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Saturday, 4 June 2016

क्या इन्हें परिवारवाद के खिलाफ बोलने का हक है?

राज्यसभा की 57 सीटों के लिए 11 जून को होने वाले चुनाव में दिलचस्प नजारे सामने आ रहे हैं। एक तरफ जहां अपने-अपने सगे-संबंधियों को राज्यसभा में पहुंचाने की तैयारी हो रही है वहीं दूसरी ओर सियासी दल विधानसभा चुनावों को भी साधने में जुटे हुए हैं। सबसे दिलचस्प नजारा बिहार और झारखंड में होने जा रहा है। बिहार में राज्यसभा की पांच सीटें हैं। इसके लिए जद (यू) के लिए दो सीटों के लिए पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और आरपी सिंह तथा राजद की ओर से पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती एवं सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील राम जेठमलानी ने अपना-अपना पर्चा भरा है। अंकों के हिसाब से मीसा का राज्यसभा सदस्य बनने की पूरी उम्मीद है। यदि मीसा जीत जाती हैं तो लालू यादव परिवार के चौथे सदस्य राजनीति के मैदान में दम भरेंगे। लालू यादव के दोनों पुत्र तेजस्वी और तेज प्रताप यादव नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के सदस्य हैं। पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। देखना अब यह है कि सियासी अखाड़े में लालू परिवार के अगले सदस्य कौन होते हैं? झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके शिबू सोरेन अपने छोटे बेटे बसंत सोरेन को राज्यसभा में भेजने की तैयारी में हैं। शिबू सोरेन के बड़े बेटे हेमंत सोरेन राजनीति में पहले से अपना सिक्का जमा चुके हैं और झारखंड के मुख्यमंत्री भी बन चुके हैं। शिबू सोरेन के भाई लालू सोरेन भी राजनीति के मैदान में अपना दांव कई बार आजमा चुके हैं लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है। मालूम हो कि झारखंड में राज्यसभा की दो सीटें खाली हुई हैं। एक सीट कांग्रेस के धीरज साहू व एक सीट भाजपा के एमजे अकबर की खाली हुई है। भाजपा ने जहां केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को उम्मीदवार बनाया है, वहीं झामुमो ने बसंत सोरेन के नाम का ऐलान किया है। फिलहाल लालू प्रसाद यादव परिवार अपने समधी मुलायम सिंह यादव परिवार से काफी पीछे हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव परिवार के 18 सदस्य विधानसभा से लेकर राज्यसभा में पहले ही पहुंच चुके हैं। बिहार में विधानसभा की तर्ज पर राज्यसभा चुनाव में भी महागठबंधन ने दबदबा बनाए रखने की नींव तैयार करने का प्रयास किया है। नींव भी ऐसी जिसकी सार्थकता चरितार्थ हो। राजद उम्मीदवार राम जेठमलानी ने अंग्रेजी में शपथ ली। पर्चा दाखिल करने के बाद उन्होंने शपथ लेने के लिए अंग्रेजी की प्रति मांगी जो उपलब्ध नहीं थी। तुरन्त अंग्रेजी में शपथ पत्र की कॉपी मंगाई गई। कौन कहता है कि भारत में परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाता। जहां एक-एक परिवार के 18 सदस्य सक्रिय राजनीति में हों कम से कम उन लोगों को तो परिवारवाद की बात नहीं करनी चाहिए। क्या परिवारवाद पर आरक्षण नहीं होना चाहिए?

-अनिल नरेन्द्र

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