Tuesday, 29 May 2018

एक मंच, 17 दल... 2019 की मोर्चाबंदी

कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी ने पहले दो परीक्षण तो पास कर लिए हैं। पहला था बहुमत परीक्षण से पहले कांग्रेस और जेडीएस के लिए विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव जीतना। भाजपा के रेस से हट जाने से कांग्रेस के रमेश कुमार निर्विरोध विधानसभा के नए अध्यक्ष चुन लिए गए। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने कहा कि हमने अध्यक्ष पद के लिए अपने उम्मीदवार का नाम वापस ले लिया क्योंकि हम चाहते हैं कि चुनाव अध्यक्ष पद की गरिमा बनाए रखने के लिए सर्वसम्मति से हो। चुनाव से पहले समझा जा रहा था कि यह कर्नाटक के सियासी ड्रामे में एक और बवाल लेकर आएगा, क्योंकि भाजपा ने भी कांग्रेस के उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतार दिया था। इस चुनाव में भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता एस. सुरेश कुमार को प्रत्याशी बनाया था। पर अंतिम क्षण में उन्होंने शायद हार देखते हुए अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। दूसरा बड़ा शक्ति परीक्षण था सदन में कुमारस्वामी को विश्वास मत लेना। यह भी उन्होंने आसानी से हासिल कर लिया। विश्वास मत के पक्ष में 117 वोट पड़े। बहुमत के लिए न्यूनतम संख्या की शर्त 113 की थी। जाहिर है कि यह मामूली बहुमत वाली सरकार है। पर अगर इस सरकार की स्थिरता को लेकर अभी भी संदेह जताए जा रहे हैं तो इसके पीछे दूसरी वजहें अधिक हैं। कांग्रेस और जनता दल (एस) का गठबंधन चुनाव बाद का है। दोनों पार्टियों ने न सिर्प भाजपा पर बल्कि एक-दूसरे पर भी कीचड़ उछालते हुए चुनाव लड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने तो जनता दल (एस) को भला-बुरा कहते हुए भाजपा की बी टीम तक कहा था। एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा विरोधी दलों के नेताओं ने अपनी एकजुटता का जैसा प्रदर्शन किया उसकी भाजपा अनदेखी नहीं कर सकती। विपक्षी दलों ने जिस प्रभावी ढंग से अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया इसका पता इससे चलता है कि करीब-करीब सभी भाजपा विरोधी दलों के नेता बेंगलुरु में एक मंच पर दिखे। विपक्षी दलों के नेता केवल एक मंच पर जुटे ही नहीं बल्कि यह संदेश देने की भी कोशिश हुई कि वे सब मिलकर भाजपा का मुकाबला करने को तैयार हैं। विपक्षी एकता का पहला शक्ति परीक्षण उत्तर प्रदेश में कैराना उपचुनाव में होगा। समाजवादी पार्टी पूरे विपक्ष को एकजुट करने के लिए पहले से ही प्रयासरत है और बुधवार (शपथ समारोह) को कर्नाटक में सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद के प्रमुखों के बीच जो सहजता दिखाई दी, उससे आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता का प्लेटफॉर्म तैयार हो सकता है। लोकसभा चुनाव के लिए सपा-बसपा गठबंधन में सहमति बन चुकी है और कैराना उपचुनाव से पहले रालोद भी इनके करीब आया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए भी साथ आना मजबूरी ही होगी। कर्नाटक में इस शपथ ग्रहण में 17 विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी ने 2019 में मोदी विरोधी मोर्चे की तैयारियों की झलक पेश की। समारोह के बहाने विपक्ष के एक मंच पर आने को बड़ा सियासी महत्व मिला है। समारोह के दौरान बसपा प्रमुख मायावती और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी एक-दूसरे से बहुत गर्मजोशी से मिलीं। शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि कांग्रेस और जेडीएस मिलकर कर्नाटक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अश्वमेध घोड़े को बांधने में सफल रहे। हमारा लक्ष्य पूरा हो गया है। मैंने कहा था कि उत्तर प्रदेश के चुनाव के नतीजों के बाद मेरा लक्ष्य नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अश्वमेध घोड़े को बांधना है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी।

-अनिल नरेन्द्र

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