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Tuesday, 3 June 2014

अनुच्छेद 370 ः नेताओं का नहीं, अवाम के फायदें पर बहस हो

चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि अनुच्छेद 370 के औचित्य और जम्मू-कश्मीर पर पड़ रहे इसके अच्छे-बुरे असर पर व्यापक बहस होनी चाहिए। अब सरकार के गठन के तत्काल बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री और कश्मीर के उधमपुर से सांसद जितेन्द्र सिंह के एक बयान ने अनुच्छेद 370 के वजूद और सार्थकता पर व्यापक बहस का आधार कर दिया है। उनके बयान के तत्काल बाद इस अनुच्छेद के समर्थन और विरोध में तमाम प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इस क्रम में उमर अब्दुल्ला यह कहकर अपनी हदें लांघते दिखे हैं कि 370 के हटने के बाद कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा। उमर अब्दुल्ला की इस टिप्पणी पर संघ प्रवक्ता राम माधव ने साफ कर दिया कि अनुच्छेद 370 के रहने या न रहने से कोई फर्प नहीं पड़ता है। जम्मू-कश्मीर हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है और आगे भी रहेगा। क्या उमर इसे (जम्मू-कश्मीर को) अपनी पैतृक सम्पत्ति समझते हैं? बहुत से लोगों का यह भी कहना है कि नरेन्द्र मोदी सरकार बनते ही इस विवादास्पद मुद्दे को उठाना ठीक नहीं है, बेकार विवादों में फंसने का कोई औचित्य नहीं है पर दूसरी ओर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद व जम्मू-कश्मीर के महाराज डॉ. कर्ण सिंह भी अनुच्छेद 370 की पूर्ण समीक्षा के हिमायती हैं। उनका कहना है कि काफी समय गुजर चुका है और अब इस अनुच्छेद की समीक्षा जरूरी है। यह सभी तबकों, पक्षों और सियासी दलों के बीच संयम और सहयोग से होना चाहिए। जहां तक अनुच्छेद 370 का सवाल है जो शक्तियां इस धारा को हटाना चाहती हैं उनका तर्प है कि इसके हटते ही जम्मू-कश्मीर के अलग संविधान और झंडे का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और कश्मीर देश के अन्य राज्यों की तरह ही भारत का एक राज्य बन जाएगा, जिससे वहां विकास और तरक्की के नए द्वार खुल जाएंगे। हालांकि देश में एक बड़े तबके का मत है कि इस धारा की उपयोगिता या अनुपयोगिता पर बहस होनी चाहिए। यदि निरपेक्ष भाव से भी देखा जाए तो किसी विवाद में किसी सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुंचने का रास्ता संवाद और विवाद ही हो सकता है। यदि हम इस पर चर्चा ही नहीं करेंगे तो जम्मू-कश्मीर में इस धारा के लाभ और हानियों का आंकलन कैसे किया जा सकता है? जहां तक  अनुच्छेद 370 की वैधानिक स्थिति का प्रश्न है विरोधी और समर्थक बिल्कुल विपरीत तर्प देते हैं। इसे हटाने के पक्षधरों का तर्प रहता है कि खुद जवाहर लाल नेहरू ने इसे अस्थायी प्रावधान बताया था जबकि उमर और महबूबा आदि का कहना है कि यह धारा भारत को जम्मू-कश्मीर से जोड़ने का एक मात्र माध्यम है। बहरहाल राजनीतिक नफा-नुकसान की दृष्टि से अलग जमीनी स्थिति यही दिखाती है कि इस धारा के कारण जम्मू-कश्मीर के लोगों को फायदा कम, नुकसान अधिक हुआ है। मैं इतिहास में नहीं जाना चाहता क्योंकि इसमें दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्प हैं। आज के हालत में मेरी राय में यह जरूरी है कि पुराने खांचों से बाहर निकलकर जम्मू-कश्मीर की अवाम को इस धारा के फायदे-नुकसान से अवगत कराया जाए। ऐसा तभी होगा जब इसकी सार्थकता पर गम्भीर बहस हो, यह बात समझ से परे है कि अनुच्छेद 370 हटाने की मांग सांप्रदायिक कैसे है! यह हिन्दू-मुसलमान का नहीं बल्कि भारत और जम्मू-कश्मीर के बीच का मामला है। उम्मीद है कि इस बहस को आगे  बढ़ाया जाए और जम्मू-कश्मीर की अवाम का ध्यान रखा जाए, नेताओं का नहीं।

-अनिल नरेन्द्र

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