Wednesday, 15 August 2018

राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्नचिन्ह?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी वैसे तो महागठबंधन बनाने के बड़े-बड़े दावे करते हैं पर एक छोटे से चुनाव में तो जिस तरह विपक्ष ने जीती हुई बारी हारी है उससे तो राहुल की नेतृत्व की क्षमता पर ज्यादा कांफिडेंस नहीं जमता। मैं राज्यसभा उपसभापति चुनाव में कांग्रेसी प्रत्याशी वीके हरिप्रसाद की हार की बात कर रहा हूं। विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह चुनाव जीत गए। जबकि एनडीए बहुमत से कम होने के बाद जीत हासिल करने में कामयाब रही है। एनडीए ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मोदी-अमित शाह की जोड़ी के सामने मजबूत और विज भी विपक्ष का तानाबाना निर्मित करना आसान नहीं है। वरना क्या बात है कि राजग सरकार के विरुद्ध विपक्षी गोलबंदी उस राज्यसभा में बिखर गई, जहां राजग के पास अपने उम्मीदवार हरिवंश को जिताने लायक बहुमत का जादुई आंकड़ा था ही नहीं। मौजूदा सीट कांग्रेस पार्टी के सदस्य और पूर्व उपसभापति पीजे कुरियन के रिटायर होने से खाली हुई थी और संवैधानिक परंपरा के लिहाज से भी वह पद कांग्रेस के हरिप्रसाद के पास जाना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस और विपक्ष के स्थान का लगातार अतिक्रमण कर रहे सत्तारूढ़ गठबंधन ने न सिर्प अन्नाद्रमुक को चाक-चौबंद किया बल्कि ढुलमुल रहने वाले बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति को पक्ष में मतदान के लिए तैयार किया। इतना ही नहीं, उसने वाईएसआर कांग्रेस और आप को मतदान का बायकाट करने के लिए भी राजी कर लिया। यह एक झलक है भविष्य की जहां 2019 के आम चुनाव के बाद अगर ऐसी कोई स्थिति बनी, जिसमें भाजपा के पास बहुमत नहीं हुआ तो वह प्रबंधन की कला से उसे जुटा सकती है। तीन पार्टियों के कुल सात सांसदों ने मतदान में भाग नहीं लिया, जिनमें से आप के तीन वोट विपक्ष के खाते में जुड़ सकते थे, पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आप से सम्पर्प ही नहीं किया, जबकि एनडीए ने नाउम्मीदी के बावजूद केजरीवाल से सम्पर्प साधा था। यहीं पर एनडीए और विपक्ष का फर्प दिखता है। साफ है कि विपक्षी एकता की मजबूती के लिए कांग्रेस को लचीला रुख अपनाना होगा। इस नतीजे के बाद विपक्ष के लिए दो संदेश बहुत स्पष्ट हैंöएक यह कि लोकसभा चुनाव में सिर्प भाजपा विरोध से काम नहीं चलेगा और दूसराöक्षेत्रीय पार्टियों के लिए भाजपा विरोध की बजाय स्थानीय हित और अपने अस्तित्व की चिन्ता ज्यादा महत्वपूर्ण है। टीआरएस का उदाहरण सामने है, जिसने कभी ममता के फेडरल फ्रंट का समर्थन किया था, पर राज्यसभा में वोटिंग के समय वह एनडीए के साथ हो गई। ऐसे में अब कांग्रेस के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं कि जब एनडीए अपने घटक दलों को साथ रखकर अन्य दलों का समर्थन हासिल कर सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं?

-अनिल नरेन्द्र

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