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Thursday, 9 July 2015

टूटा पर झुका नहीं ग्रीस, पैकेज को नकारा

ग्रीस यूरोजोन का हिस्सा बना रहेगा या इससे बाहर निकलेगा और अपनी पारंपरिक मुद्रा द्रारक्मा की तरफ लौट जाएगा-पिछले दो वर्षों से जारी इस रोमांचक अटकलबाजी का किस्सा बीते इतवार को खत्म हो गया। आfिर्थक संकट से जूझ रहे ग्रीस में रविवार को हुए जनमत संग्रह में मतदाताओं ने यूरोपीय संघ के बेलआउट पैकेज के पस्ताव को खारिज कर दिया है। अब ग्रीस का यूरोजोन से बाहर जाना लगभग तय हो गया है। यूरोपियन यूनियन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने ग्रीस से कर्ज के बदले खर्चों में कटौती की कड़ी शर्तें रखी थीं, इसे माने या नहीं, इसी पर जनमत संग्रह कराया गया। कर्जे के लिए कड़ी शर्तों को खारिज कर ग्रीस की जनता ने पीएम सिपस में विश्वास जताया है। सिपस ने जनता से नो पर वोट डालने की अपील की थी। ग्रीस को 2018 तक 50 अरब यूरो यानि 5.5 अरब डॉलर के नए आर्थिक पैकेज की जरूरत है। यूरोपियन यूनियन और आईएमएफ ने इसके लिए खर्चों में कटौती की बड़ी शर्तें रखी थीं। इससे पहले भी ग्रीस को 2008 में और 2010 में बेलआउट पैकेज दिए गए थे। 2010 में ईसीबी, आईएमएफ, यूरोपीय आयोग ने ग्रीस की मदद के लिए अपने खर्चों में कटौती की शर्त रखी। अर्थव्यवस्था के आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर बढ़ाने के सुझाव दिए। मगर ग्रीस के लोगों को यह मंजूर नहीं था। आर्थिक संकट से उबरने के लिए मिले बेलआउट पैकेज के बावजूद ग्रीस की अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं हुआ। ग्रीस की बदहाली के पीछे उसका इतिहास और राजनीति मानी जा रही है। द्वितीय विश्व महायुद्ध के बाद यह देश वामपंथी और दक्षिणपंथी लोगों के बीच तकरीबन 30 साल तक चले लंबे गृहयुद्ध में फंस गया। जिसका असर अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राजनीति पर भी पड़ा। ये हालात तब और बिगड़ गए जब 1949 में देश में आर्थिक और राजनीतिक तौर पर कमजोर कर दिया गया। ताजा बेलआउट पैकेज में जो शर्तें रखी गईं हैं वह ग्रीस के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं। जहां पचास फीसदी से ज्यादा लोग बेरोजगार हों, जिनके पास नौकरी है उन्हें भी तनख्वाह कट-घट कर मिल रही हो, बूढ़े लोगें की पेंशन लगातार घट रही हो और जो मिले वह भी खैरात की तरह। इतनी निराशा के माहौल में कोई समाज कब तक जी सकता है? जर्मनी और फांस जैसे यूरोजोन की महाशक्तियों का कहना है कि कर्ज लेकर हजम कर जाना कोई रास्ता नहीं है। लिहाजा ग्रीस या तो टैक्सों की उगाही बढ़ाकर और अपने सरकारी खर्चों में कटौती करके इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड और यूरोपियन कामर्शियल बैंक से लिए गए कर्जों की अदायगी करे या फिर खुद को दिवालिया घोषित करके अपने हाल पर जीना सीखे। इस धमकी को झेलते रहना ग्रीस की जनता के लिए एक सीमा के बाद असंभव हो गया। उन्होंने तय किया कि आगे जो होगा सो होगा, अभी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए अगर उन्होंने अपना आत्मसम्मान बचाकर रखा तो उनके बच्चे अमीरों में न सही, गरीबों में ही सिर उठाकर जी तो सकेंगे। देश में आशंका और अनिश्चितता का माहौल है। खाने-पीने की चीजों की किल्लत भी शुरू हो गई है। सरकार की ओर से बैंकों को बंद करने के ऐलान की वजह से देश में एटीएम पर लोग कतारों में खड़े दिखाई दे रहे हैं। यही नहीं लोग ग्रीस के भविष्य को लेकर इस कदर आशंकित हैं कि वह खाने-पीने की चीजों की जमकर खरीदारी कर उसे जमा कर रहे हैं। ग्रीस के इस स्पष्ट जनादेश के बाद एक रास्ता ग्रीस को चुपचाप यूरोजोन से बाहर कर देने का है। ऐसा हुआ तो इस देश के ज्यादातर बैंक बैठ जाएंगे और यहां की अर्थव्यवस्था और बिगड़ेगी। यूरोजोन को इसका नुकसान यह होगा कि इसकी छवि एवं भुरभुरी चीज जैसी बन जाएगी। अगला नंबर किसका हो सकता है? बुल्गारिया, रोमानिया, मकदूनिया  या फिर स्पेन, पुर्तगाल, इटली का? दूसरा रास्ता ग्रीस के लोगों के मन की बात सुनने, उनकी मुश्किलें कम करने, ग्रीस को यूरोजोन में बनाए रखने की शर्तें नरम बनाने का है। उम्मीद की जाती है कि यूरोजोन के महारथी इस दूसरे रास्ते पर ही बढ़ेंगे ताकि विश्व अर्थव्यवस्था में आशंकाओं का मौजूदा दौर खत्म हो।

-अनिल नरेंद्र

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