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Tuesday, 10 February 2015

मांझी जब नाव डुबोए तो उसे कौन बचाए?

राजेश खन्ना की मशहूर फिल्म अमर प्रेम के एक गीत की दो पंक्तियां बिहार के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम पर फिट बैठती हैं। `मझधार मैं नैया डोले तो मांझी पार लगाए, मांझी जो नाव डुबोए, उसे कौन बचाए।' बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने खुद के तेवर पर जद (यू) में उठे सवालों पर अक्सर इस गीत की पहली पंक्ति का हवाला दिया कि मझधार में नैया डोले तो मांझी पार लगाए। बिहार में अक्तूबर में विधानसभा चुनाव से पहले शनिवार को सियासी घमासान की बैकग्राउंड तैयार हो गई। मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को उनकी ही पार्टी जेडीयू ने पद से हटाने का प्रस्ताव पास कर नीतीश कुमार को विधायक दल का नेता चुन लिया। बिहार में करीब महीनेभर से कयास लगाए जा रहे थे कि मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को हटाकर एक बार फिर नीतीश कुमार राज्य का नेतृत्व संभालने की तैयारी कर रहे हैं। राज्य में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम से साफ है कि जद (एकी) के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने स्थिति को संभालने के लिए जिस तरह अचानक सात फरवरी को विधायक दल की बैठक बुलाई उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कितनी उठापटक चल रही है। नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य अब दांव पर है। उनके सामने गंभीर चुनौती उस नेता ने पेश की है जिसे उनकी कठपुतली समझा जाता था। दलित जाति से आए बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने पूर्व लिखित पटकथा के मुताबिक चलने से इंकार कर दिया है। अगर नीतीश कुमार ने सोचा था कि मांझी `खड़ाऊ' मुख्यमंत्री रहेंगे और वे जब चाहेंगे उनके लिए कुर्सी खाली कर देंगे तो वे बिल्कुल गलत साबित हुए। मांझी ने स्वतंत्र रूप से राज करना शुरू किया। अपने राजनीतिक एवं प्रशासनिक कदमों से दलित समुदायों में अपना जनाधार बनाने की कोशिश की और जद (यू) नेतृत्व के मन-मुताबिक नीतीश कुमार के दोबारा मुख्यमंत्री बनने की राह तैयार करने से इंकार कर दिया। नतीजतन पार्टी विभाजन की ओर बढ़ रही है। नीतीश, शरद यादव ने जद (यू) विधायक दल की बैठक बुलाई है, जिसे मांझी ने असंवैधानिक ठहरा दिया है। मांझी ने 20 फरवरी को विधायक दल की जवाबी बैठक बुला ली है। आधा दर्जन मंत्रियों ने मांझी को खुला समर्थन दे दिया है। उन्होंने शरद यादव द्वारा बुलाई गई बैठक में न जाने का ऐलान कर दिया है। साफ है कि अगर यह टकराव इसी दिशा में आगे बढ़ा तो इसका सीधा असर बिहार सरकार की स्थिरता पर पड़ेगा। खबरें यहां तक आ चुकी हैं कि अगर मांझी को लगा कि उनकी कुर्सी खतरे में है तो वह विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर सकते हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के लिए मार्ग प्रशस्त करते हुए जद (यू) तथा अन्य सहयोगी दलों के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को राज्यपाल के कार्यालय को समर्थन का पत्र सौंपा जिसमें दावा किया गया है कि नीतीश कुमार को 130 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इसमें राजद, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक और निर्दलीय दुलाल चन्द गोस्वामी शामिल हैं। दूसरी ओर भाजपा जद (यू) में मची उथल-पुथल का लाभ उठाने की तैयारी में दिखती है। भाजपा जीतन राम मांझी के प्रति सहानुभूति रखती है और उसने यह साफ भी कर दिया है। अफवाहें यहां तक उड़ीं कि अगर मांझी को अपमानित किया गया तो वे भाजपा का दामन थाम सकते हैं। जाहिर है भाजपा का मकसद जद (यू) में बिखराव का लाभ उठाना है। क्या नीतीश-शरद गुट मांझी को हटाने में और नीतीश को फिर से गद्दी संभलवाने में कामयाब हो जाएगा या बिहार की राजनीति में अभी कई और मोड़ आने हैं, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि नीतीश फिर से बिहार की कमान संभालने पर तुले हुए हैं। इस प्रकरण का निहितार्थ यह है कि सुप्रीमो नेताओं और कठपुतली के जरिये राज करने के दिन अब लद रहे हैं। लोकतांत्रिक विकासक्रम के लिहाज से यह सकारात्मक घटनाक्रम भी कहा जा सकता है।

-अनिल नरेन्द्र

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