Tuesday, 20 November 2018

सवाल आंध्रा-बंगाल में सीबीआई की नो एंट्री का

आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकार ने शुक्रवार को अपने राज्य में सीबीआई के प्रवेश पर रोक लगा दी है। सरकार ने राज्य में कानून के तहत अपनी शक्तियों के इस्तेमाल के लिए दी गई सामान्य रजामंदी वापस ले ली। इस सामान्य रजामंदी वापस लेने के बाद सीबीआई को इन राज्यों में किसी भी प्रकार के छापे या जांच की कार्रवाई के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी होगी, जबकि सामान्य सहमति स्वत मंजूरी की तरह होती है। बता दें कि सीबीआई दिल्ली पुलिस प्रतिष्ठान कानून 1946 के तहत काम करती है। इस कानून की धारा 6 के तहत सीबीआई को मामलों की जांच के अधिकार मिले हैं। धारा 6 के अनुसार सीबीआई के किसी भी सदस्य को राज्य के किसी भी हिस्से में जांच व कार्रवाई से जुड़े अधिकारों के इस्तेमाल के लिए राज्य सरकार की सहमति की जरूरत होगी। मोदी सरकार से मार्च में रिश्ते तोड़ने के बाद से नायडू आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सीबीआई जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना साधने में कर रही है। नायडू कुछ कारोबारियों, प्रतिष्ठानों पर आयकर विभाग के हालिया छापे से भी नाराज हैं। वहीं शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नायडू के समर्थन में उतरते हुए एनडीए सरकार पर सीबीआई और आरबीआई जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को बर्बाद करने का आरोप लगाया। भाजपा सियासी फायदों व बदले के लिए सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है। वहीं भाजपा ने आंध्र और पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सीबीआई को दी गई शक्तियां वापस लेने पर तीखा हमला बोला। भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने आरोप लगाया कि यह भ्रष्टाचार छिपाने की कोशिश है। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने नायडू के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने सही किया है। सीबीआई और आयकर विभाग का दुरुपयोग किया जा रहा है। नायडू, आयकर विभाग के अधिकारियों को भी अपने राज्य में मत घुसने देना। सीबीआई प्रवक्ता ने कहा कि आंध्र में पाबंदी पर राज्य सरकार की ओर से कोई जानकारी नहीं मिली है। आदेश की सूचना मिलने के बाद कानूनी विकल्प पर विचार करेंगे। वैसे सीबीआई की कानूनी वैधता पर पहली बार सवाल नहीं उठे हैं। उच्चपदस्थ सरकारी सूत्रों ने बताया कि डीएसपीई के तहत सीबीआई के गठन और काम पर पहले भी कई बार केंद्र सरकार को बचाव करना पड़ चुका है। गुवाहाटी हाई कोर्ट तो नवम्बर 2013 को अपने फैसले में सीबीआई के गठन और इसके कामकाज को ही असंवैधानिक करार दे चुका है। हालांकि सीबीआई का कहना है कि मामले का आंध्र के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के उस फैसले से कोई संबंध नहीं है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता नवेन्द्र कुमार की रिट याचिका पर सुनवाई के बाद सीबीआई के गठन को ही असंवैधानिक बताया था। फैसले में हाई कोर्ट ने कहा था कि अदालत एक अप्रैल 1963 के उस प्रस्ताव को खारिज करती है, जिसके तहत सीबीआई का गठन किया गया था। सीबीआई डीएसपीई का हिस्सा या अंग नहीं है। सीबीआई को किसी भी लिहाज से डीएसपीई एक्ट 1946 के तहत पुलिस संस्था नहीं माना जा सकता। गुवाहाटी हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ दो बार केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी। केंद्र की अपील पर तत्कालीन चीफ जस्टिस ने अपने निवास पर ही सुनवाई की थी और हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला लंबित है। इस चुनावी वर्ष में सीबीआई पर प्रतिबंध केंद्र सरकार के लिए धक्का है। इसमें कोई शक नहीं कि जो भी सरकार केंद्र में आई उसने सीबीआई का दुरुपयोग किया चाहे वह यूपीए हो और चाहे एनडीए हो। सवाल यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि इन राज्यों में जो केस सीबीआई ने दर्ज कर रखे हैं जिनमें जांच हो चुकी है उनका क्या होगा? कहा तो यह भी जा रहा है कि नायडू के इस एक्शन के पीछे उन्हें व्यक्तिगत डर है। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को दो करोड़ और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को दो करोड़ 95 लाख रुपए की रिश्वत लेने का दावा करने वाले सतीश बाबू सना हैदराबाद के हैं। उसे नायडू का करीबी माना जाता है। चर्चा है कि नायडू के साथ उसके लेन-देन के पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं। सना ने सीबीआई के सामने माना है कि एक तेदेपा सांसद ने उसे बचाने के लिए सीबीआई निदेशक से बात की थी। जांच में इन दस्तावेजों के बाहर आने की संभावना है। नई अधिसूचना के बाद आंध्र में सना के खिलाफ सीबीआई जांच रोकी जा सकेगी। बताया जा रहा है कि सीबीआई खुद मामले की जांच शुरू नहीं कर सकती। राज्य और केंद्र सरकार के कहने या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही जांच कर सकती है। ऐसे में अगर कोई राज्य सीबीआई को वैन करता है तो कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार का आदेश रद्द हो जाएगा। यह तय है कि केंद्र सरकार आंध्र और पश्चिम बंगाल के ताजा वैन पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा एक बार फिर खटखटाएगी। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट में गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला लंबित है। हो सकता है कि उसी आधार पर केंद्र सरकार इन दो राज्यों के वैन को चुनौती दे। देखें, आगे क्या होता है?

-अनिल नरेन्द्र

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