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Saturday, 17 October 2015

झूठ के पांव नहीं होते

वह एक कहावत है न कि झूठ के पांव नहीं होते यह 2002 गुजरात दंगों से संबंधित आईपीएस (बर्खास्त) संजीव भट्ट के केस पर फिट बैठती है। गुजरात के इस चर्चित आईपीएस संजीव भट्ट को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की जांच एसआईटी को सौंपे जाने और भाजपा अध्यक्ष व गुजरात के तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अमित शाह को मामले में पक्षधर बनाने की भट्ट की मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने न सिर्प विवादित आईपीएस की याचिकाएं ही खारिज कीं बल्कि तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर रखने के लिए भट्ट पर तल्ख टिप्पणियां भी की हैं। माननीय अदालत ने संजीव भट्ट की मंशा पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने इसी के साथ पूर्व महाधिवक्ता तुषार मेहता (अब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल) के ईमेल हैक करने और अपने मातहतों को धमकाने और उनके जबरन शपथ पत्र दिलाने के आरोप में दायर प्राथमिकी पर से स्टे भी हटा लिया। संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर मांग की थी कि गुजरात दंगों के मामले में दबाव डालकर सिपाही केडी पंथ से गलत हलफनामा दिलाने और गुजरात के तत्कालीन एडिशनल एडवोकेट जनरल के ईमेल हैक करने के मामलों की जांच एसआईटी को सौंपी जाए। मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू और न्यायाधीश अरुण मिश्रा की पीठ ने भट्ट की याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि दोनों मामलों का ट्रायल जल्दी पूरा किया जाए। पीठ ने कहा कि यहां मामला सिर्प इतना है कि क्या याचिकाकर्ता (संजीव भट्ट) ने दबाव डालकर केडी पंथ का हलफनामा लिया था। इस मामले की जांच पूरी होकर आरोप पत्र भी दाखिल हो चुका है। आरोप पत्र दाखिल हुए चार वर्ष बीत चुके हैं। याचिकाकर्ता ने कभी भी जांच पर सवाल नहीं उठाया। आरोप पत्र दाखिल हो चुका है, मामले पर ट्रायल के दौरान विचार होगा। याचिकाकर्ता उन परिस्थितियों को साबित नहीं कर पाया जिसके आधार पर जांच एसआईटी को सौंपी जाए। संजीव भट्ट इकलौते ऐसे शख्स नहीं जो आधे-अधूरे अथवा मनगढ़ंत तथ्यों के साथ अदालतों का दरवाजा खटखटाकर उनका वक्त जाया करते हैं। ऐसे खुराफाती तत्वों की संख्या बढ़ रही है जिनका शगल ही अदालत-अदालत खेलना बन गया है। दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कथित ताबूत घोटाले की जांच की मांग करने वाली एक जनहित याचिका को खारिज किया था। यह अजीब है कि जब इस कल्पित घोटाले का निपटारा दो वर्ष पहले ही हो गया था तब फिर सुप्रीम कोर्ट को उससे संबंधित याचिकाओं की सुनवाई क्यों करनी पड़ी। जैसा मैंने कहा कि झूठ के पांव नहीं होते, सुप्रीम कोर्ट ने साबित कर दिया।

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