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Thursday, 8 September 2016

इन अलगाववादियों पर सालाना करोड़ों रुपए खर्च क्यों?

जम्मू-कश्मीर में सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भले ही सैकड़ों लोगों और दर्जनों प्रतिनिधिमंडल से मिला हो पर कुल मिलाकर इनका मिशन फेल रहा। अलगाववादी नेताओं से मिलने के लिए कुछ विपक्षी नेता बेशक इनके घर तक गए पर उन्होंने दरवाजा खोलने से मना कर दिया। यह केंद्र का सराहनीय कदम था कि मुख्यधारा के राजनीतिक विपक्षी दलों को एक साथ लाने में सरकार को सफलता मिली है और इन मुखर विपक्षी दलों का घाटी की स्थिति से रूबरू होने का अवसर मिला। इसकी मांग पिछले कई दिनों से की जा रही थी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में सरकार को कई चुनौतीपूर्ण स्थितियों से दो-चार होना पड़ सकता है। वहीं सरकार के रणनीतिकारों का कहना है कि हुर्रियत का बातचीत के लिए आगे नहीं आना साबित करता है कि वे पाकिस्तान (उनके आका) के हाथों में खेल रहे हैं। इन हुर्रियत नेताओं के तो दोनों हाथों में लड्डू हैं, पाकिस्तान का पूर्ण समर्थन और भारत से पूर्ण सुविधाएं। जम्मू-कश्मीर में इन अलगाववादियों पर भारत सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वहां आम कश्मीरी भूखों मर रहा है। कुछ आंकड़े बताएंगे कि केंद्र और राज्य सरकार इन पाकिस्तानी पिट्ठुओं पर कितना खर्च करती हैं। पिछले पांच सालों में राज्य सरकार इन अलगाववादियों पर 506 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। जम्मू-कश्मीर का सर्व शिक्षा अभियान में 484.4 करोड़ का बजट है। पिछले दो माह से स्कूल-कॉलेज न खुलने के कारण शिक्षा भी चौपट हो गई है। इन नेताओं की निजी सुरक्षा पर सालाना 100 करोड़ से ज्यादा खर्च हो रहा है। 21 करोड़ होटल और 26.43 करोड़ रुपए का पेट्रोल-डीजल का बिल बना है पिछले पांच सालों का। सुरक्षाकर्मियों के वेतन पर पिछले पांच सालों में 309 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इसके मुकाबले जम्मू क्षेत्र को सुरक्षा के नाम पर सिर्प 287 करोड़ रुपए मिले। सैयद अली गिलानी का 28 साल का पोता ताबुश गिलानी दुबई में मार्केटिंग व कम्युनिकेशन कंपनी में कार्यरत है। 2012 तक दिल्ली में स्पाइस जेट में केबिन कू के तौर पर कार्यरत था। मीर वाइज उमर फारुख ने कश्मीरी मूल की अमेरिकी नागरिक शीबा मसदी से शादी की है। पत्नी बेटी के साथ अमेरिका में रहती है। बहन रूबिया फारुख भी अमेरिका में रहती है। गुलाम मोहम्मद सुमजी के बेटा जुगनू कम उम्र से ही दिल्ली में रिश्तेदारों के पास रहकर पढ़ाई कर रहा है। मोहम्मद अशरफ सहराई का बेटा आबिद दुबई में कम्प्यूटर इंजीनियर है, दुख्तरान--मिल्लत की फरीदा का बेटा रुमा मकबूल दक्षिण अफ्रीका में डाक्टर है। गिलानी गुट के प्रवक्ता एजाज अकबर का बेटा सरवर पुणे में प्रबंधन की पढ़ाई कर रहा है। यासीन मलिक की पत्नी पाकिस्तानी नागरिक हैं और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक है। मुशहाला हुसैन के पिता एमए हुसैन पाकिस्तान में अर्थशास्त्री हैं। केंद्र सरकार को अपनी कश्मीर नीति अब बदलनी पड़ेगी। इन हुर्रियत नेताओं ने कभी भी हमारा साथ नहीं देना। इनके बिना सरकार को आगे बढ़ना होगा। इन मुट्ठीभर कश्मीरी युवकों ने सारी घाटी को बंदी बना रखा है और यह बाज आने वाले नहीं। जहां बाकी सियासी कदमों पर विचार करना होगा वहीं यह जरूरी है कि इन अलगाववादियों को दी जा रहीं सारी सरकारी सुविधाएं बंद की जाएं। केंद्र जम्मू-कश्मीर सरकार को जो भी पैसा भेजती है वह जम्मू-घाटी और लद्दाख के लिए होता है, सिर्प घाटी और उसमें शामिल इन अलगाववादियों को पालने के लिए नहीं। जम्मू और लद्दाख इस चक्कर में नजरंदाज हो रहे हैं। केंद्र को नए सिरे से पूरे मसले पर विचार करके कोई दूरगामी नीति बनानी होगी।

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