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Saturday, 7 July 2012

अखिलेश की साख और विश्वसनीयता पर सवाल

उत्तर प्रदेश के 39 साल के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से न केवल उत्तर प्रदेश की जनता को ही बल्कि पूरे देश के युवकों को बहुत उम्मीदें हैं। उनकी कारगुजारी को पूरा देश देख रहा है पर दुखी मन से कहना पड़ता है कि अखिलेश यादव की शुरुआत विवादास्पद ही रही है। बेशक उन्होंने अपने कुछ चुनावी वादे पूरे करने का प्रयास किया है पर जिस तरीके से वह पहले गलत फैसले ले लेते हैं फिर उनसे घंटों के अन्दर ही पलट जाते हैं उससे उनकी काबलियत और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। सरकारें अपनी साख और विश्वसनीयता पर चलती हैं। एक बार जनता में यह सन्देश चला जाए कि अमुक व्यक्ति गम्भीर नहीं है तो उस व्यक्ति को जमने में मुश्किल आती है। ताजा उदाहरण विधायक निधि से विधायकों को 20 लाख रुपए की गाड़ी खरीदने की घोषणा का है। अखिलेश यादव ने घोषणा की कि क्षेत्र विकास निधि के पैसे से विधायकों को 20 लाख रुपए तक के निजी वाहन खरीदने की छूट दी जा रही है। अखिलेश की यह घोषणा कई कारणों से गलत थी। पहली बात तो यह पैसा क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार देती है, इसे विधायकों के अपने सुख के लिए खर्च नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यदि सूबे के सभी विधायक और विधान परिषद सदस्य इस छूट का इस्तेमाल करते तो सरकारी खजाने पर सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का बोझ बढ़ जाता। गौरतलब है कि राज्य की पूर्ववर्ती मायावती सरकार की अलोकप्रियता की एक वजह फिजूलखर्ची ही थी। उसे सरकारी खजाने के दुरुपयोग की कीमत चुकानी पड़ी। तब विपक्ष में रहते हुए इसी सपा ने ही उस फिजूलखर्ची को बड़ा मुद्दा बनाया था। एक कटु सत्य यह भी है कि विधायकों को जो 20 लाख रुपए के वाहन देने की पेशकश की जा रही थी, उन्हें दौड़ाने लायक सड़कें तो लखनऊ के बाहर नजर ही नहीं आतीं। बिजली पानी का हाल किसी से छिपा नहीं। मुख्यमंत्री की यह घोषणा कुछ हफ्ते पहले की गई उनकी इस घोषणा की तरह अव्यावहारिक थी, जिसमें उन्होंने दिन ढलते ही मॉल रेस्तराओं को बन्द करने का फरमान जारी कर दिया था। हालांकि इस बार की घोषणा के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं, क्योंकि कोई भी दल या विधायक अपने मतदाताओं की नजरों में बुरा नहीं दिखना चाहता। लगता है कि 39 साल के मुख्यमंत्री की टीम अभी दुरुस्त नहीं हुई है। अखिलेश यादव के नेतृत्व की सपा सरकार गलतियां कर सीख रही है। सरकार के कामकाज के तौर-तरीके पर खुद उन्हीं के पार्टी के वरिष्ठ नेता सवाल उठाने लगे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहन सिंह ने कहा है कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री को घेरे हुए हैं और नए मुख्यमंत्री को अनाप-शनाप फैसले करवा देते हैं, जिसे बाद में वापस लेना पड़ता है। इससे बदनामी होती है, प्रतिष्ठा गिरती है और लोगों के ध्यान में आता है कि जिस सरकार में परिपक्वता नहीं होगी वह कैसे काम करेगी? 100 दिन पूरे करने पर सरकार की इस फजीहत की किसी को उम्मीद नहीं थी। सरकार ने सबसे पहले मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को रातोंरात तैनात कर अगले दिन हटा दिया। इसके बाद सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों ने बिजली की कमी से निपटने के लिए एक अनूठा उपाय ढूंढा। बिजली की किल्लत देखते हुए शॉपिंग मॉल व बाजार सात बजे तक बन्द करवा दिए। जोरदार विरोध होने पर शाम तक फैसला रद्द करना पड़ा और अब यह विधायकों को 20 लाख की गाड़ी का किस्सा। नोएडा में दागी अधिकारियों की तैनाती भी विवादों में है। यह मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया। भूमि आवंटन घोटाले के आरोपियों की नोएडा में पुन उन्हीं पदों पर तैनाती के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल हो गई है, जिस पर सुनवाई चल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश सरकार को छह महीने देने की मांग की थी, लिहाजा बसपा ने राज्य सरकार को छह महीने का समय दिया है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकान्त वाजपेयी ने कहा है कि सरकार लगातार गलत फैसले ले रही है। जनता ज्यादा देर इंतजार नहीं करेगी। कानून व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है। कुल मिलाकर अखिलेश यादव का रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं लग रहा।

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