Published on 17 August, 2012
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Friday, 17 August 2012
सोची-समझी रणनीति के तहत मुंबई में आग भड़काई गई
क्या मुंबई में शनिवार को भड़की हिंसा एक पूर्व नियोजित घटना थी? इस दिन असम और म्यांमार में मुस्लिमों पर जारी हमलों के खिलाफ आजाद मैदान में रैली हुई। इस रैली का आयोजन करने वाले संगठन रजा अकादमी और मदीना तुल इल्म फाउंडेशन ने किया था। मुंबई पुलिस इस रैली में हुई हिंसा को पूर्व नियोजित मान रही है। पुलिस ने गिरफ्त में आए 23 उपद्रवियों समेत आयोजकों के खिलाफ धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज किया है। हत्थे चढ़े असामाजिक तत्वों पर कई अन्य धाराओं में भी केस दर्ज किया गया है। क्राइम ब्रांच के संयुक्त आयुक्त हिमांशु राय ने कहा है कि मुंबई पुलिस अधिनियम के तहत हिंसा और आगजनी से हुए नुकसान का हर्जाना भी रजा अकादमी से वसूला जाएगा। हिंसा भड़काने वालों और उसके कारणों का पता लगाने के लिए क्राइम ब्रांच की 12 सदस्यीय विशेष टीम गठित की गई। आजाद मैदान में भड़काऊ भाषणबाजी की वीडियो फुटेज का अध्ययन किया जा रहा है। सीसीटीवी कैमरों के जरिए बाकी उपद्रवियों की शिनाख्त करने की कोशिश हो रही है। पुलिस ने गिरफ्तार उपद्रवियों को महानगर मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया। अदालत ने सभी असामाजिक तत्वों को 19 अगस्त तक पुलिस रिमांड में भेज दिया। रिमांड के लिए अदालत में दिए आवेदन में पुलिस ने हिंसा को पूर्व नियोजित कहा है। हिमांशु राय के अनुसार जिस तरीके से आजाद मैदान रैली में पहुंचने के लिए फेसबुक और एसएमएस के जरिए संदेश भेजा गया, उससे साफ है कि हिंसा पूर्व नियोजित थी। फेसबुक पर कई दिनों से मुसलमानों पर असम और म्यांमार में हुई ज्यादतियों का प्रचार हो रहा है और उन्हें उकसाने के प्रयास हो रहे हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया व प्रिंट मीडिया पर भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह जानबूझ कर इन ज्यादतियों का प्रचार नहीं कर रहे। सीसीटीवी फुटेज से साफ है कि कई प्रदर्शनकारी डंडों और लोहे की रॉड से लैस थे। पूंकने के लिए पेट्रोल केन भी लेकर आए थे। उनका कहना था कि फेसबुक, इंटरनेट और एसएमएस संदेश भेजने वालों का पता लगाने के लिए साइबर क्राइम सेल की मदद भी ली जाएगी। ध्यान रहे कि रजा अकादमी और सुन्नी जमायत उल उलेमा समेत 24 संगठनों द्वारा आयोजित रैली के दौरान हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हो गई थी। 45 पुलिस कर्मियों सहित 100 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। किसी संवेदनशील मुद्दे को अनावश्यक तूल देने के कैसे घातक दुष्परिणाम होते हैं मुंबई में हुई हिंसा इसका उदाहरण है। यह समझना कठिन है कि मुंबई में असम की हिंसा के विरोध में धरने के आयोजकों ने यह नतीजा कैसे निकाल लिया कि असम में केवल मुस्लिम समुदाय के लोग ही निशाना बने? यह जो धारणा बनाई गई कि असम में केवल मुस्लिम समुदाय को ही निशाना बनाया गया और राहत एवं पुनर्वास के मामले में उनकी उपेक्षा की जा रही है उसके लिए एक हद तक असम सरकार और केंद्र सरकार भी जिम्मेदार है जो इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं कर सकी कि हिंसा क्यों भड़की, उसके लिए जिम्मेदार कौन था, असल मुद्दा क्या था, कितने लोग प्रभावित हुए, कितनों को घर छोड़ना पड़ा और राहत एवं पुनर्वास की क्या स्थिति है? दुर्भाग्य से कुछ असामाजिक तत्वों और राजनेताओं ने अपनी रोटी सेंकने के लिए और देश में अस्थिरता, अराजकता पैदा करने के लिए यह प्रचार किया कि असम में मुस्लिम समुदाय के साथ अत्याचार किया गया और यह यहीं नहीं रुका, संसद में भी कुछ सांसदों ने संसद के अन्दर कहा कि असम में मुस्लिम समुदाय को न केवल निशाना बनाया गया बल्कि राहत शिविरों में उनकी अनदेखी भी की जा रही है। चिन्ताजनक यह है कि राजनेताओं का एक वर्ग अभी भी यह साबित करने पर तुला है कि असम में जो हिंसा भड़की उसके पीछे बंगलादेश से होने वाली घुसपैठ की कोई भूमिका नहीं। एक तरह से उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं कि बंगलादेश से आए मुसलमान अवैध तरीके से घुसपैठ कर रहे हैं। इनके लिए बस उनका मुस्लिम होना ही काफी है भले ही वह विदेशी हों। दुख तो इस बात का भी है कि कई दिनों से यह साजिश चल रही थी और मुंबई पुलिस इसे समय पर रोकने में विफल रही। आखिर वह यह अनुमान क्यों नहीं लगा सकी कि मुंबई में सामान्य से अधिक लोग अस्त्र-शस्त्राsं के साथ एकत्रित हो रहे हैं और उनके इरादे सही नहीं? यह अच्छी बात है कि धरने का आयोजन करने वाले संगठनों ने अपनी भूल स्वीकार कर ली है और क्षमा भी मांगी, लेकिन उन्हें इस पर चिन्तन-मनन करना चाहिए कि किन कारणों के चलते उनके आयोजन में शरारती और उपद्रवी घुस आए? यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि ये तत्व पूरी तैयारी से आए थे और प्लान के अनुसार उन्होंने देखते ही देखते दर्जनों वाहनों को आग लगा दी और पुलिस पर हमला कर दिया।
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