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Friday, 3 April 2015

लोकतंत्र के अभाव में ढाई वर्ष में बिखर गई आम आदमी पार्टी

दिल्ली की हुकूमत पर हाल ही में काबिज हुई आम आदमी पार्टी में मचा घमासान निश्चित रूप से पार्टी का आंतरिक मामला है पर जिस तरह से पार्टी में घमासान मचा है वह सभी के लिए चिन्ता का विषय है। देश में अलग तरह की राजनीति की शुरुआत करने और स्वराज लाने का दावा कर अस्तित्व में आई आम आदमी पार्टी (आप) का कुनबा अपने ही दल में स्वराज व लोकतंत्र नहीं होने के कारण महज ढाई वर्ष में बिखर रहा है। जन लोकपाल आंदोलन से निकली इस पार्टी ने अपने जन्म से ठीक पहले समाजसेवी अन्ना हजारे को छोड़ दिया था तो अब पार्टी के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव भी पार्टी से बाहर होने की कगार पर आ गए हैं। गौरतलब है कि कई वरिष्ठ नेता पहले ही पार्टी का साथ छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। शनिवार को हुई राष्ट्रीय परिषद की बैठक में योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और उनके साथ ही आनंद कुमार और अजीत झा को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर करने का फैसला निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। आम आदमी पार्टी का गठन प्रचलित राजनीति के तौर-तरीके बदलने और नई राजनीतिक संस्कृति विकसित करने के ध्येय से हुआ था। कई बार इसने इसकी बानगी भी पेश की। लोकतंत्र में मूल्यों और मर्यादाओं का बड़ा मोल है। संयम, सहनशीलता और दूसरों के प्रति सम्मान इसकी बुनियाद है। भाषाई शालीनता का उल्लंघन यहां कतई अस्वीकार्य है किन्तु आम आदमी पार्टी के विवाद में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उसे निंदनीय ही कहा जा सकता है। खासतौर से उस व्यक्ति के मुंह से जो एक राज्य के मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर आसीन हो। आम आदमी पार्टी इतनी जल्दी घोषित उद्देश्यों से भटक जाएगी, कलह और निजी अहम की शिकार हो जाएगी यह कल्पना शायद ही किसी ने की हो। तमाम कार्यकर्ता चाहते थे कि पार्टी में उठाए आंतरिक लोकतंत्र के सवालों पर विचार हो, साथ ही पार्टी की एकता भी बनी रहे। लेकिन उनकी अनसुनी की गई। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की समिति से पहले ही हटा दिया गया था, राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आठ के मुकाबले 11 के बहुमत से। साफ था कि यह कार्यकारिणी की आम राय नहीं थी। अरविंद केजरीवाल की जिद्द के दबाव में यह फैसला हुआ था। राष्ट्रीय परिषद की  बैठक में यह फैसला जिस तरह से हुआ वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का माखौल कहा जाएगा। जिन पर पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगाया गया उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया गया। परिषद के सदस्यों को जबरन बाहर ही रोका गया। कुछ नेताओं से मारपीट भी की गई। आम आदमी पार्टी और उसके पदाधिकारियों की कड़ी परीक्षा की घड़ी है। न केवल जनता से किए गए वादों की कसौटी पर खरे उतरने की बल्कि अपने आचरण, सोच और व्यवहार से उस खांचे में खरा उतरने की जहां से वैकल्पिक नेता का विंब उभरता है। उनकी पार्टी के आंतरिक गतिरोध का मसला हो या दिल्ली के नगर निगम परिषदों के प्रति व्यवहार का, केजरीवाल सहिष्णुता के अनिवार्य पहलू को खोते दिखते हैं। कभी खुद को छोटा-बड़ा भाई मानने वाले अरविंद केजरीवाल-योगेन्द्र यादव के बीच खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि इसे पाटना मुमकिन नहीं लगता। इंतजार बंटवारे के औपचारिक ऐलान भर का है। कमोबेश योगेन्द्र खेमा भी मान चुका है कि अलग होना तय है। अब टीम यादव की कोशिश यही है कि वैकल्पिक राजनीति देने के दावे से निकली आम आदमी पार्टी को टीम केजरीवाल के पाले में जाने न दिया जाए। 14 अप्रैल को बुलाई गई बैठक इसी रणनीति का हिस्सा है। बैठक में शक्ति प्रदर्शन करके योगेन्द्र यादव आप पर अपना दावा ठोंक सकते हैं। लोकतंत्र के अभाव में महज ढाई वर्ष में बनकर बिखर गई आम आदमी पार्टी।

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