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Sunday, 2 March 2014

चुनाव सर्वेक्षण बैन करना सही नहीं इसमें सुधार की जरूरत है

चुनाव में विभिन्न पार्टियों की सम्भावित स्थिति दर्शाने वाले जनमत सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। एक न्यूज-चैनल के स्टिंग आपरेशन में जनमत सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों का जैसा चेहरा सामने आया है उससे ऐसे सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता और औचित्य दोनों पर ही सवाल उठने स्वाभाविक हैं। स्टिंग में जिस कतिपय एजेंसियों के कर्ता-धर्ता सर्वेक्षणों के नतीजों में सर्वेक्षण कराने वाली पार्टी की इच्छानुसार नतीजों में हेर-फेर करने के लिए आसानी से तैयार दिखते हैं और बदले में नकद राशि को स्वीकारने के लिए भी तत्पर रहते हैं, इससे सर्वेक्षणों से जनता का विश्वास उठ जाएगा। स्टिंग में सी-वोटर की वरिष्ठ अधिकारी को इस बात के लिए राजी होते दिखाया गया है कि मनमाफिक भुगतान मिलने पर उनकी एजेंसी मांग के मुताबिक आंकड़े पेश कर सकती है। इसमें उन्होंने एजेंसी के पबंध निदेशक की भी सहमति जताई। इस स्टिंग में सौदेबाजी के साथ ही आंकड़ों की हेराफेरी के तरीके का भी पता चलता है। पूछा गया कि अगर सर्वेक्षण में किसी पाटी को दस सीटें ही मिल रही हों तो उसे ज्यादा कैसे दिखाया जा सकता है। जवाब था, यह मानकर चला जाता है कि तीन से पांच फीसदी मतों की संभावित त्रुटि हो सकती है, अगर सीटों को बढ़ाकर दिखाने की जरूरत हो तो इस अंतर को जोड़ दिया जाएगा। एजेंसी की अधिकारी ने भुगतान का बड़ा हिस्सा नकद रूप में लेने की भी तैयारी दिखाई। इससे संकेत मिलता है कि रायशुमारी के धंधे में बदलेपन की भी भूमिका हो सकती है। अगर पेड-न्यूज अपराध है तो इस तरह का सर्वेक्षण क्या है? यह भी कहना गलत नहीं होगा कि जनमत सर्वेक्षणों के कई बार पूर्व अनुमान गलत साबित हुए हैं। कांगेस और आम आदमी पाटी(आप) देनों ने इस पर पूरी तरह पतिबंध लगाने की मांग दोहराई है। आप पाटी ने चुनाव आयोग से आचार संहिता जारी कर और एक नियामक पाधिकरण बनाकर इन्हें नियंत्रित रखने की अपील भी की है। उधर मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने कहा है कि चुनाव आयोग ने ओपिनियन पोल पर अपनी सिफारिशें दस साल पहले ही सरकार को भेज दी थीं और इस पर कार्यवाही अब सरकार को करनी है। सवाल यह है कि क्या ओपिनियन पोल पर पतिबंध लगाना उचित होगा? हर विकसित लोकतांत्रिक देश में जनमत का रुझान जानने के लिए सर्वेक्षण बुनियादी रूप से बुरे हैं और इन पर पाबंदी लगनी चाहिए, हमारी राय में सही नहीं होगा। दरअसल समस्या सर्वेक्षण नहीं बल्कि उन्हें करने के दौरान होने वाली कथित बेइमानी है। समाज के सभी क्षेत्रों की तरह सर्वे एजेंसियां भी अच्छी और बुरी हैं। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि सरकार व चुनाव आयोग ऐसी व्यवस्था बनाए, जिसके निष्कर्षें में इरादतन छेड़छाड़ करने वाली एजेंसियों को दंडित किया जा सके। दरअसल सर्वेक्षण क्षेत्र के विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि किसी चुनाव में दलों का सम्भावित वोट पतिशत बता पाना काफी हद तक मुमकिन है लेकिन समस्या तब आती है जब वोट पतिशत के आधार पर सीटों की व्याख्या निकाली जाती है। यह सर्वमान्य तथ्य है कि अब तक कोई भी ऐसा मुकम्मल तरीका विकसित नहीं हुआ है जो वोट पतिशत के आधार पर दलों को मिलने वाली सीटों की सही संख्या बता सके। बहरहाल अब सरकार और सर्वेक्षण एजेंसियां दोनें को अपना-अपना जिम्मा निभाना होगा। सरकार तत्काल इनके नियमन के लिए एक पापर मैकेनिज्म बनाए और सर्वेक्षण एजेंसियां अपने बीच मौजूद गलत तथा पैसे के पलोभन में आने वाले लोगों को पेशे से बाहर का रास्ता दिखाए।

öअनिल नरेन्द्र

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