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Tuesday, 19 May 2020

शराब के ठेके खुल सकते हैं तो धार्मिक स्थल क्यों नहीं?

भारत वर्ष की खूबसूरती अनेकता में एकता है। अलग-अलग धर्म, जाति के होने के बावजूद सब आपसी सौहार्द से रहते हैं। धार्मिक स्थलों से जब आरती, अजान, गुरुबाणी, बाइबल आदि की आवाजें आती हैं तो ईश्वर में आस्था रखने वालों का मनोबल मजबूत होता है। देश में कोरोना महामारी के दौरान लोगों का मनोबल गिर रहा है। ऊपर से आस्था के प्रतीक धार्मिक स्थल बंद हैं। धर्मगुरुओं का कहना है कि शराब के ठेके खुले हैं। ठेकों पर भीड़ देखकर धर्म में आस्था रखने वाले धार्मिक स्थलों (मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और चर्च) को बंद देखकर मायूस हैं और बेबसी महसूस कर रहे हैं। धर्मगुरुओं का कहना है कि प्रार्थना और दुआओं में असर होता है। जब धार्मिक स्थलों से लोग ईश्वर से प्रार्थना करेंगे तो संकट के बादल भारत वर्ष और दुनिया से हटेंगे। अखिल भारतीय संत समिति एवं कालका जी मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत महाराज कहते हैं कि धार्मिक स्थलों में आकर पूजा-अर्चना से व्यक्ति में एक ईश्वरीय शक्ति का संचार होता है, सकारात्मक सोच बढ़ती है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मनजिंदर सिंह सिरसा का मानना है कि विभिन्न धर्मों के लोगों को अपने धार्मिक स्थल पर आने से ताकत मिलती है और हौसला मिलता है। डॉ. मोहम्मद मुफ्ती मुकर्रम कहते हैं कि कुछ जरूरी शर्तों के साथ धार्मिक स्थल खुलने चाहिए। हम भी इनसे सहमत हैं। जब आप शराब के ठेके खोल सकते हैं तो धार्मिक स्थल क्यों नहीं?

-अनिल नरेन्द्र

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