Saturday, 10 November 2018

आडवाणी जी के 91वें जन्मदिन पर बधाई

बृहस्पतिवार यानि आठ नवम्बर को भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का 91वां जन्म दिवस था। जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने वाले सबसे पहले लोगों में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। उनके अलावा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, राजनाथ सिंह सहित तमाम अन्य भाजपा नेताओं ने भी उन्हें बधाई दी। प्रधानमंत्री ने सिर झुका कर आडवाणी जी का अभिनंदन किया। भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में आडवाणी जी की अहम भूमिका रही है लेकिन आज की तारीख में आडवाणी भाजपा में हाशिये पर हैं और सक्रिय राजनीति से बिल्कुल अलहदा हो गए हैं। प्रधानमंत्री जो बृहस्पतिवार को शीश झुका कर आडवाणी का अभिनंदन करते दिखे इन्हीं मोदी ने कुछ महीने पहले स्टेज पर खड़े आडवाणी को देखा तक नहीं, अभिनंदन करना तो दूर वह बिना दुआ सलाम किए ही आगे बढ़ गए थे। वह वीडियो देखकर बहुत बुरा लगा था। प्रधानमंत्री मोदी कभी आडवाणी के काफी करीबी हुआ करते थे, लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री उम्मीदवार के चयन के बाद से दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। एक जमाने में भाजपा के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी की पूरे भारत में तूती बोलती थी और उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जाता था। लेकिन प्रधानमंत्री तो दूर पिछले दिनों जब राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ तो भी उनका नाम इस पद के संभावितों की सूची में भी नहीं रखा गया था। यह वही आडवाणी हैं जिन्होंने 1984 में दो सीटों पर सिमट गई भारतीय जनता पार्टी को रसातल से निकाल कर पहले भारतीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाया और फिर 1998 में पहली बार सत्ता का स्वाद चखाया। उस समय जो बीज उन्होंने बोए थे, कायदे से उसकी फसल काटने का समय अब था, लेकिन फसल काटना तो दूर लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति तो क्या भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में भी आप्रासंगिक से हो गए हैं। भाजपा को नजदीक से देखने वालों का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का समर्थन पाने के लिए आपका हार्डलाइनर होना जरूरी होता है। लेकिन वही प्रधानमंत्री पद की होड़ में शामिल होता है तो वो अपनी छवि को मुलायम करने की कोशिश करता है ताकि उसकी अखिल भारतीय स्वीकार्यता बढ़ सके। आडवाणी के साथ भी संभवत यही हुआ। परेशानी भाजपा के साथ हमेशा रही है। इसका कारण यह है कि भाजपा या इससे पहले जनसंघ या आरएसएस हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा की बुनियाद पर खड़े हैं। हठधर्मिता और कड़ापन उनकी विचारधारा का हिस्सा है। दिक्कत यह होती है कि जब आप संवैधानिक पद की होड़ में होते हैं तो आपको इससे बाहर निकलना होता है। बीबीसी के अनुसार आडवाणी के आलोचक रहे और आरएसएस पर किताब लिखने वाले एजी नूरानी कहते हैंö1984 के चुनाव में जब भाजपा को सिर्प दो सीटें मिली थीं तो वह (आडवाणी) बहुत बौखलाए थे। उन्होंने तय किया कि पुराने वोट हासिल करने का सिर्प एक ही तरीका है कि हिन्दुत्व को दोबारा जगाया जाए। 1989 में भाजपा का पालमपुर प्रस्ताव पास हुआ जिसमें आडवाणी ने खुलकर बताया कि मैं उम्मीद करता हूं कि हमारी यह कोशिश वोटों में बदले। उनके अनुसार 1995 में उन्होंने महसूस किया कि देश उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाएगा, इसलिए उन्होंने वाजपेयी के लिए गद्दी छोड़ दी। जिन्ना के बारे में जो उन्होंने बात की थी, जिन्ना की मजार पर जाकर जो कुछ किया था वो पाकिस्तानियों को खुश करने के लिए नहीं था, वो भारत में अपनी एक उदार छवि बनाने का प्रयास था। वो कहते हैं कि ऐसा करके वो खुद अपने जाल में फंस गए। उन्होंने गुजरात दंगों के बाद जिन मोदी को बचाया उन्हीं मोदी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनका यह हश्र हुआ कि न खुदा मिला न विसाले सनम। न इधर के रहे न उधर के रहे। लेकिन राम बहादुर राय का मानना है कि गुजरात दंगों के बाद आडवाणी ने नहीं बल्कि दूसरे लोगों ने मोदी को बचाया था। बीबीसी के लेख के अनुसार राम बहादुर राय कहते हैंöवाजपेयी चाहते थे कि नरेंद्र मोदी इस्तीफा दें। उन्होंने एक बयान में मोदी की मौजूदगी में राजधर्म की शिक्षा भी दी। लेकिन वाजपेयी को ठंडा करने और अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए जिन दो व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनके नाम थे अरुण जेटली और प्रमोद महाजन। वाजपेयी जब दिल्ली से गोवा पहुंचे तो उनके विमान में यह दो लोग ही थे, आडवाणी तो थे ही नहीं। आडवाणी जी ने अपने आपको राजनीति से बिल्कुल अलग कर लिया है। यह अत्यंत दुखद है। पार्लियामेंट में वो हर कार्यक्रम में तो दिखते हैं पर किसी भी चर्चा में भाग क्यों नहीं लेते? एक बार भी किसी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर नहीं बोले? खैर! हम आडवाणी जी के जन्मदिन पर उन्हें बधाई देते हैं और चाहते हैं कि उनका बनवास समाप्त हो।

No comments:

Post a comment