Thursday, 21 July 2016

नवजोत सिंह सिद्धू का भाजपा को करारा झटका

अपनी बेरुखी और मनमानी से भाजपा को जब-तब असहज करते रहे पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू ने इस बार बड़ा झटका दिया है। महज तीन महीने पहले मनोनीत होकर राज्यसभा पहुंचे सिद्धू ने पंजाब चुनाव से ऐन पहले नेतृत्व को अंधकार में रखते हुए राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है। सोमवार को सुबह 10.20 बजे ही वह राज्यसभा सभापति के कमरे में पहुंच गए थे। 10.30 बजे पर राजनीतिक दलों की बैठक से पहले ही उन्होंने राज्यसभा सभापति उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को अपना इस्तीफा सौंप दिया जो मंजूर भी हो गया। इससे पहले सिद्धू की पत्नी और पंजाब में संसदीय सचिव का जिम्मा संभाल रहीं डॉ. नवजोत कौर ने पहली अप्रैल को फेसबुक पर भाजपा छोड़ने की टिप्पणी से माहौल गरम कर दिया था। हालांकि तब वह महज अप्रैल फूल साबित हुआ था। चर्चा गरम है कि दोनों मियां-बीवी आम आदमी पार्टी में शामिल होने जा रहे हैं। अमृतसर से लोकसभा का टिकट काटे जाने और पंजाब में अकाली दल से गठबंधन जारी रखने के कारण अरसे से नाराज चल रहे सिद्धू दम्पत्ति ने यह स्वीकार भी किया कि उनकी आप में शामिल होने की बातचीत चल रही है। आप ने भी इस्तीफे को साहसी कदम बताते हुए सिद्धू को पार्टी में शामिल होने का खंडन नहीं किया। बीते चार-पांच महीने में सिद्धू दम्पत्ति की अरविन्द केजरीवाल से कई दौर की बातचीत हुई थी। इस क्रम में नवजोत कौर शुरू से ही आप में शामिल होने की इच्छुक थीं। मगर इस बीच भाजपा नेतृत्व ने सिद्धू को मना लिया। खुद पीएम मोदी ने सिद्धू से बात की और उन्हें राज्यसभा के लिए राजी कर लिया। अभी यह साफ नहीं कि सिद्धू पंजाब में आप का मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे या नहीं? आप के संविधान के मुताबिक परिवार का कोई एक ही सदस्य किसी पद पर रह सकता है। चुनाव भी सिद्धू और उनकी पत्नी फिलहाल आप से नहीं लड़ सकते। हालांकि सूत्रों का कहना है कि आप सिद्धू और नवजोत कौर को साधने के लिए पार्टी के संविधान में बदलाव भी कर सकती है। ऐसा हुआ तो अरविन्द केजरीवाल की पत्नी के लिए भी आप में किसी भूमिका का रास्ता खुल सकता है। नवजोत की पत्नी पेशे से डाक्टर नवजोत कौर सिद्धू पंजाब में एमएलए हैं और चीफ पार्लियामेंट्री सैकेटरी हैं। डॉ. कौर ने ड्रग्स के खिलाफ बयान देकर पहले ही आम आदमी पार्टी में जाने का इशारा किया था। नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने इस्तीफे के बाद कहा कि पंजाब की भलाई के लिए प्रधानमंत्री के आग्रह पर मैंने राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार की थी। पंजाब की भलाई का हर दरवाजा बंद होने के चलते इसका कोई मतलब नहीं रहता। अब यह महज बोझ है। मैं इसे और ज्यादा नहीं ढोना चाहता। सही और गलत की लड़ाई में आप स्वार्थी बनकर तटस्थ नहीं रह सकते। पंजाब का हित सबसे ऊपर है। नवजोत सिंह सिद्धू का पंजाब चुनाव से ऐन पूर्व भाजपा छोड़ना पार्टी के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यह एक ऐसी घटना है जो चुनाव परिणाम प्रभावित कर सकती है। वैसे भी इस घटना से पंजाब की हवा का पता चलता है। कहते हैं कि सिद्धू को हवा सूंघने की आदत है और आने वाले समय व माहौल को भांप लेते हैं। जब वह क्रिकेटर थे तो अगर मैच में बारिश होती थी तो कप्तान उनके पास आकर पूछते थे कि बारिश कब रुकेगी, मैच होगा या नहीं? भाजपा भले ही सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार करे या न करे, लेकिन उसके लिए एक ऐसा झटका है जिसकी क्षति उसे चुनाव में उठानी पड़ सकती है। पंजाब में अकाली दल की बढ़ती अलोकप्रियता तथा आप पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता कोई छिपा तथ्य नहीं है। केजरीवाल कई बार दावा कर चुके हैं कि आप पार्टी की 100 से ज्यादा सीटें आएंगी। अगर पार्टी को केशधारी सिद्धू जैसा एक चेहरा मिल जाता है तो आप पार्टी के लिए इस समय मुंहमांगा वरदान जैसा दिख रहा है। वैसे भी देखा जाए तो सिद्धू पंजाब में भाजपा को मजबूत करने और अपने दम-खम पर खड़ा करने के पक्षधर थे। पर भाजपा हाई कमान को अकाली बैसाखी ज्यादा पसंद थी। भाजपा ने एक सुनहरा मौका गंवा दिया। अब प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिन्दर सिंह के समांनतर आप के पास भी एक विश्वसनीय सिख चेहरा आ गया है। लोगों के पास एक तीसरा विकल्प भी उपलब्ध होगा। यह तो मानना ही पड़ेगा कि सिद्धू की वक्तृत्व कला में एक जादू है, जो लोगों को मोहित करती है। देखें, भाजपा इस झटके से कैसे निपटती है?

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