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Thursday, 27 April 2017

आखिर कब तक हमारे बहादुर जवान शहीद होते रहेंगे?

बस्तर की खूनी धरती पर एक बार फिर नक्सलियों ने जघन्य हत्याएं कर उन रक्तरंजित सवालों को कुरेद दिया है जो इस आमतौर पर शांत वादी में लगातार सुलग रहे हैं। इस बार छत्तीसगढ़ के घोर नक्सली क्षेत्र सुकमा जिले में सोमवार की दोपहर पुलिस व नक्सलियों के मध्य हुई मुठभेड़ में सीआरपीएफ के 26 जवान शहीद हो गए और छह जवान घायल हो गए। दो महीने में यह दूसरी बार हमला हुआ है। नक्सली शहीद जवानों के हथियार भी लूटकर ले गए। हमले के बाद से आठ जवान लापता हैं। पिछले पांच सालों में नक्सली हिंसा की 5960 घटनाएं हुई हैं। इनमें 1221 नागरिक, 355 सुरक्षाकर्मी तथा 581 नक्सली मारे गए। आरटीआई के तहत गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2012 से 28 अक्तूबर 2016 तक नक्सली हिंसा के चलते देश में 91 टेलीफोन एक्सचेंज और टॉवर को निशाना बनाया गया। 23 स्कूल भी नक्सलियों के निशाने पर रहे। साल 2017 में 28 फरवरी तक के आंकड़ों के अनुसार 181 घटनाएं हुई हैं। इनमें 32 नागरिक मारे गए, 14 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 33 नक्सली मारे गए। नक्सली जहां बार-बार खून की होली खेल रहे हैं, दक्षिण बस्तर का यह इलाका आतंक का गढ़ है। करीब 900 से 1000 वर्ग किलोमीटर घना जंगल है। इसका मुख्यालय है जगरगुंडा। इसी जगरगुंडा को तीन तरफ से घेरने के लिए तीन अलग-अलग सड़कें बनाई जा रही हैं। पहली वोरनापाल से जगरगुंडा तक की 60 किलोमीटर की सड़क है जिस पर सबसे अधिक घटनाएं हो रही हैं। सोमवार को भी इसी पर नक्सली वारदात हुईं। वोरनापाल से दंतेवाड़ा में जो जूसरी सड़क बन रही है यह सबसे बड़ी चुनौती है। यह 17 साल तक नक्सलियों के कब्जे में रही। सड़क बनाने के लिए बुर्कापाल में सीआरपीएफ का कैंप लगा दिया गया है। इसी कैंप के जवान रोड ओपनिंग के लिए निकले थे। रोड ओपनिंग से आशय यह नहीं कि किसी वीआईपी के काफिले के लिए सड़क खाली कराई जा रही हो। यहां रोड ओपनिंग का मतलब है कि निर्बाध गति से काम चलता रहे और नक्सली कोई बाधा न डाल सकें। बारूदी सुरंग न बिछा सकें। यह काम लंबे समय से जवान कर रहे थे। महिलाओं और चरवाहों के जरिये नक्सलियों ने कई बार रेकी की, फिर जवानों को घेरकर हमला बोल दिया। ठीक उसी तरह जैसा ताड़मेटला में खाना खाते वक्त 76 जवानों को छलनी कर दिया था। सोमवार को भी खाने के बाद थोड़ा रिलैक्स हुए जवानों को संभलने का मौका नहीं दिया गया। नक्सली गोरिल्ला वार में इसी तरह हमला करते हैं। यह हमला निश्चित रूप से निन्दनीय है, कायराना हमला है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सीआरपीएफ की तैयारी का तो यह हाल है कि बल के महानिदेशक का पद करीब दो महीने से खाली पड़ा है। केंद्र सरकार ने अब तक नियमित महानिदेशक की नियुक्ति नहीं की है। इस बीच देश का सबसे बड़ा अर्द्धसैनिक बल इस दौरान दो बड़े हमलों में अपने 38 जवानों को खो चुका है। नक्सलियों के गुरिल्ला हमले का सामना कर रहे सीआरपीएफ के जवान बुलेटप्रूफ हेलमेट, जैकेट और एमपीवी वाहन जैसे जरूरी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। हाल के वर्षों में नक्सली हमलों में शहीद होने वाले जवानों की संख्या में वृद्धि होने का यह बड़ा कारण है। कई बार घात लगाकर या आईईडी से हमले की पुख्ता सूचना होने के बावजूद जवान शिकार बन जाते हैं। ऐसा सीआरपीएफ जवानों को मिनी ट्रक, जीप या बाइक से प्रभावित इलाकों में भेजने के कारण होता है। 