Thursday, 23 June 2016

सोशल मीडिया और आतंकी हमले

स्थानीय कट्टरपंथी संगठन लोगों में दहशत पैदा करने के लिए खूंखार आतंकी संगठन आईएस (इस्लामिक स्टेट) के नाम का इस्तेमाल करने के कई मामले सामने आए हैं। आईएस के नाम पर कई फर्जी धमकियां मिलने के बाद भारत की खुफिया एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, आईएस का नाम लेकर स्थानीय आतंकी संगठन और कट्टरपंथी ताकतें अपनी जड़ें मजबूत करने की फिराक में हैं। हकीकत में इनका आईएस से कोई संबंध नहीं है। सूत्रों के मुताबिक धमकियों का मकसद डर फैलाना और सुरक्षा एजेंसियों को भ्रमित करना है ताकि वे सटीक रणनीति नहीं बना सकें। इसके मद्देनजर खुफिया एजेंसियों ने पत्र, फोन और सोशल मीडिया में हो रहे दुष्पचार के पति सुरक्षा बलों को सतर्क किया है। उन्हें ऐसे मामलों में स्थानीय आतंकी मॉड्यूल पर नजर रखने को कहा गया है। केरल, पश्चिम बंगाल, आंध्र पदेश, तेलंगाना, पश्चिमी उत्तर पदेश में आईएस से सहानुभूति रखने वाले तत्वों की ऐसी हरकत सामने आई है। अगर सोशल मीडिया पर आतंकियों से जुड़े समर्थकों और सहानुभूति रखने वालों की गतिविधियों पर सब नजर रखें तो न केवल ऐसे तत्वों का पता चल सकता है बल्कि कई आतंकी हमले रोके भी जा सकते हैं। यह बात अध्ययनकर्ताओं ने इस्लामिक स्टेट के हमलों से पूर्व उसके समर्थकों की ऑनलाइन गतिविधियों के व्यापक अध्ययन के बाद कही है। साइंस पत्रिका में पकाशित इस अध्ययन के मुताबिक एक रूसी सोशल साइट पर 2015 में आईएस समर्थकों की पोस्ट के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि किसी भी हमले से एक हफ्ते पहले आईएस के विभिन्न फोरम से जुड़े समर्थकों के बीच पोस्ट आदान-पदान बढ़ जाता है। यह बात छिपी नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय अधिकारियों और सोशल मीडिया मंच के पहरेदारों की कड़ी निगहबानी के बावजूद आईएस इंटरनेट के जरिए आतंकियों की भर्ती कर लेता है। इस आतंकी गुट के समर्थकों ने ट्विटर और टमब्लर पर सकिय अकांउट बना रखे हैं। इतना ही नहीं वे चैट, एप टेलीग्राम पर भी मौजूद हैं। रूसी सोशल नेटवर्किंग साइट `वीकोनतकते' पर मौजूद आईएस की 196 ऑनलाइन कम्युनिटी का आंकड़ा सामने आया है। आंकड़ों से उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि समर्थक तेजी के साथ विभिन्न रास्तों, तकनीकी जानकारी और ड्रोन हमलों से बचने इत्यादि विषयों पर चर्चा करते हैं। आईएस समर्थक आईएसएन, खलीफा जैसे हैशटेग को फॉलो करते हैं। किसी भी दिन 1,34000 लोग इस रूसी साइट पर आईएस के पक्ष में होने वाली चर्चा में शामिल रहते हैं। अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि दुनिया में कहीं भी हुए आतंकी हमलों से पहले यूजर नई ऑनलाइन कम्युनिटी बना लेते हैं। ये बड़ी तेजी के साथ आईएस से संबंधित साइटों से जुड़ जाते हैं।

-अनिल नरेंद्र

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