Wednesday, 23 May 2018

जम्मू में सीमावर्ती हिन्दुओं की दुर्दशा

आए दिन हमें यह बताया जाता है कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना के करारे-मुंहतोड़ जवाब से पाकिस्तान में त्राहि-त्राहि मच गई है और पाकिस्तानी रेंजर्स बीएसएफ अधिकारियों से अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। बेशक यह सही भी हो पर फिर उसी दिन रात को पाक की तरफ से फिर फायरिंग आरंभ हो जाती है, इसका क्या मतलब? इस साल पाकिस्तान ने अभी तक जम्मू-कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर 700 बार संघर्षविराम का उल्लंघन किया है। इससे सुरक्षाबलों के 18 जवानों सहित 38 लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों लोग अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए हैं। जम्मू क्षेत्र में तो पाक गोलाबारी से इतनी तबाही हो रही है जिसका कोई हिसाब नहीं। जम्मू-कश्मीर में भाजपा की महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के साथ सरकार है। पाकिस्तानी सैनिकों ने कल यानि सोमवार को जम्मू जिले में सीमावर्ती गांवों को मोर्टार के गोलों व छोटे हथियारों से निशाना बनाया जिससे आठ महीने के एक बच्चे की मौत हो गई और एक विशेष पुलिस अधिकारी सहित छह लोग घायल हो गए। मैंने कल एक वीडियो क्लिप देखा जिसमें जम्मू के सीमावर्ती गांव में बमबारी के कारण एक नौजवान की मौत हो गई और उसके भाई ने क्लिप में बताया कि वह अपने भाई और दूसरे मृत गांव वालों की लाशें ट्रैक्टरों पर लाने पर मजबूर हुए। क्या सरकार इन्हें इतनी-सी भी सुविधा नहीं दे सकती? भाजपा को जितने भी वोट मिले वह जम्मू क्षेत्र से ही मिले। आज अगर वह जम्मू-कश्मीर में सत्ता में है तो जम्मू के हिन्दुओं की वजह से है। भाजपा ने जम्मू के हिन्दुओं की सुरक्षा व विकास के लिए आखिर क्या किया है? आज स्थिति इतनी खराब हो गई है कि जम्मू से हिन्दुओं का देश के अन्य भागों में पलायन शुरू हो गया है। वह मजबूर हो गए हैं कि अपने घर-बार को छोड़कर, बच्चों को लेकर दिल्ली व चंडीगढ़ या भारत के अन्य भागों में जा बसें। क्या इस दिन के लिए जम्मू के हिन्दुओं ने भाजपा को वोट दिया था? विकास तो छोड़िए उनकी सुरक्षा तक नहीं हो सकती। राज्य में भाजपा ने महबूबा मुफ्ती के सामने जैसे घुटने टेक दिए हैं। भाजपा ने रमजान के दौरान सीजफायर के फैसले पर अपनी मुहर क्यों लगा दी? जब सेना कहती रही कि हम इस तरह के एकतरफा सीजफायर के खिलाफ हैं पर भाजपा ने एक नहीं सुनी। क्या जम्मू-कश्मीर में भारतीय सैनिकों की जान की कोई कीमत नहीं? नरेंद्र मोदी के जम्मू-कश्मीर दौरे से ठीक पहले केंद्र सरकार ने कश्मीर में सीजफायर का फैसला किया। इसके तहत रमजान के पवित्र महीने के दौरान राज्य में आतंकियों के खिलाफ सेना अपना अभियान स्थगित रखेगी। इधर केंद्र ने कहाöरमजान में बंदूकें बंद रहेंगी। उधर शोपियां जिले में सुरक्षाबलों पर अटैक हुआ। त्राल में सेना की पेट्रोलिंग पार्टी पर आतंकियों ने बम फेंका। सेना जब आतंकियों को मारने के लिए घेरती है तो कश्मीरी युवा उन पर पत्थर मारते हैं, थूकते हैं और सेना बर्दाश्त करती है। पीठ पर हाथ बांधकर आप सेना को कैसे लड़ने को कह सकते हैं? क्या हमारे सैनिकों के जीवन की कोई कीमत नहीं है? आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? इससे बेहतर तो यह है कि भाजपा जम्मू-कश्मीर गठबंधन से अलग हो और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर राज्य को सेना के हवाले कर दिया जाए। भाजपा को याद रखना चाहिए कि वह इन हिन्दुओं के वोटों से ही सत्ता में आई है। आज उन्हीं हिन्दुओं की सुरक्षा व विकास करने में असफल रही है वह भी एक अलगाववादी प्रवृत्ति की मुख्यमंत्री के लिए?

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