1.25 लाख बुलेटप्रूफ हेलमेट की जरूरत है जो 1800 बुलेटप्रूफ हेलमेट से ही काम चलाने को मजबूर हैं। 38 हजार पहले से मंजूर बुलेटप्रूफ जैकेट अभी तक नहीं मिलीं। बार-बार अपने मंसूबों में कामयाब रहे नक्सलियों की वारदातों का एक बड़ा कारण है उनकी इंटेलीजेंस सूचना एकत्रित करना और सरकार की गुप्तचर व्यवस्था का फेल होना। बस्तर के आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कहा कि हमले में बड़ी संख्या में महिला नक्सली भी शामिल थीं। इनके पास पहली बार अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर जैसे घातक हथियार भी थे। जिसके कारण नक्सलियों ने वहां जमकर तबाही मचाई। हमले में घायल एक जवान ने कहा कि नक्सलियों के हमले का तरीका वही था। उन्होंने इस बार भी ग्रामीणों को ही अपनी ढाल बनाया। उन्हीं के माध्यम से रेकी करवाई और इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया। अस्पताल में भर्ती घायल जवान ने बताया कि गश्ती दल पर हमला करने वाले नक्सलियों की संख्या 300 से 400 के करीब थी। एक अन्य जवान ने बताया कि उसने महिला नक्सलियों को देखा था, जिन्होंने काले कपड़े पहन रखे थे और हथियारों से लैस थीं। हमले में घायल जवानों ने बताया कि नक्सलियों ने हमले की कमान तीन स्तर में बनाई थी। तीसरे नम्बर पर भी सादे वेश में महिला नक्सली थीं। ये हमले के बाद शहीद जवानों के पर्स, मोबाइल और हथियार लूट ले गए। अपने मरे कामरेडों के शव भी उठाकर ले गए। खुफिया पुलिस की मानें तो पिछले साल नक्सलियों ने मिलिट्री कमांड का पुनर्गठन किया था। इसमें 2000 से अधिक महिला नक्सलियों को भर्ती किया गया था। हमले के लिए जिम्मेदार आखिर कौन है? पिछले 14 वर्षों से राज्य में रमन सिंह की भाजपा सरकार है और तीन वर्षों के करीब से केंद्र मोदी सरकार है। दोनों ही माओवादियों, नक्सलियों के समूल नष्ट करने के वादे और दावे करते थकते नहीं। नोटबंदी के बाद कहा गया कि नक्सलियों को कालेधन की सप्लाई लाइन टूट गई है। अब नक्सलियों की खैर नहीं है। छत्तीसगढ़ के इन इलाकों से कभी नक्सलियों के नाम पर निरीह और निर्दोष आदिवासियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के दमन-उत्पीड़न के समाचार आते हैं तो कभी दंडकारण्य को अभयारण्य बनाने में लगे माओवादियों के घात लगाकर किए गए हमलों में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों के मारे जाने के समाचार आते रहते हैं। अतीत में माओवादी राजनीति का विरोध करने वाले कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं को भी माओवादी हिंसा का शिकार बनना पड़ा है। यह संयोग मात्र है या किसी तरह की दुरभि संधि कि सत्तारूढ़ दल के किसी भी बड़े नेता अथवा पूंजीपति को माओवादियों ने अभी तक अपना निशाना नहीं बनाया है। हम हर तरह की हिंसा के विरुद्ध हैं। चाहे वह पुलिस और सुरक्षाबलों की बन्दूकें हों या चाहे बन्दूक के बल पर सत्ता हथियानों का सपना देख रहे माओवादियों की बन्दूकों से निकलने वाली गोलियां हों। गोली और बन्दूक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। सरकार को ठोस नीति पर विचार करना होगा। नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। अभी तक की रणनीति तो फेल है।

-अनिल नरेन्द्र

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