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Wednesday, 16 February 2022
सबसे बड़ी बैंक धोखाधड़ी
सीबीआई ने देश के सबसे बड़े बैंक धोखाधड़ी मामले में एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड और उसके तत्कालीन अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ऋषि कमलेश अग्रवाल सहित अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। अधिकारियों ने शनिवार को कहा कि यह मुकदमा भारतीय स्टेट बैंक की अगुवाई वाले बैंकों के एक संघ से कथित रूप से 22,842 करोड़ रुपए से अधिक की धोखाधड़ी के संबंध में दर्ज किया गया है। एजेंसी ने अग्रवाल के अलावा तत्कालीन कार्यकारी निदेशक संथानम मुथास्वामी, निवेशकों, अश्विनी कुमार, सुशील कुमार अग्रवाल और रवि विमल नेवेतिया और एक अन्य कंपनी एबीजे इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी कथित रूप से आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और अधिकारिक दुरुपयोग जैसे अपराधों के लिए मुकदमा दर्ज किया। बैंकों के संघ ने सबसे पहले आठ नवम्बर 2019 को शिकायत दर्ज कराई थी, जिस पर सीबीआई ने 12 मार्च 2020 को कुछ सफाई मांगी थी। बैंकों के संघ ने उस साल अगस्त में एक नई शिकायत दर्ज की और डेढ़ साल से अधिक समय तक जांच करने के बाद सीबीआई ने इस पर कार्रवाई की। अधिकारी ने कहा कि कंपनी को सीबीआई के साथ ही 28 बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 2468.51 करोड़ रुपए के कर्ज को मंजूरी दी थी। उन्होंने कहा कि फोरेंसिक ऑडिट से पता चला है कि वर्ष 2012-17 के बीच आरोपियों ने कथित रूप से मिलीभगत की और अवैध गतिविधियों को अंजाम दिया, जिसमें धन का दुरुपयोग और आपराधिक विश्वासघात शामिल हैं। यह सीबीआई द्वारा दर्ज सबसे बड़ा बैंक धोखाधड़ी का मामला है। गत सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंक कर्मचारियों का पद भरोसे वाला है जहां ईमानदारी और सत्य निष्ठा की आवश्यक शर्तें हैं। उनकी तरफ से बरती गई किसी भी अनियमितता को नरमी से नहीं निपटा जाना चाहिए। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस. ओकाकी पीठ ने यह टिप्पणी अपने कर्तव्यों के निर्वहन में गंभीर अनियमितता के लिए एक बैंक क्लर्क की बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखते हुए की। कहा कि कर्मचारी इस बीच अपने पद से सेवानिवृत्त हो गया, केवल उसे उस कदाचार से मुक्त नहीं किया जा सकता जो उसने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किया। पीठ ने कहा कि कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति की गंभीरता को देखते हुए उसकी बर्खास्तगी की सजा को किसी भी तरह से चौंकाने वाला नहीं कहा जा सकता है। कर्मचारी 1973 में क्लर्क-कम-टाइपिस्ट के तौर पर बैंक सेवा में शामिल हुआ था। सेवाकाल के दौरान गंभीर अनियमितताओं के चलते उसे सात अगस्त 1995 में निलंबित कर दिया गया था। दो मार्च 1996 में उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया। बैंक ने अपने नियमों के तहत अनुशासनात्मक जांच कराई जिसमें जांच अधिकारी ने आरोपों को सही पाया। उसे छह दिसम्बर 2000 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। साथ ही अपीलीय प्राधिकरण ने भी उसकी अपील खारिज कर दी। पटना हाई कोर्ट ने भी फैसले को बरकरार रखा। कर्मचारी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
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