Thursday, 2 August 2018

न गवाह मिलते हैं, न शिकायतकर्ता, आसानी से छूट जाते हैं नेता

सुपीम कोर्ट ने दिसंबर 2017 में 12 राज्यों में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का आर्डर दिया था ताकि जनपतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) के खिलाफ पेंडिंग मामलों को एक साल में ही निपटाया जा सके। इसके बाद 1 मार्च 2018 को पटियाला हाउस कोर्ट में दो ऐसे फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू हो गए। पता चला है कि दिल्ली में जनपतिनिधियों के खिलाफ कुल 202 केस हैं। 1 मार्च से 12 अपैल 2018 के बीच यानी 43 दिन में इन दो फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 11 केस निपटा दिए। एक भी मामले में सजा नहीं हुई। क्योंकि 8 मामले तो ऐसे थे, जिनमें तीन साल बाद भी पुलिस कोई सुबूत नहीं जुटा सकी। इस कारण आरोपी बरी हो गए। बाकी 3 मामलों में आरोपियों ने माफी मांग ली तो केस खत्म कर दिए गए। इस रफ्तार से काम हो तो सभी केस निपटने में दो साल लगेंगे। जबकि सुपीम कोर्ट ने साफ कहा है कि सभी केस एक साल के अंदर ही खत्म होने चाहिए। बता दें कि 4896 सांसदों व विधायकों के खिलाफ केस दर्ज हैं। कुल 1765 जन पतिनिधियों पर मामले दर्ज हैं। 3045 मामले हैं पेंडिंग इन अदालतों में। सबसे ज्यादा उत्तर पदेश में हैं। यहां 248 विधायकों व सांसदों पर 539 किमिनल केस पेंडिंग हैं। तमिलनाडु दूसरे और बिहार हैं तीसरे नंबर पर, वहीं दिल्ली 7वें नंबर पर है। इन 10 राज्यों में और बनेंगी फास्ट ट्रैक अदालतें ः मध्य पदेश, बिहार, यूपी, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र पदेश और पश्चिम बंगाल। विशेषज्ञ बताते हैं कि मानहानि और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने आदि के केस तो जल्दी निपटाएं जा सकते हैं लेकिन जन पतिनिधियों के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच एजेंसी का पक्ष, आरोपी का पक्ष और गवाह आदि सबको सुनने के बाद ही नतीजे पर पहुंचा जा सकता है जिसमें समय लगना लाजमी है। चुनाव के दौरान दर्ज मामलों की जांच में पुलिस की लापरवाही पर एक विशेषज्ञ वकील ने कहा कि चुनाव आयोग कोड ऑफ कंडक्ट के तहत केस तो दर्ज करा देती है लेकिन ऐसे मामलों में कोई गवाह सामने नहीं आता। न तो इन मामलों में कोई शिकायतकर्ता होता है। चुनाव आयोग स्थानीय एसडीएम और पुलिस के साथ मौके पर जाकर जांच करता है और मामला दर्ज कर लिया जाता है। इसके अलावा चुनाव आयोग के पास सजा देने संबंधी कोई पावर नहीं है। चुनाव के बाद कोई एक पार्टी सत्ता में आ जाती है फिर पुलिस भी ऐसे मामलों की जांच में लापरवाही बरतती है और पर्याप्त सुबूत न होने के कारण आरोपी बरी हो जाता है।
-अनिल नरेन्द्र

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