Saturday, 18 August 2018

एक देश-एक चुनाव पर राजनीतिक सहमति जरूरी

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना को दोतरफा धक्का लगा है। जहां चुनाव आयोग ने इसे तुरन्त लागू करने में अपनी असमर्थता जताई है वहीं विपक्ष के साथ-साथ भाजपा की सहयोगी जेडीएस ने भी इसे समर्थन देने से इंकार कर दिया है। ऐसे में इस साल के अंत में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव टलने या लोकसभा चुनाव के समय पूर्व होने की संभावना कम हो गई है। पहले संभावना बन रही थी कि मोदी सरकार एक देश-एक चुनाव की ओर बढ़ते हुए 2019 के आम चुनावों को 11 राज्यों की विधानसभा चुनावों के साथ करा देगी। नीति आयोग ने तो पहले ही कह दिया है कि 2024 में देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। कांग्रेस ने चार राज्यों के विधानसभा चुनाव रोकने के बजाय लोकसभा चुनाव समय से पहले कराने का मंगलवार को सुझाव दिया और कहा कि अगर इस मामले में मनमानी की गई तो पार्टी इसे न्यायालय में चुनौती देगी। कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत व नेताओं ने यह भी कहा कि इस साल के अंत में होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं को टालने की किसी भी कोशिश को अदालत में चुनौती दी जाएगी। पार्टी का कहना है कि यदि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इन राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ कराए जाएं तो उन्हें पद से इस्तीफा देकर लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर देनी चाहिए। पार्टी ने दो टूक कहा कि यदि किसी तरीके से इन तीनों राज्यों के चुनाव टालने की कोशिश की गई तो वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। उधर भाजपा ने भी स्पष्ट किया कि 11 राज्यों में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने का मोदी सरकार का कोई इरादा नहीं है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पार्टी मुख्यालय पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कुछ अखबारों में छपी उसी खबर का खंडन करते हुए कहा जिसमें कहा गया है कि मोदी सरकार 11 राज्यों के विधानसभाओं के चुनावों को 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ कराने की योजना बना रही है, पार्टी इसका खंडन करती है। पार्टी ऐसी किसी मत धारणा का खंडन करती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि एक देश-एक चुनाव लेकर भाजपा की भावना वही है जो हमारे अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग को लिखे पत्र में व्यक्त की है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि एक देश-एक चुनाव कराने में फायदे भी हैं। सबसे बड़ा फायदा तो खर्च के बचत का है। नीति आयोग का कहना है कि 2009 के लोकसभा चुनाव पर 1195 करोड़ रुपए खर्च हुए थे और 2014 के चुनाव में 3000 करोड़ रुपए। ऐसे में अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ कराया जाए तो यह 4500 करोड़ रुपए की बचत हो सकती है और इससे ईवीएम मशीनों व वीवीपीएटी के खर्चे का इंतजाम हो सकता है। चुनाव आयोग का कहना है कि एक साथ चुनाव करवाने के लिए 12 लाख नई ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों की व्यवस्था करनी पड़ेगी। इसके अलावा जितने बड़े पैमाने पर सरकारी मशीनरी को इस आयोजन में लगाना पड़ता है वह भी एक गंभीर समस्या है। इससे सरकारी कामकाज में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है। चुनाव से पूर्व राज्यों में आचार संहिता की वजह से कई कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होती है। विपक्षी दलों खासतौर पर क्षेत्रीय दलों को डर है कि प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व व कार्यक्रमों से राज्यों के मुख्यमंत्रियों की लोकप्रियता दब जाएगी और राष्ट्रीय महत्व पर चुनाव आधारित हो जाएगा। राज्यों के अपने मुद्दे दब जाएंगे। कुछ विपक्षी दल यह दलील देते हुए इस विचार को खारिज कर रहे हैं कि इससे देश की संघीय शासन का स्वरूप कमजोर होगा। वास्तव में यह दलील आधारहीन नहीं है। एक राष्ट्र-एक चुनाव के मुद्दे पर मोदी सरकार को पूरी तैयारी के साथ आगे आने की जरूरत है। ऐसा करने के लिए यह भी जरूरी है कि इस मसले पर राजनीतिक सहमति सबसे पहले कायम हो तभी आगे बढ़ सकते हैं।

-अनिल नरेन्द्र

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