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Wednesday, 7 March 2018

त्रिपुरा की हार वामपंथ के ताबूत की कील

त्रिपुरा की हार के बाद वामपंथी दलों के लिए अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का संकट पैदा हो गया है। उनके लिए यह हार ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकती है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने बंगाल चुनाव की तर्ज पर त्रिपुरा में भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनावी समर में उतरने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन पार्टी के पोलित ब्यूरो ने प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि हालत पश्चिम बंगाल चुनाव जैसी हो जाएगी, जहां पार्टी की हैसियत तीसरे व चौथे नम्बर की हो गई है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथी दलों की तर्ज पर ही करारी मात दी थी। वाम मोर्चा के घटक दलों को राज्य के पंचायत व शहरी निकायों के चुनाव में तीसरे व चौथे स्थान पर संतोष करना पड़ा। त्रिपुरा की 20 साल कमान संभालने वाले माणिक सरकार को लगता है कि पुरानी बड़ी सफलताओं पर हाल के मुद्दे भारी पड़े। उग्रवाद की आग से झुलस रहे राज्य में शांति बहाल करना उनकी बड़ी सफलता थी, पर इसके साथ लोगों की आकांक्षाएं भी बढ़ रही थीं, जिसे पूरा करने में सरकार सफल नहीं रही। सरकारी कर्मचारी नाराज थे, क्योंकि अभी तक चौथे वेतन आयोग का वेतनमान मिल रहा है। जबकि भाजपा ने उन्हें सातवां वेतनमान देने का वादा किया है। नए छात्रों में रोटी-रोजगार को लेकर निराशा थी। भाजपा लोगों को यह समझाने में सफल रही है कि हम राज्य में विकास लेकर आएंगे। भले ही माणिक दादा की छवि बेदाग रही पर भाजपा लोगों को यह समझाने में सफल रही कि उनकी सरकार के मंत्रियों ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और जनजातीय लोगों की उपेक्षा हुई है। राजधानी अगरतला और दूसरे शहरों में लोग कहते थे कि सरकार में अच्छे आदमी हैं पर अब बदलाव का समय आ गया है। वामपंथी दलों ने अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दी बहुल क्षेत्रों में जाने का फैसला किया था। लेकिन उनकी यह योजना धरी की धरी रह गई। वाम मोर्चा कुछ राज्यों तक ही सीमित रहा और जिन दूसरे राज्यों में सक्रिय भी था, वहां एक-एक कर उसकी राजनीतिक जमीन खिसकती रही। लेकिन वामपंथी दलों ने उसकी सुध नहीं ली, लिहाजा लोगों के दिल से भी उतरती चली गई। इसी का नतीजा है कि बंगाल के बाद अब त्रिपुरा में भी पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा है। माणिक सरकार को देश के वामदल इतिहास में विलक्षण व्यक्तित्व के तौर पर याद किया जाएगा।

-अनिल नरेन्द्र

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