्पमत को यह इजाजत नहीं होनी चाहिए कि वह सहनशील बहुमत का गला घोंट दे। जाहिर है कि राष्ट्रपति की इन टिप्पणियों को विपक्ष के हाल के व्यवहार की आलोचना के रूप में देखा जाएगा लेकिन अपने देश का यही अप्रिय यर्थाथ है कि विपक्ष में चाहे जो भी दल रहे, वह विधायिका को राष्ट्रपति के शब्दों में कहें तो... भीड़ की गोलबंदी और सड़क जैसे प्रदर्शनों का मंच बनाने की कोशिश करती है पर ऐसा भी नहीं कि इस स्थिति के लिए केवल विपक्ष ही जिम्मेदार है। सत्ताधारी दल भी इसके लिए जिम्मेदार है। मुश्किल यह है कि जैसे ही पार्टी सत्ता में आती है वह भूल जाती है कि संसद, विधानसभाएं सहयोग, सद्भाव और समान उद्देश्य की भावना से चलें, यह सुनिश्चित करना उसका दायित्व भी है। केवल विपक्ष को दिन-रात कोसने से काम नहीं चलेगा। जब प्रणब मुखर्जी खुद कांग्रेस में थे तो वह सत्तारूढ़ होने के बावजूद विपक्ष को साथ लेकर चलने का प्रयास करते थे। उनके जाने के बाद टकराव होना शुरू हुआ। मोदी सरकार में संसदीय मंत्री को प्रयास करना होगा कि वह सदन को सुचारू रूप से चलाने का प्रयास करें और जहां तक संभव हो अध्यादेश लाने से बचें। दुख से कहना पड़ता है कि पिछले कुछ वर्षों से सत्तारूढ़ दल और विपक्ष में टकराव इस कदर बढ़ गया है कि सदन सुचारू रूप से चलता ही नहीं। पूरा सत्र स्थगित होता रहता है और अंत में सत्तारूढ़ दल को जब और कोई रास्ता नहीं मिलता वह अध्यादेश का सहारा लेने पर मजबूर हो जाता है। उम्मीद की जाती है कि दोनों सत्तारूढ़ दल और विपक्ष राष्ट्रपति की नेक नसीहत पर गंभीरता से विचार करेंगे।

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