Thursday, 5 July 2018

पाकिस्तान में चुनावी आहट से सियासी पारा चढ़ा

पाकिस्तान में आम चुनावों की आहट-भर से सियासी पारा चढ़ने लगा है। पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव होंगे। पाकिस्तान निर्वाचन आयोग ने 21 मई को राष्ट्रपति को भेजे पत्र में नेशनल असेम्बली और चार प्रांतीय असेम्बली के लिए 25 से 27 जुलाई के बीच चुनाव करवाने का प्रस्ताव दिया था। राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने 25 जुलाई को मंजूरी दी। वर्तमान सरकार का कार्यकाल 31 मई को खत्म हो गया है। एक जून से और नई सरकार के गठन तक कार्यवाहक सरकार ने कामकाज संभाला हुआ है। मियां नवाज शरीफ अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। पंजाब प्रांत में शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन का दबदबा है। पाकिस्तान संसद में करीब आधे सांसद इसी प्रांत से हैं। अदालत से अयोग्य ठहराए जाने से शरीफ खुद चुनाव नहीं लड़ सकते। अलग सूबे की मांग को लेकर दक्षिण पंजाब और बहावलपुर में नाराजगी चल रही है। आसिफ जरदारी और बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो को खुद को साबित करने का अंतिम मौका है। भुट्टो खानदान की विरासत और सिंध में पैठ उनकी सबसे बड़ी ताकत है। पहली बार चुनाव में शामिल होने से पाक की जनता उन्हें परखना जरूर चाहेगी। इनको चुनौती दे रहे इमरान खान को इस बार बड़े जनादेश की आस है। शरीफ के विकल्प के तौर पर खुद को इमरान जोरों-शोरों से पेश कर रहे हैं। वह कट्टरपंथियों के बड़े धड़े का समर्थन हासिल करने में भी सफल हैं। उनकी कमजोरी खैबर पख्तूनख्वा में पार्टी का खराब प्रदर्शन है। सीनेट चुनाव जीतने के लिए खरीद-फरोख्त के लगातार उन पर आरोप लग रहे हैं। बिलावल भुट्टो की दुखती रग हैं पिता आसिफ अली जरदारी की पिछली सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप। उनको मिस्टर 10 पर्सेंट भी कहा जाता है। जहां तक चुनावी मुद्दों का सवाल है भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था, रोजगार व प्रांतीय भेदभाव बड़े मुद्दे हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि पाकिस्तान की सियासत पर सबसे ज्यादा असर पाक सेना का है। चुनाव में जीत पाक सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर तय होगी। माना जाता है कि पाकिस्तान की सेना और आईएसआई नतीजों को प्रभावित करती है और अगली सरकार उनकी रजामंदी से ही बन सकती है। पाकिस्तान मीडिया की आवाज दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना पर आरोप लग रहे हैं। पत्रकारों का कहना है कि उन पर बेहद दबाव है और सेना की निगरानी में एक खामोश तख्तापलट हो रहा है। पाकिस्तान की कई मीडिया संस्थाओं का कहना है कि 25 जुलाई को होने वाले आम चुनावों से पहले सेना कवरेज पर कई तरह की बंदिशें लगा रही है। जो लोग इस दबाव के आगे झुकने से इंकार कर रहे हैं उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। वहीं जिन मीडिया हाउसों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं उन पर खुद ही सेल्फ सेंसरशिप शुरू कर दी है। मुंबई आतंकी हमले का षड्यंत्रकारी हाफिज सईद का संगठन जमात-उद-दावा आम चुनाव अल्लाह-हू-अकबर तहरीक के जरिये लड़ेगा। इस समूह की मिल्ली मुस्लिम लीग (एमएमएल) का राजनीतिक पार्टी के रूप में पंजीकरण होना बाकी है।

-अनिल नरेन्द्र

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