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Friday, 9 August 2013

पीछे नहीं हटेंगे, केंद्र चाहे तो सारे आईएएस अफसर बुला ले ः सपा

तेलंगाना राज्य बनाने के बाद देश के विभिन्न भागों में अलग राज्य बनाने की जहां बाढ़-सी आ गई है और तेलंगाना का मसला केंद्र सरकार के लिए ऐसी गले की हड्डी बना है कि न तो निकलते बन रहा है और ही न उगलते। वहीं उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी ने तो सारी हदें पार कर दी हैं। यूपी सरकार तो ऐसा बर्ताव कर रही है, बयान दे रही है जैसे वह एक अलग देश की सरकार हो। यूपी की सत्ता चला रही समाजवादी पार्टी की ओर से सोमवार को आए बयान से तो यही लगता है। संसद के दरवाजे पर पार्टी महासचिव रामगोपाल यादव ने केंद्र को खुली धमकी दे डाली। रामगोपाल यादव ने कहा कि निलंबित आईएएस अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में केंद्र दखल देना बन्द करे, अगर केंद्र को अपने आईएएस अफसरों की इतनी ही चिन्ता है तो उन्हें वापस अपने पास बुला ले। हम राज्य के अफसरों के सहारे ही यूपी चला लेंगे। यह पहली बार है जब किसी राज्य ने इस प्रकार की धमकी दी है। वैसे दुर्गाशक्ति मामले में केंद्र सरकार को समीक्षा का अधिकार है। प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री व डीओपीटी महकमे के मंत्री वी. नारायण सामी ने कहा कि अगर दुर्गाशक्ति अर्जी देती हैं तो उनके निलंबन की कार्रवाई पर विचार होगा। दूसरी ओर अपने पति और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बचाव में सपा सांसद डिम्पल यादव ने कहा कि महिला अधिकारी का मतलब यह नहीं है कि आपके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। गौतमबुद्ध नगर की निलंबित एसडीएम दुर्गाशक्ति नागपाल को लेकर मचे राजनीतिक हो-हल्ले को बेवजह बताते हुए डिम्पल ने कहा कि दुर्गा को चार्जशीट दी गई है। उनके जवाब के बाद ही पता चल पाएगा कि उनका पक्ष क्या है। उसके आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री अजीत सिंह ने दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन पर कहा कि उत्तर प्रदेश में यह पहली बार नहीं हो रहा है। फिलहाल वहां साढ़े चार मुख्यमंत्री हैं। चार अन्य लोग भी सरकार चला रहे हैं। आधे हिस्से के तौर पर अखिलेश भी मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में साढ़े चार मुख्यमंत्री में से कौन-सा असल रूप में सरकार चला रहा है यह राज्य के नौकरशाहों को स्पष्ट नहीं है। उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान अखिलेश यादव ने बार-बार दोहराया था कि अगर इस बार समाजवादी पार्टी को सत्ता में आने का मौका मिला तो वह पिछली गलतियों को नहीं दोहराएगी। लेकिन युवा मुख्यमंत्री ने अपने इस वादे के विपरीत बार-बार निराश किया है। उनकी सरकार वही गलतियां कर रही है जो सपा की पिछली सरकारों ने की थीं। लोगों ने अखिलेश से बहुत उम्मीदें लगाई थीं पर वही बाहुबली और अवैध धंधों में लगे लोगों का राज फिर शुरू हो गया है और दुखद यह है कि वे सत्ता का संरक्षण पाने में कामयाब हो जाते हैं और भुगतना पड़ता है ईमानदार, निष्ठावान अफसरों को। ऐसा न होता तो दुर्गाशक्ति नागपाल को यूं बेइज्जत करके न निकाला जाता। खुद मुख्यमंत्री कहते हैं कि दुर्गा को इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि उनकी एक कार्रवाई से सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने का अंदेशा था। गौरतलब है कि गौतमबुद्ध नगर की एसडीएम रहते हुए दुर्गाशक्ति ने जिले के बादलपुर गांव में सरकारी जमीन पर खड़ी की जा रही मस्जिद की दीवार को गिरवा दिया। अव्वल तो इस पर भी विवाद है कि यह दीवार किसने गिरवाई और क्यों गिरवाई पर एक मिनट के लिए यह मान भी लिया जाए कि उन्होंने ऐसा किया तो क्या गलत किया? क्या सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश नहीं दिए कि सरकारी जमीन पर किसी अवैध निर्माण को हटा दिया जाए? दुर्गा ने अपने कर्तव्यों का पालन किया लेकिन इसका खामियाजा उन्हें अपने निलंबन के रूप में भुगतना पड़ा है। एक युवा ईमानदार अफसर को मिली इस सजा ने राज्य सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिला अधिकारी ने भी सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में दुर्गाशक्ति को क्लीन चिट दी है। फिर विधायक नरेन्द्र भाटी की स्वीकृति ने भी मुख्यमंत्री की दलील की हवा निकाल दी है। भाटी ने दावा किया है कि उन्होंने सपा के शीर्ष नेतृत्व से बात कर निलंबन का रास्ता साफ कराया था। दुर्गाशक्ति के निलंबन पर उचित ही देशभर में नाराजगी भरी प्रतिक्रिया हुई है। आईएएस अधिकारी संघ से लेकर नागरिक संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से भी विरोध की आवाज उठी है। सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर दुर्गा के साथ न्याय सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। उनके इस पत्र के बाद केंद्र सरकार को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब करना पड़ा। लेकिन सपा सरकार ने जवाब में कहा कि आप चाहो तो अपने सारे आईएएस अफसर वापस बुला लो और अब तक के रवैये से नहीं लगता कि वह अपने फैसले से पीछे हटने वाली लगती है। उल्टा सपा ने कांग्रेस को चुप कराने के लिए राबर्ट वाड्रा व अशोक खेमका प्रकरण याद करवा दिया। मंदिर-मस्जिद के नाम पर जमीन पर अवैध कब्जे और निर्माण के बढ़ते सिलसिले को रोकने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट कई बार राज्य सरकारों को कार्रवाई की हिदायत दे चुका है। दुर्गाशक्ति ने जो किया वह सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के भी अनुरूप था, इसलिए मामला वैसा नहीं जैसा समाजवादी पार्टी और अखिलेश सरकार दिखाना चाहती है, मामला नियम-कायदों का ईमानदारी से लागू करने का है।                                              अनिल नरेन्द्र

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