Wednesday, 22 August 2018

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?...(1)

पूरे उत्तर भारत में 27 साल बाद अगर किसी राजनेता की अंतिम यात्रा में भीड़ सड़कों पर अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए उतरी हो तो वह अटल जी के लिए थी। 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की निर्मम हत्या के समय ऐसा जनसैलाब देखा गया था। वैसे दक्षिण भारत में इस तरह का दृश्य आम है लेकिन उत्तर भारत में ऐसा सदियों बाद हुआ है। दिल्ली के लोगों ने 27 साल बाद किसी राजनेता की अंतिम यात्रा में ऐसा जनसैलाब देखा। पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद जो गांधी जी की अंतिम यात्रा में पैदल चले थे इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल जी की अंतिम यात्रा में पैदल चलकर अंतिम विदाई दी। शुक्रवार को अटल जी की अंतिम यात्रा में जो जनसैलाब उमड़ा, उसे देखकर जयललिता, करुणानिधि की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ के सीन याद आ गए। गर्मी के बावजूद लोगों की भीड़ थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। भीड़ का सिलसिला हरिद्वार में भी देखने को मिला। हजारों की भीड़ से भरी हर की पैड़ी उस क्षण की गवाह बनी जब अटल जी की अस्थियों को गंगा की अविरल धाराओं में प्रवाह किया गया। हम दिल्ली पुलिस व दिल्ली यातायात पुलिस की प्रशंसा करना चाहते हैं कि उन्होंने आम लोगों से लेकर अतिविशिष्ट व्यक्तियों तक के लिए पूरे रास्ते इतना अच्छा सुरक्षा बंदोबस्त किया। जब देश के प्रधानमंत्री, महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री सड़कों पर उतरे तो उनकी सुरक्षा करना एक चुनौती थी, जिसमें दिल्ली पुलिस अव्वल नम्बर से पास हुई। अटल जी के अंतिम संस्कार स्थल के बिल्कुल करीब बड़े-बड़े अक्षरों में हाfिर्डंग पर लिखा थाöहर चुनौती से दो हाथ मैंने किए, आंधियों में मैंने जलाए दीये। अंतिम विदाई देने पहुंचे भाजपा नेता, विरोधी दलों के नेता या आम जन हर कोई अटल जी के जीवनवृत्त को मानों अपने तरीके से लिखना चाहता था। हर शख्स के पास थी अटल के साथ की अपनी कहानी। भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुंचाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने पार्टी में नेताओं की पूरी एक पीढ़ी तैयार की। यही कारण है कि आज भाजपा केंद्र के साथ-साथ 20 से ज्यादा राज्यों में सत्ता में है, प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद हर मौके पर और अपने भाषणों में नरेंद्र मोदी कभी अटल बिहारी वाजपेयी को याद करना नहीं भूलते। दरअसल दोनों नेताओं का पुराना नाता भी रहा है, वो अटल बिहारी वाजपेयी ही थे, जिनके फैसले से नरेंद्र मोदी आज सत्ता के शिखर तक का रास्ता तय कर पाने में सफल हुए हैं। गुजरात में 1995 के चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। शंकर सिंह बघेला और नरेंद्र मोदी को दरकिनार कर केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके  बाद नरेंद्र मोदी को पार्टी का कामकाज देखने के लिए दिल्ली बुला लिया गया। अक्तूबर 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी से कहा कि वह दिल्ली छोड़ दें, इसलिए कि अटल उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। उस दिन वाजपेयी से मुलाकात करने के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के लिए रवाना हो गए। इसके बाद 2002, 2007 और 2012 में वह इस पद पर तैनात रहे। प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान 2002 में हुए गुजरात दंगों को लेकर अटल जी काफी असहज थे। उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। 27 फरवरी 2002 की सुबह राज्य में गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में आगजनी हुई थी, जिसमें ट्रेन के एस-6 कोच में सवार 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी। यह कारसेवक अयोध्या से आ रहे थे। आगजनी की इस घटना के बाद गुजरात के विभिन्न भागों में दंगे भड़क गए, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया गया। उस दंगे की भीषणता ने देश-विदेश का ध्यान खींचा। वाजपेयी चार अप्रैल को अहमदाबाद दौरे पर गए। वहां वह शाह आलम रोजा अल्पसंख्यक शिविर भी गए और पीड़ितों से मुलाकात की और अधिकारियों को नसीहत देते हुए कहा कि बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक की सुरक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है और पागलपन को मानवता के दमन की इजाजत नहीं दी जा सकती। वाजपेयी की भावुकता ने उस कैंप में रह रहे करीब 8 हजार शरणार्थियों का दिल छू लिया और अपनी तकलीफों के बावजूद उन्होंने वाजपेयी की संवेदनशीलता की तारीफ की। वाजपेयी ने कहाöगोधरा में जो हुआ वह शर्मनाक है पर गोधरा के बाद जो हुआ वह कम निंदनीय नहीं है। पागलपन का जवाब पागलपन से नहीं दिया जा सकता। आग से आग नहीं बुझाई जा सकती और आग को फैलने से रोकने के लिए पानी की जरूरत पड़ती है। जाहिर है कि वाजपेयी गुजरात की स्थिति को लेकर काफी विचलित थे। दिल्ली लौटने से पहले उन्होंने हवाई अड्डे पर पत्रकारों को संबोधित किया था। पत्रकार उनसे केंद्र की मदद और हालात वगैरह से संबंधित सवाल पूछ रहे थे। इस क्रम में उनसे जो आखिरी सवाल पूछा गया वह इतिहास का हिस्सा बन गया और उन्होंने इसका जो जवाब दिया वह आज भी हर सरकार के लिए नसीहत की तरह है। उनसे सवाल किया गयाöप्रधानमंत्री जी इस दौरे पर चीफ मिनिस्टर के लिए आपका क्या संदेश है, क्या मैसेज है? वाजपेयीöचीफ मिनिस्टर के लिए मेरा एक ही संदेश है कि वो राजधर्म का पालन करें... राजधर्म... यह शब्द काफी सार्थक है.. मैं उसी का पालन कर रहा हूं, पालन करने का प्रयास कर रहा हूं। राजा के लिए, शासक के लिए प्रजा में भेद नहीं हो सकता... न जन्म के आधार पर न जाति के आधार पर न संप्रदाय के आधार पर (बीच में नरेंद्र मोदी बोले हम भी वही कर रहे हैं साहेब। वाजपेयीöमुझे विश्वास है कि नरेंद्र भाई यही कर रहे हैं, बहुत-बहुत धन्यवाद। (क्रमश)

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